छत्तीसगढ़ फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार बने अश्वनी गुर्देकर, कुर्सी पर हाईकोर्ट की मुहर
छत्तीसगढ़ फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार पद को लेकर महीनों से चल रही कानूनी जंग में आखिरकार फार्मासिस्ट अश्वनी गुर्देकर को बड़ी राहत मिल गई है। बिलासपुर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने एकल पीठ के फैसले को पलटते हुए साफ कर दिया कि गुर्देकर फिलहाल रजिस्ट्रार पद का अतिरिक्त प्रभार संभालते रहेंगे। ग्रीष्मकालीन अवकाश से ठीक पहले आए इस फैसले ने स्वास्थ्य विभाग और फार्मासिस्ट लॉबी में हलचल तेज कर दी है।
एकल पीठ का आदेश, डबल बेंच की रोक
दरअसल, स्वास्थ्य मंत्रालय ने 14 मार्च 2024 को अंबेडकर अस्पताल रायपुर के वरिष्ठ फार्मासिस्ट अश्वनी गुर्देकर को छत्तीसगढ़ राज्य फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था। इस आदेश को चुनौती देते हुए डॉ. राकेश गुप्ता ने हाईकोर्ट में क्वो वारंटो याचिका दायर कर दी थी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू की एकल पीठ ने 3 मार्च 2026 को शासन का आदेश रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला सीधे डबल बेंच तक पहुंच गया।
स्थायी नियुक्ति नहीं, अस्थायी व्यवस्था
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रविंद्र कुमार अग्रवाल की डबल बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि अश्वनी गुर्देकर को नियमित नियुक्ति नहीं दी गई थी, बल्कि केवल अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। अदालत ने माना कि यह शासन की अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है और इसे सार्वजनिक पद पर अवैध कब्जा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी दो टूक कहा कि जब तक किसी फैसले में दुर्भावना, मनमानी या स्पष्ट नियम उल्लंघन साबित न हो, तब तक न्यायालय को ऐसी अस्थायी व्यवस्थाओं में दखल देने से बचना चाहिए।
नियम बदलने की तैयारी का भी खुलासा
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि फार्मासिस्ट को रजिस्ट्रार पद पर रखने संबंधी नियमों में संशोधन की प्रक्रिया पहले से चल रही है। यानी सरकार भविष्य में इस पद के लिए फार्मासिस्टों का रास्ता पूरी तरह साफ करने की तैयारी में है। कोर्ट ने साथ ही शासन को निर्देश दिया कि नियमित रजिस्ट्रार की नियुक्ति प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जाए, ताकि लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार के सहारे व्यवस्था न चलती रहे।
व्यक्तिगत दुश्मनी वाली दलील ने पलटा मामला
अश्वनी गुर्देकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप जौहरी और जे.के. गुप्ता ने कोर्ट में पैरवी की। उन्होंने दलील दी कि यह पूरा विवाद जनहित से ज्यादा व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और द्वेष से प्रेरित है। अदालत ने भी इस तर्क को गंभीरता से लिया।
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