बस्तर एसपी कार्यालय में तीन करोड़ का वेतन घोटाला, CBI जांच की मांग, पूरे संभाग के पुलिस कार्यालयों का होगा टेस्ट ऑडिट

Arun Tiwari | Oct 01, 2026, 13:18 IST
बस्तर में पुलिस का वेतन घोटाला
रायपुर : बस्तर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में तीन करोड़ का वेतन घोटाला हुआ है। कुछ लोगों ने मिलकर पुलिसकर्मियों की सैलरी के तीन करोड़ से ज्यादा रुपए निकाल लिए। बस्तर संभाग के सभी जिलों में पुलिस के लिए अतिरिक्त फंड मिलता रहा है। संवेदनशील इलाका होने के कारण इस फंड की ज्यादा पूछ परख भी नहीं होती।

बस्तर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में तीन करोड़ का वेतन घोटाला हुआ है। कुछ लोगों ने मिलकर पुलिसकर्मियों की सैलरी के तीन करोड़ से ज्यादा रुपए निकाल लिए। बस्तर संभाग के सभी जिलों में पुलिस के लिए अतिरिक्त फंड मिलता रहा है। संवेदनशील इलाका होने के कारण इस फंड की ज्यादा पूछ परख भी नहीं होती।



इसी का फायदा उठाकर तीन लोगों ने जगदलपुर एसपी कार्यालय से वेतन से तीन करोड़ ज्यादा का आहरण कर लिया। इस घोटाले के बाद मचे हड़कंप से अब बस्तर के सभी जिले जांच की जद में आ सकते हैं। इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के पास एक पत्र पहुंचा है जिसमें संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच तक सीमित रहने के बजाय पूरे बस्तर संभाग में वेतन आहरण की प्रक्रिया की विशेष जांच कराने की मांग की गई है।



सूत्र कहते हैं कि यह पत्र विभाग से जुड़े किसी आदमी का है जो बिना नाम के भेजा गया है। बस्तर के एसपी शलभ सिन्हा का कहना है कि वेतन घोटाले में तीन लोगों पर एफआईआर कर जेल भेजा है। रिकवरी के लिए प्रॉपर्टी अटैच करने की कार्यवाही की जाएगी।



पूरे संभाग के एसपी कार्यालयों की जांच की मांग :

इस प्रकरण की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी केंद्रीय संस्थाओं से जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही पिछले पांच से सात वर्षों के वेतन भुगतान रिकॉर्ड का विशेष वित्तीय ऑडिट कराने और जिन अधिकारियों के स्तर पर पर्यवेक्षण में चूक हुई है, उनकी जवाबदेही तय करने की मांग भी की गई है। पत्र में कहा गया है कि यदि वेतन भुगतान से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव कर सरकारी राशि का दुरुपयोग किया गया है, तो यह जांच जरूरी है कि ऐसी कोई प्रक्रिया अन्य कार्यालयों में भी तो इस्तेमाल नहीं हुई। इसी आधार पर बस्तर संभाग के जिले दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर और कोंडागांव में वेतन आहरण और भुगतान रिकॉर्ड का टेस्ट ऑडिट कराने को कहा गया है।



बस्तर संभाग की संवेदनशीलता और विशेषाधिकार का दुरुपयोग:

इस गोपनीय पत्र में कहा गया है कि ​बस्तर संभाग के सभी जिले नक्सल के कारण अत्यंत संवेदनशील रहे हैं। कानून-व्यवस्था और सुरक्षात्मक कारणों से इन क्षेत्रों में पुलिस एवं प्रशासनिक तंत्र को वित्तीय आहरण, आकस्मिक व्यय और गोपनीय फंड्स के मामलों में कुछ विशेष छूट व शिथिलता प्राप्त होती है। इस बात की गंभीर आशंका है कि इसी प्रशासनिक छूट का अनुचित लाभ उठाकर यह तकनीकी घोटाला बस्तर के अन्य जिलों में भी पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहा हो। इसलिए इसकी शुरुआत कब से हुई, इसकी गहराई से जांच आवश्यक है।



दो साल के भुगतान पर उठे सवाल :

मामले में आरोप है कि वेतन संबंधी डिजिटल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ कर कुछ कर्मचारियों के वेतन और अन्य भुगतानों में असामान्य वृद्धि की गई। इसके बाद सरकारी खाते से अतिरिक्त राशि का भुगतान होने की बात सामने आई। सवाल उठाया गया है कि यदि भुगतान में लगातार असामान्य बदलाव होते रहे तो नियमित सत्यापन और मिलान की प्रक्रिया में इसे पहले क्यों नहीं पकड़ा गया। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने सिर्फ वेतन शाखा में काम करने वाले कर्मचारियों की भूमिका की जांच के बजाय पूरी भुगतान श्रृंखला की पड़ताल की मांग की है।



