200 साल पुरानी अनोखी परंपरा, बंधा मतऊर मेले में दिखा बस्तर का असली रंग
NEWS IN SHORT
- बस्तर के बरकई गांव में 200 साल पुराना बंधा मतऊर उत्सव
- हजारों लोग जुटे, ग्रामीणों ने दिखाया पारंपरिक उत्साह
- माता सती की पूजा के बाद शुरू हुआ सामूहिक मत्स्याखेट
- उत्सव में सामुदायिक सहयोग और सामाजिक एकता की झलक
- मालगुजार परिवार की पहल से आज भी जीवित परंपरा
NEWS IN DETAIL
Jagdalpur। बस्तर की हरियाली, छत्तीसगढ़ आदिवासी संस्कृति और अनोखी परंपराओं के चलते यह क्षेत्र देश और विदेश में अपनी अलग पहचान रखता है। ग्रामीण जीवन में सामुदायिक सहयोग, लोकगीत, नृत्य और त्योहारों की गहरी छाप दिखाई देती है। ऐसे ही परंपराओं में कोंडागांव जिले के बरकई गांव में मनाया जाने वाला ‘बंधा मतऊर’ उत्सव विशेष महत्व रखता है।
बरकई गांव और उत्सव का इतिहास
बरकई गांव फरसगांव से करीब सात किलोमीटर दूर माकड़ी मार्ग पर स्थित है, और यहां की आबादी लगभग तीन हजार है। यह उत्सव रियासतकाल से चली आ रही परंपरा है, जो 200 वर्षों से ज्यादा पुरानी है। इस परंपरा के अनुसार माता सती की पूजा के बाद सामूहिक मत्स्याखेट (मछली पकड़ने का आयोजन) किया जाता है। पहले यह हर साल होता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसे एक या दो साल के अंतराल पर आयोजित किया जा रहा है।
हजारों लोगों ने लिया उत्सव में भाग
जेठ मास में आयोजित होने वाले इस उत्सव की तिथि गांव के मालगुजार, पुजारी और मुखिया तय करते हैं। इस साल के आयोजन में 50 से अधिक गांवों से लगभग पांच से सात हजार लोग शामिल हुए। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सुबह से ही गांव पहुंच गए। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर आए और पूरे गांव में ढोल-नगाड़ों, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य की गूंज रही। उत्सव स्थल पर उत्साह और उमंग का माहौल बना रहा।
पूजा-अर्चना के बाद मत्स्याखेट
दोपहर में मालगुजार देशमन पांडे, ग्राम पुजारी ललित मरकाम और देवी हिंगलाजिन के पुजारी दिलीप पांडे ने नौ कन्याओं, 64 जोगनियों और माता सती की पूजा-अर्चना की। पूजा के बाद देवी-देवताओं की आज्ञा मिलने की घोषणा की गई और डंका बजते ही लोग तालाब में उतर गए। सैकड़ों ग्रामीण हाथों में जाल, सूपा, चलनी और बांस की टोकरियां लिए मछलियां पकड़ने में जुट गए। तीन घंटे तक यह प्रक्रिया जारी रही, और प्रत्येक व्यक्ति अपनी पकड़ी हुई मछलियों को घर ले गया।
सामुदायिक सहयोग और सामाजिक संदेश
बंधा मतऊर उत्सव में सामूहिकता और सहयोग की भावना साफ दिखाई देती है। इसे केवल मनोरंजन या भोजन के लिए नहीं माना जाता, बल्कि यह धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। ग्रामीणों का मानना है कि इसमें शामिल होने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। लोग कई दिन पहले से ही इस उत्सव की तैयारी में जुट जाते हैं। यह परंपरा गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करती है।
मालगुजार परिवार की पहल
मालगुजार परिवार के जीवनलाल पांडे ने बताया कि उनके पूर्वजों ने रियासतकाल में गांव में तीन तालाब खुदवाए थे। इनमें सबसे बड़ा उपर बंधा या पिकड़ी तालाब लगभग 14 एकड़ में फैला है। वर्तमान में यह तालाब शासन के अधीन है और उत्सव का मुख्य केंद्र भी यही है।अन्य दो तालाब बड़े बंधा और भंडारी तालाब श्रमदान और मजदूरों को कौड़ी देकर खुदवाए गए थे। तालाब निर्माण के दौरान श्रमिकों और ग्रामीणों के सहयोग से यह उत्सव शुरू हुआ था, जो आज भी जारी है।
बस्तर संस्कृति की जीवंत पहचान
बस्तर दशहरा, भंगाराम बाबा की अदालत और दंतेवाड़ा की फागुन मंडई की तरह ‘बंधा मतऊर’ भी बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। देश-विदेश से लोग इसे देखने आते हैं। यह उत्सव न केवल परंपरा की स्मृति है, बल्कि बस्तर की संस्कृति, आदिवासी जीवन और सामुदायिक सहयोग की मिसाल भी पेश करता है।
FAQ
- बंधा मतऊर उत्सव कब और कहाँ मनाया जाता है?
बरकई गांव, कोंडागांव में, ज्येष्ठ मास में। - मुख्य गतिविधियाँ क्या हैं?
माता सती की पूजा और सामूहिक मछली पकड़ना। - इतिहास और परंपरा क्या है?
200 साल पुरानी परंपरा, मालगुजार परिवार द्वारा तालाब खुदवाने से शुरू है।
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