बोधघाट बांध परियोजना : बस्तर में सर्वे शुरू, 56 गांवों पर विस्थापन का खतरा बढ़ा

Aishwarya Dwivedi | May 28, 2026, 13:40 IST
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बस्तर में दशकों से लंबित 30 हजार करोड़ की बोधघाट परियोजना का सर्वे दोबारा शुरू हो गया है, जिससे 56 गांवों के विस्थापन और घने जंगलों के डूबने के खतरे के कारण स्थानीय आदिवासियों में कड़ा विरोध है।

NEWS IN SHORT

जल संसाधन विभाग ने बोधघाट बांध का सर्वे दोबारा शुरू किया।


परियोजना से 56 आदिवासी गांव डूब क्षेत्र में आ जाएंगे।


बांध के कारण 5,700 हेक्टेयर घना जंगल जलमग्न होगा।


बिना सहमति और पुनर्वास योजना के काम शुरू करने का विरोध।


परियोजना से बस्तर के चार जिलों में सिंचाई सुविधा मिलेगी।



NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में दशकों से लंबित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना (Bodhghat Multipurpose Project) को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार के निर्देश पर जल संसाधन विभाग (WRD) ने इंद्रावती नदी पर बनने वाले इस प्रस्तावित बांध का सर्वे काम दोबारा शुरू कर दिया है। दंतेवाड़ा के जिला कलेक्टर देवेश ध्रुव ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि सर्वे को अगले 7 से 8 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए विभिन्न एजेंसियों की टीमें लगातार क्षेत्र का दौरा कर रही हैं।



हालाँकि, इस फैसले ने स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरणविदों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना (Rehabilitation Plan) और जानकारी के शुरू हुए इस सर्वे से बस्तर के गांवों में विस्थापन और अनिश्चितता का डर फैल गया है।



परियोजना का इतिहास और नया खाका

बोधघाट परियोजना बस्तर की सबसे पुरानी नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है, जिसकी परिकल्पना पहली बार 1979 में की गई थी। 1984 में इसके लिए विश्व बैंक से कर्ज भी मंजूर हुआ था, लेकिन आदिवासियों के कड़े विरोध, भारी विस्थापन और जंगलों के नुकसान को देखते हुए 1987 में इसे रोक दिया गया था। अब वर्ष 2020 में तैयार संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के आधार पर इसे पुनर्जीवित किया जा रहा है।



रिपोर्ट तैयार करने की लागत 34.91 करोड़ है, जबकि पूरे प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग 30 हजार करोड़ रूपए आंकी गई है। कंसल्टेंट को DPR पूरा करने के लिए 31 दिसंबर, 2027 तक का समय मिला है। बांध की नदी तल से ऊंचाई 67 मीटर और जलभराव का स्तर 452 मीटर होगा। इसकी जल भंडारण क्षमता 2,727 मिलियन क्यूबिक मीटर और शुरुआती पनबिजली क्षमता 125 मेगावाट (जिसे 300 मेगावाट तक बढ़ाया जा सकता है) होगी।



Project History and New Blueprint


विस्थापन और पर्यावरण का बड़ा संकट

नए प्रशासनिक अनुमानों के मुताबिक, इस परियोजना के कारण बस्तर की अमूल्य प्राकृतिक संपदा और इंसानी बस्तियों को भारी नुकसान होगा। 56 गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से डूब क्षेत्र (Submergence Zone) में आ सकते हैं 200 गांवों पर इस परियोजना का सीधा या परोक्ष असर पड़ेगा। 10,441 हेक्टेयर जमीन जलमग्न होगी, जिसमें 5,700 हेक्टेयर से अधिक घना जंगल शामिल है। इस वन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है।



स्थानीय आदिवासियों का कड़ा विरोध

'सर्व आदिवासी समाज' और स्थानीय ग्रामीणों ने सरकार की इस कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए हैं। सर्व आदिवासी समाज (दंतेवाड़ा) के अध्यक्ष सुरेश कर्मा ने कहा कि सरकार ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि प्रभावित हजारों आदिवासियों को कहां और किन शर्तों पर बसाया जाएगा। उन्होंने नाराजगी जताई कि स्थानीय ग्रामीणों और ग्राम सभाओं से सहमति लिए बिना ही सर्वे शुरू कर दिया गया, जबकि इस डूब क्षेत्र में आदिवासियों के पारंपरिक आस्था के केंद्र और स्थानीय देवी-देवता भी आते हैं।



