बस्तर फाइटर्स भर्ती: सुरक्षा का नया मॉडल, क्या फिर सलवा जुडूम जैसा जाल बुन रहा गृह विभाग?
छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर अंचल से जैसे-जैसे नक्सलवाद बैकफुट पर आ रहा है, वैसे-वैसे वहां की सुरक्षा रणनीति में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच फिलहाल अर्धसैनिक बलों (CRPF आदि) की आधिकारिक वापसी पर कोई अंतिम निर्णय या पत्राचार नहीं हुआ है, लेकिन भविष्य का खाका खींच लिया गया है। रणनीति यह है कि नक्सलवाद के पूरी तरह खात्मे के बाद केंद्रीय बलों की बटालियनों को धीरे-धीरे वापस भेजा जाएगा।
ऐसे में बस्तर की सुरक्षा का पूरा जिम्मा स्थानीय स्तर पर गठित 'बस्तर फाइटर्स' के कंधों पर होगा। सरकार कुल 5000 बस्तर फाइटर्स की नियुक्ति करने की योजना पर काम कर रही है। इस बल के पूरी तरह तैनात होते ही, वर्तमान में वहां मोर्चे पर तैनात जिला बल के जवानों को वापस उनके मूल विभागों और थानों में भेज दिया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जानी है।
1500 नियुक्तियों को हरी झंडी
इसी कड़ी में पहले चरण के तहत 1500 बस्तर फाइटर्स की नियुक्ति की जा रही है, जिसके लिए शासन से प्रशासकीय स्वीकृति भी मिल चुकी है। लेकिन, इस मंजूरी के साथ ही प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में एक बड़ा विवाद भी शुरू हो गया है। सबसे बड़ा पेंच इस भर्ती के नियमों को लेकर फंस रहा है। 'द सूत्र' को मिली जानकारी के अनुसार, गृह विभाग इस भर्ती को राज्य स्तर पर करने के बजाय संभाग और जिला स्तर पर कर रहा है। जानकारों का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से नियम-विरुद्ध है और यही इस पूरी भर्ती को अदालती चक्करों में फंसाने का सबसे बड़ा कारण बन सकती है।
सलवा जुडूम का इतिहास:
यह पहली बार नहीं है जब बस्तर के स्थानीय युवाओं को सीधे मोर्चे पर उतारने के लिए इस तरह का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि एक समय पर नक्सलियों के खिलाफ लोहा लेने के लिए स्थानीय स्तर पर एक जन-आंदोलन और बल तैयार किया गया था, जिसे दुनिया 'सलवा जुडूम' के नाम से जानती है।
उस वक्त भी बस्तर के स्थानीय युवाओं को बिना किसी ठोस राज्य-स्तरीय नीति के सीधे भर्ती कर बंदूकें थमा दी गई थीं। जब यह विवादित मामला देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) पहुंचा, तो अदालत ने तत्कालीन सरकार की इस नीति पर न केवल तीखी फटकार लगाई थी, बल्कि स्थानीय स्तर पर की गई उन नियुक्तियों और ज्वाइन कर चुके लोगों की सेवा को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करने का ऐतिहासिक आदेश दे दिया था।
आपत्ति, फिर भी अनदेखी क्यों?
बस्तर फाइटर्स (CG CRPF recruitment) की सेवा भर्ती नियम बनाने के लिए गृह विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच हाल ही में कई दौर की उच्च स्तरीय बैठकें हुईं। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों के दौरान कुछ अधिकारियों ने सलवा जुडूम मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई पुरानी गाइडलाइंस और आपत्तियों का हवाला भी दिया था।
बैठक में इस बात पर गंभीर चर्चा हुई थी कि जिला-स्तरीय भर्ती का यह मॉडल दोबारा कोर्ट में टिक नहीं पाएगा। इसके बावजूद, शीर्ष स्तर पर इस कानूनी चेतावनी को पूरी तरह से नकार दिया गया। सवाल उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव में गृह विभाग सुप्रीम कोर्ट की पुरानी आपत्तियों को दरकिनार कर उसी विवादित रास्ते पर दोबारा चल पड़ा है?
