जंगलों में 700 करोड़ की रोड पॉलिटिक्स; नक्सल मुक्त इलाकों में तेज होगी सरकारी एंट्री
Raipur। छत्तीसगढ़ में अब जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि रणनीतिक गलियारे में तब्दील होते दिख रहे हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे वन इलाकों पर सरकार का बढ़ता फोकस कई सवालों और संकेतों को एक साथ जन्म दे रहा है।
करीब 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की कार्ययोजना तैयार कर केंद्र से मंजूरी मांगी गई है, जिसके तहत जंगलों के भीतर सड़क, पुल-पुलिया और बुनियादी ढांचे का विस्तार किया जाएगा। सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि इससे औद्योगिक घरानों की एंट्री आसान हो सकती है।
मंत्रालय महानदी भवन में मुख्य सचिव विकासशील की अध्यक्षता में हुई कैम्पा की बैठक में साफ संदेश दिया गया कि वन क्षेत्रों में अब एक्टिव गवर्नेंस का मॉडल लागू होगा। यानी जहां पहले प्रशासन की पहुंच सीमित थी, वहां अब सड़कों के जरिए सीधी दखल बढ़ाई जाएगी। खासकर वे इलाके जो हाल ही में नक्सल प्रभाव से बाहर आए हैं, सरकार के फोकस में सबसे ऊपर हैं।
क्यों अहम है बस्तर-सरगुजा?
बस्तर और सरगुजा लंबे समय से नक्सल हिंसा और भौगोलिक चुनौतियों के कारण विकास की मुख्यधारा से कटे रहे हैं। लेकिन अब यही इलाके सरकार के लिए डुअल एडवांटेज बन गए हैं। एक तरफ यहां सुरक्षा की स्थिति में सुधार हुआ है, दूसरी ओर खनिज और वन संसाधनों की प्रचुरता इन्हें आर्थिक दृष्टि से अहम बनाती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सड़क और पुल निर्माण सिर्फ सुविधा का मामला नहीं, बल्कि यह कंट्रोल और कनेक्टिविटी की रणनीति है। जहां सड़क जाती है, वहां शासन की पहुंच अपने आप बढ़ जाती है। यही वजह है कि नक्सल मुक्त क्षेत्रों में सबसे पहले इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जा रहा है।
ग्राउंड रियलिटी: आज भी कटे हैं गांव
सूत्र बताते हैं कि बस्तर और सरगुजा के कई गांव आज भी ऐसे हैं, जहां तक पहुंचने में घंटों नहीं बल्कि पूरा दिन लग जाता है। बारिश के मौसम में ये इलाके पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाते हैं। ऐसे में पुल-पुलिया और सड़क निर्माण को स्थानीय लोग भी राहत के तौर पर देख रहे हैं।
700 करोड़ की योजना, केंद्र की मंजूरी का इंतजार
वन विभाग ने 2026-27 के लिए 713 करोड़ 73 लाख रुपए की वार्षिक कार्ययोजना तैयार कर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेज दी है। इस योजना में स्पष्ट रूप से अधोसंरचना विकास को प्राथमिकता दी गई है।मुख्य सचिव ने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए हैं कि कैम्पा फंड का उपयोग सिर्फ औपचारिकता न बने, बल्कि इसका असर जमीन पर दिखे। खास तौर पर नक्सल मुक्त इलाकों में तेजी से काम पूरा करने पर जोर दिया गया है।
कैम्पा फंड: ग्रीन कवर से आगे की कहानी
कैम्पा मद अब सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रहा। इसके तहत बांस वनों की बहाली, वन घनत्व बढ़ाने के लिए सिल्वीकल्चर, वन्यजीव आवास सुधार और जल संरक्षण जैसे काम भी किए जा रहे हैं। यानी यह फंड अब पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन बनाने का माध्यम बन रहा है।
औद्योगिक एंगल पर भी नजर
योजना को लेकर यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि बेहतर कनेक्टिविटी से औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा। बस्तर और सरगुजा में खनिज संसाधनों की उपलब्धता पहले से ही उद्योगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। ऐसे में सड़क नेटवर्क मजबूत होने से लॉजिस्टिक्स आसान होगा और निवेश की राह खुल सकती है।
सवालों के घेरे में योजना
हालांकि, इस पूरी कवायद के बीच कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। क्या पहले के कैम्पा फंड का सही उपयोग हुआ? क्या नई परियोजनाओं में पारदर्शिता रहेगी? और सबसे अहम क्या विकास के नाम पर पर्यावरणीय संतुलन से समझौता तो नहीं होगा?
फिलहाल तस्वीर साफ है सरकार Bastarऔर Surguja को विकास के नए मॉडल के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन यह मॉडल जमीन पर कितना सफल होगा, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।
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