बस्तर में शव दफनाने पर भारी बवाल; ग्रामीणों ने परंपरा का दिया हवाला, प्रशासन ने कब्रिस्तान भेजा शव
NEWS IN SHORT
- बस्तर करंदोला गांव में शव दफनाने को लेकर विवाद
- गांववालों ने ग्राम परंपराओं का दिया हवाला
- वन विभाग की भूमि पर शव दफनाने को लेकर तनाव बढ़ा
- प्रशासन ने मामले को संभालते हुए शव को कब्रिस्तान भेजा
- बस्तर में पेसा कानून और ग्राम सभा की शक्तियों पर फिर सवाल
NEWS IN DETAIL
Bastar। बस्तर के करंदोला गांव में एक ईसाई महिला के शव को दफनाने को लेकर विवाद छिड़ गया है। यह विवाद सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बस्तर के ग्रामीण समाज की बदलती सोच और संस्कृति का भी मुद्दा बन गया।
गांववालों ने परंपराओं का दिया हवाला
गांव के लोग इस मुद्दे पर कड़े रहे और उनका कहना था कि गांव की परंपरा और ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी प्रकार का निर्णय नहीं लिया जा सकता। उनका तर्क था कि ईसाई रीति से शव दफनाने की अनुमति गांव में नहीं दी जा सकती क्योंकि यह गांव की पारंपरिक व्यवस्था से मेल नहीं खाता।
तनाव बढ़ने पर प्रशासन ने लिया कदम
यह विवाद और बढ़ा जब यह जानकारी मिली कि शव को वन विभाग की फेंसिंग वाली ज़मीन पर दफनाने की तैयारी हो रही थी। जब गांव वाले मौके पर पहुंचे तो देखा कि तार फेंसिंग को हटा दिया गया था और गड्ढा खोदा जा रहा था। इसके बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। प्रशासन ने मामले को संभालते हुए शव को जगदलपुर के करकापाल कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार के लिए भेज दिया।
ग्रामीणों का आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि मतांतरण के बाद गांव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और स्थानीय नियमों को चुनौती दी जा रही है, जिससे सामाजिक बंटवारा बढ़ रहा है। उनका कहना है कि इससे गांव की सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो रही है और एकता में दरार आ रही है।
पेसा कानून और ग्राम सभा पर सवाल
इस विवाद के बाद बजरंग दल के सिकंदर कश्यप ने कहा कि बस्तर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है और यहां पेसा कानून के तहत ग्राम सभा की अनुमति अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कुछ मिशनरी संगठन गांवों की परंपराओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं, विहिप के घनश्याम नाग ने कहा कि हर समाज को अपनी परंपराओं और ग्राम व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से इस प्रकार के विवादों को हल करने के लिए एक ठोस नीति बनाने की मांग की।
इससे पहले भी हुए हैं ऐसे विवाद
बस्तर क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में इसी तरह के कई विवाद सामने आए हैं। नारायणपुर, कोंडागांव, बस्तर और दंतेवाड़ा जिलों में मतांतरण और धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले साल नारायणपुर के एड़का गांव में भी शव दफनाने को लेकर बड़ा विवाद हुआ था, जिसमें कई ग्रामीण गिरफ्तार हुए थे और एसपी घायल हो गए थे।
पेसा कानून पर फिर उठे सवाल
बस्तर करंदोला विवाद ने एक बार फिर पेसा कानून और ग्राम सभा की शक्तियों को चर्चा में ला दिया है। बस्तर के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र होने के कारण ग्राम सभा और पारंपरिक व्यवस्था को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की भूमि, परंपराएं और सामुदायिक निर्णय ग्राम सभा की सहमति से ही तय होने चाहिए। यही कारण था कि करंदोला गांव के लोग अपने पारंपरिक नियमों पर अड़े रहे और शव को दफनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया।
FAQ
1 .क्या विवाद का कारण सिर्फ शव दफनाना था?
नहीं, यह परंपराओं और ग्राम सभा की सहमति से जुड़ा था।
2 .बस्तर में पेसा कानून पर चर्चा क्यों हो रही है?
बस्तर में पेसा कानून के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।
3 .क्या प्रशासन ने स्थिति को संभाला?
हां, प्रशासन ने शव को कब्रिस्तान भेजा और दोनों पक्षों को समझाया।
4 .क्या पहले भी इस तरह के विवाद हुए हैं?
हां, नारायणपुर और अन्य जगहों पर ऐसे विवाद हो चुके हैं।
5 .गांववालों का आरोप क्या था?
गांववालों का आरोप था कि मतांतरण से पारंपरिक व्यवस्था कमजोर हो रही है।
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