जिला-स्तरीय शर्त का जाल:
अब सबसे बड़ा सुलगता हुआ सवाल यह है कि क्या सरकार और गृह विभाग जानबूझकर 1500 आदिवासी युवाओं की इस भर्ती को कानूनी दांव-पेच में फंसाना चाहते हैं? जिला-स्तरीय और संभाग-स्तरीय शर्त जोड़कर सरकार ने खुद इस भर्ती के खिलाफ कोर्ट जाने का रास्ता खोल दिया है। यदि कोई भी अभ्यर्थी इस स्थानीय आरक्षण या जिला-स्तरीय नीति के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, तो पूरी भर्ती प्रक्रिया पर स्टे लगना तय माना जा रहा है।
ऐसे में बस्तर के जिन युवाओं को रोजगार और सुरक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का सपना दिखाया जा रहा है, उनका भविष्य एक बार फिर अधर में लटक सकता है। स्थानीय भर्ती मॉडल पर गृह विभाग की यह अड़ियल नीति सुशासन के दावों पर भी गहरे सवाल खड़े करती है।
FAQ
- बस्तर फाइटर्स बल के गठन का मुख्य उद्देश्य क्या है
बस्तर फाइटर्स के गठन का प्राथमिक उद्देश्य नक्सलवाद के खात्मे के बाद बस्तर अंचल की आंतरिक सुरक्षा को पूरी तरह स्थानीय हाथों में सौंपना है। वर्तमान में वहां सीआरपीएफ (CRPF) सहित अन्य केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात हैं। नई रणनीति के तहत जब केंद्रीय बल वापस लौटेंगे, तब 5000 जवानों वाला यह 'बस्तर फाइटर्स' बल वहां सुरक्षा का मोर्चा संभालेगा। - बस्तर फाइटर्स भर्ती प्रक्रिया पर क्या कानूनी विवाद है?
इस भर्ती में सबसे बड़ा कानूनी पेंच इसके 'भर्ती मॉडल' को लेकर है। गृह विभाग 1500 पदों पर की जा रही इस भर्ती को राज्य स्तर पर विज्ञापित और आयोजित करने के बजाय संभाग और जिला स्तर पर केंद्रित कर रहा है। कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी नियमित शासकीय सेवा में शत-प्रतिशत जिला-स्तरीय या संभाग-स्तरीय प्रतिबंध लगाना संवैधानिक तौर पर समानता के अधिकार का उल्लंघन माना जाता है, जब तक कि उसके लिए कोई विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त न हो। यही वजह है कि इसे नियम-विरुद्ध माना जा रहा है और आशंका है कि यह नीति भर्ती को सीधे कोर्ट के कटघरे में खड़ा कर देगी। - बस्तर फाइटर्स भर्ती विवाद का सलवा जुडूम मामले से क्या संबंध है?
जब बस्तर में 'सलवा जुडूम' के तहत स्थानीय युवाओं को (जिन्हें विशेष पुलिस अधिकारी या SPO कहा जाता था) बिना किसी व्यवस्थित राज्य-स्तरीय कैडर और नियमों के सीधे नक्सल मोर्चे पर तैनात किया गया था, तब मामला सुप्रीम कोर्ट गया था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि बिना उचित प्रशिक्षण, राज्य-स्तरीय सेवा नियमों और सुरक्षा के, गरीब स्थानीय युवाओं को सीधे हिंसा के मोर्चे पर झोंकना असंवैधानिक है। कोर्ट ने न केवल उस भर्ती पर रोक लगाई बल्कि नियुक्त लोगों को बर्खास्त करने का आदेश दिया था। बस्तर फाइटर्स के सेवा नियम बनाते समय भी इसी तरह स्थानीयता और जिला-स्तरीय मापदंडों को थोपा जा रहा है।
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