ग्रामीणों का आरोप है कि इस साल मार्च में तेलंगाना की एक टीम 'भारत सरकार' लिखी गाड़ियों में सड़क और बाढ़ नियंत्रण के काम का बहाना बनाकर गुपचुप तरीके से सर्वे करने आई थी, जिसे विरोध के बाद वापस लौटना पड़ा। वहीं, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने चेतावनी दी है कि यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आता है, इसलिए बिना ग्राम सभाओं की सहमति के कोई भी काम आगे बढ़ाना अवैध है और यह विकास नहीं बल्कि तबाही लाएगा।



प्रशासन का पक्ष

दूसरी तरफ, जिला कलेक्टर देवेश ध्रुव ने किसी भी बड़े विरोध की जानकारी से इनकार किया है। उनका कहना है कि यदि कुछ समूहों या लोगों की चिंताएं हैं, तो उन्हें उचित प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाया जाएगा। प्रशासन का दावा है कि इस परियोजना से इंद्रावती बेसिन के 4 जिलों के 236 गांवों की 3.78 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई, पेयजल और उद्योगों को पानी मिलेगा, जिससे अंततः बस्तर का विकास होगा। बहरहाल, बिना भरोसे में लिए शुरू हुए इस सर्वे ने बस्तर में एक नए जन-आंदोलन की जमीन तैयार कर दी है।



TIMELINE

  • 1979: परियोजना की पहली बार परिकल्पना की गई।
  • 1984: विश्व बैंक द्वारा परियोजना के लिए कर्ज मंजूर हुआ।
  • 1987: आदिवासी विरोध और पर्यावरण नुकसान के कारण प्रोजेक्ट रुका।
  • 2020: नए सिरे से संशोधित DPR का खाका तैयार हुआ।
  • मार्च 2026: बाहरी टीम द्वारा गुपचुप सर्वे का प्रयास, ग्रामीणों ने खदेड़ा।
  • मई 2026 (वर्तमान): आधिकारिक सर्वे शुरू, 7-8 महीने में पूरा करने का लक्ष्य।
  • दिसंबर 2027: कंसल्टेंट द्वारा अंतिम DPR सौंपने की आखिरी समयसीमा।

निष्कर्ष

बोधघाट बांध परियोजना बस्तर के विकास और आदिवासी अस्तित्व के बीच एक गंभीर टकराव का रूप ले चुकी है। सिंचाई और बिजली के फायदे एक तरफ हैं, लेकिन ग्राम सभाओं की अनदेखी, भारी पर्यावरण नुकसान और बिना पुनर्वास के 56 गांवों का विस्थापन इस महत्वाकांक्षी परियोजना को बड़े जन-आंदोलन की ओर धकेल रहा है।



FAQ

  1. बोधघाट परियोजना क्या है और यह किस नदी पर बन रही है?
    यह छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की एक प्रमुख बहुउद्देशीय (Multipurpose) परियोजना है, जिसे इंद्रावती नदी पर बनाने की योजना है। इसका उद्देश्य बस्तर क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और पनबिजली (Hydroelectricity) का उत्पादन करना है।
  2. . इस परियोजना की अनुमानित लागत और क्षमता क्या है?
    कुल लागत: लगभग ₹30,000 करोड़। बिजली उत्पादन: शुरुआती क्षमता 125 मेगावाट, जिसे 300 मेगावाट तक बढ़ाया जा सकता है। सिंचाई क्षमता: इंद्रावती बेसिन के 4 जिलों के 236 गांवों की 3.78 लाख हेक्टेयर भूमि।
  3. यह परियोजना इतने सालों (1987 से) क्यों रुकी हुई थी?
    1979 में शुरू हुई इस परियोजना को 1984 में विश्व बैंक से कर्ज मिला था। लेकिन आदिवासियों के उग्र आंदोलन, जंगलों की कटाई और विस्थापन के बड़े संकट को देखते हुए 1987 में इसे पूरी तरह रोक दिया गया था। अब 2020 की नई रिपोर्ट (DPR) के आधार पर इसे दोबारा शुरू किया जा रहा है।


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