DDO की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में :

शिकायत में आहरण एवं संवितरण अधिकारी यानी DDO की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सरकारी वेतन बिलों के आहरण और भुगतान में संबंधित अधिकारियों की भी निर्धारित जिम्मेदारियां होती हैं। इसलिए जांच में यह देखा जाना चाहिए कि संदिग्ध बिल किस स्तर पर तैयार हुए, किसने उनका सत्यापन किया, किस अधिकारी ने उन्हें स्वीकृत किया और किस प्रक्रिया के तहत भुगतान हुआ।



यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को दोषी ठहराकर मामला समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। जिम्मेदारी उस स्तर तक तय की जानी चाहिए जहां से वित्तीय नियंत्रण और निगरानी होती है।



CBI की आर्थिक अपराध शाखा से जांच की मांग :

मामले में वित्तीय लेन-देन की पूरी चेन का पता लगाने के लिए CBI से जांच कराने की मांग की गई है। तर्क दिया गया है कि यदि सरकारी धन को अलग-अलग बैंक खातों, निवेश माध्यमों या डिजिटल परिसंपत्तियों में स्थानांतरित किए जाने की पुष्टि होती है तो इसकी स्वतंत्र वित्तीय जांच जरूरी होगी। शिकायत में शेयर बाजार और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े संभावित लेन-देन की भी जांच की मांग की गई है। पिछले पांच से सात वर्षों के वेतन आहरण का विशेष वित्तीय ऑडिट कराने को कहा गया है। इसके तहत बस्तर संभाग के पुलिस कार्यालयों के अलावा राज्य के अन्य बड़े आहरण वाले विभागों में भी टेस्ट बेसिस पर जांच कराने का सुझाव दिया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और लोक निर्माण विभाग जैसे विभागों के वेतन भुगतान में भी डिजिटल सिस्टम के जरिए असामान्य बदलाव हुए हैं या नहीं, इसका नमूना आधारित परीक्षण कराने की मांग की गई है। इस



मांग का आधार यह है कि यदि किसी डिजिटल प्रक्रिया में ऐसी कमजोरी है जिसका इस्तेमाल वेतन में अनधिकृत बदलाव के लिए किया जा सकता है, तो केवल एक कार्यालय की जांच से उस कमजोरी का पूरा पता नहीं चल सकता।



FIU-IND से मनी ट्रेल की जांच :

भारत सरकार की वित्तीय खुफिया यूनिट से वित्तीय डेटा विश्लेषण कराने को कहा गया है। जांच में यह पता लगाने की मांग की गई है कि सरकारी खाते से निकली राशि किन खातों में पहुंची, कितनी रकम नकद निकाली गई, किन लोगों के खातों में ट्रांसफर हुई और क्या किसी राशि को निवेश या अन्य वित्तीय माध्यमों में लगाया गया।



अगर जांच में संदिग्ध वित्तीय लेन-देन सामने आते हैं तो उनकी पूरी मनी ट्रेल का विश्लेषण मामले की वास्तविक प्रकृति और दायरे को समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है। यहां पर सिर्फ जांच और कार्रवाई की मांग नहीं की गई है, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तकनीकी बदलाव का सुझाव भी दिया गया है।



प्रस्ताव है कि किसी कर्मचारी के मूल वेतन, भत्ते या अन्य भुगतान में अचानक बदलाव होने पर सिस्टम स्वतः रेड फ्लैग जारी करे। सक्षम अधिकारी के डिजिटल अनुमोदन के बिना वेतन में बदलाव होने पर बिल को भुगतान से पहले ऑटो-ब्लॉक करने की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही कर्मचारी के पद, मूल वेतन और स्वीकृत भत्ते की तुलना वास्तविक भुगतान से करने वाला ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि असामान्य भुगतान तत्काल पकड़ में आ सकें।



जांच से साफ होगा वास्तविक दायरा :

जगदलपुर एसपी कार्यालय में सामने आए इस मामले ने सरकारी वेतन भुगतान की डिजिटल व्यवस्था में निगरानी और नियंत्रण की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस की जांच में आरोपियों की भूमिका, सरकारी राशि की वास्तविक क्षति और लेन-देन की पूरी चेन सामने आना अभी बाकी है। इसी बीच केंद्रीय एजेंसियों से जांच और बस्तर संभाग के सभी पुलिस जिलों का टेस्ट ऑडिट कराने की मांग सामने आने से मामला अब एक कार्यालय तक सीमित नहीं रहने की दिशा में बढ़ सकता है।

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