इलाज पूरा, बाघ स्वस्थ… फिर जंगल सफारी में कैद क्यों?
RAIPUR : 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर देशभर में बाघ संरक्षण की उपलब्धियों का ढोल पीटा जाएगा। छत्तीसगढ़ में भी बाघों की बढ़ती संख्या को लेकर दावे होंगे। सरकार बताएगी कि राज्य में बाघों की संख्या 2022 के 17 से बढ़कर अप्रैल 2025 तक 35 हो गई है।
अचानकमार टाइगर रिजर्व को राज्य में सबसे ज्यादा बाघों वाला क्षेत्र बताया जा रहा है और उदंती-सीतानदी तथा गुरु घासीदास-तमोर पिंगला में दूसरे राज्यों से बाघ लाने की तैयारी चल रही है। लेकिन इसी छत्तीसगढ़ में एक सवाल वन विभाग के सामने मुंह बाए खड़ा है-जब एक घायल बाघ को बचाकर स्वस्थ कर दिया गया, तो उसे जंगल में वापस भेजने में 15 महीने क्यों लग रहे हैं?
यह कहानी बीजापुर के उस युवा बाघ की है, जो मार्च 2025 में शिकारियों के लोहे के तार वाले फंदे में फंसकर गंभीर रूप से घायल हो गया था। उसके पिछले दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए। घाव बढ़ता गया और संक्रमण की स्थिति पैदा हो गई। इसी दौरान बाघ और एक शिकारी के बीच हुई मुठभेड़ में शिकारी की मौत की बात सामने आई।
इसके बाद ग्रामीणों से सूचना मिलने पर वन विभाग ने बाघ को रेस्क्यू किया और 16 अप्रैल 2025 को रायपुर के जंगल सफारी ले आए। यहां उसका इलाज शुरू हुआ और 30 जुलाई को सर्जरी की गई। बाघ को अलग रखा गया, ताकि मानव संपर्क कम से कम हो और भविष्य में उसके जंगल लौटने की संभावना बनी रहे।
रिपोर्ट में बाघ स्वस्थ, फिर भी कैद में
नवंबर 2025 तक बाघ की हालत में उल्लेखनीय सुधार हो चुका था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, चार डॉक्टरों की टीम ने उसकी जांच की। रिपोर्ट में बाघ के स्वस्थ और जागरूक होने, सर्जरी का घाव पूरी तरह भरने और ऑपरेशन किए गए पैर पर पूरा भार डाल पाने की बात दर्ज थी। वह चल पा रहा था और घायल पंजा भी सामान्य स्थिति में बताया गया।
चलने, दौड़ने और बैठकर उठने के दौरान दर्द के स्पष्ट लक्षण नहीं मिले। कभी-कभी हल्की लंगड़ाहट जरूर दिखाई दी, लेकिन दौड़ते समय लंगड़ाहट नहीं देखी गई। यानी इलाज के बाद बाघ की शारीरिक स्थिति इतनी सुधर चुकी थी कि उसके जंगल लौटने की संभावना पर गंभीरता से काम शुरू किया जाना चाहिए था।, लेकिन इसके बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा।
फाइल चली, बाघ नहीं चला
बताया गया कि बाघ को पहले बड़े बाड़े में रखकर उसकी शिकार करने की क्षमता और प्राकृतिक जीवन जीने की योग्यता का परीक्षण किया जाना था। इसके बाद सॉफ्ट रिलीज के जरिए उसे जंगल में वापस छोड़ने की योजना पर विचार होना था, लेकिन मामला अनुमति, विशेषज्ञ राय और समिति के बीच उलझता चला गया।
फरवरी 2026 में देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान यानी डब्लूआईआई से विशेषज्ञों की राय लेने के लिए पत्राचार किए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बावजूद महीनों तक विशेषज्ञों के प्रत्यक्ष निरीक्षण की बात सामने नहीं आई।
24 जून को दोबारा पत्र भेजे जाने के बाद चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की सलाह मिलने की जानकारी है। सवाल यह है कि अगर बाघ को जंगल में छोड़ने से पहले वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी था, तो यह प्रक्रिया उसके स्वस्थ होने के तुरंत बाद क्यों नहीं शुरू की गई?
तीन बाघ बाहर से लाने की तैयारी
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों से बाघ लाने की योजनाओं पर काम चल रहा है। उदंती-सीतानदी में हाल के महीनों में तीन बाघों की आवाजाही कैमरा ट्रैप में दर्ज होने की रिपोर्ट है और वहां मध्य प्रदेश से दो बाघिनें लाकर प्रजनन आबादी विकसित करने का प्रस्ताव भी सामने आया है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है-जब राज्य अपने जंगलों में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए बाहर से बाघ लाने की तैयारी कर रहा है, तब बीजापुर से रेस्क्यू किए गए स्वस्थ बाघ को उसके प्राकृतिक घर में वापस भेजने की व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही?
बाघ संरक्षण सिर्फ संख्या गिनना नहीं
छत्तीसगढ़ में 2022 की गणना में 17 बाघ दर्ज हुए थे, जबकि अप्रैल 2025 के राज्य सर्वे में संख्या 35 बताई गई। यह निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन बाघ संरक्षण का मतलब सिर्फ आंकड़ा बढ़ाना नहीं है। बीजापुर का यह मामला उससे बड़ा सवाल पूछ रहा है।
क्या वन विभाग के पास घायल और स्वस्थ हो चुके बाघों के पुनर्वास की स्पष्ट समयबद्ध नीति है? लंबे समय तक कैद और मानव संपर्क से वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पर असर पड़ने का जोखिम रहता है।
ऐसे में एक स्वस्थ बाघ की जंगल वापसी जितनी देर से होगी, उसके पुनर्वास की चुनौती उतनी ही बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर भाषणों और आंकड़ों के बीच बीजापुर के इस बाघ को लेकर वन विभाग से सिर्फ एक ही सवाल है।
जब इलाज पूरा हो गया, डॉक्टरों ने स्वस्थ बता दिया, पैर पर पूरा वजन पड़ रहा है और बाघ दौड़ भी सकता है, तो फिर जंगल जाने की उसकी बारी कब आएगी? बाघ को बचाना पहला कदम था। उसे उसके जंगल तक वापस पहुंचाना असली संरक्षण है। इस संबंध में वन विभाग के अधिकारी कुछ भी बोलने से साफ बच रहे हैं।
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