निर्यात शुल्क बढ़ने से बिगड़ा गणित, Bsp ई-ऑक्शन मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
समझें क्या है पूरा मामला
- BSP ई-ऑक्शन विवाद में हाई कोर्ट का फैसला
- 10 लाख जब्ती पर कामधेनु को नहीं मिली राहत
- 22 लाख के सौदे पर हाई कोर्ट सख्त
- निर्यात शुल्क बढ़ा, सौदा अटका, याचिका खारिज
- BSP मामले में मध्यस्थता का रास्ता साफ
Bilaspur। भिलाई स्टील प्लांट (BSP) के ई-ऑक्शन से जुड़े एक मामले में बिलासपुर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कामधेनु ट्रेडिंग की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने 10 लाख रुपए की बयाना राशि (Earnest Money Deposit) जब्त किए जाने और जीएसटी राशि वापस नहीं मिलने को चुनौती दी थी।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला संविदा यानी अनुबंध से जुड़ा हुआ है। ऐसे विवादों के समाधान के लिए अनुबंध में मध्यस्थता (Arbitration) का प्रावधान मौजूद है। इसलिए सीधे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करना उचित नहीं है।
22 लाख रुपए के सौदे पर आया था संकट
यह मामला भिलाई स्टील प्लांट के ऑनलाइन फॉरवर्ड ऑक्शन से जुड़ा है। कामधेनु ट्रेडिंग कंपनी की प्रोपराइटर दीप्ति अग्रवाल ने BSP के ई-ऑक्शन में हिस्सा लिया था। कंपनी को सफल बोलीदाता घोषित किया गया था।
इसके बाद कंपनी ने सौदे की प्रक्रिया के तहत 10 लाख रुपए की बयाना राशि सहित कुल करीब 22 लाख रुपए जमा कर दिए थे। लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं।
निर्यात शुल्क बढ़ने से बिगड़ा व्यापार गणित
कंपनी की ओर से कोर्ट में बताया गया कि 21 मई 2022 को केंद्र सरकार ने निर्यात शुल्क में बड़ा बदलाव किया। लौह उत्पादों पर निर्यात शुल्क 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया।
कंपनी का तर्क था कि अचानक शुल्क बढ़ने से बाजार की स्थिति बदल गई और इस सौदे को पूरा करना आर्थिक रूप से संभव नहीं रह गया। इसके बाद कंपनी ने BSP प्रबंधन से राहत देने की मांग की थी।
BSP ने जब्त कर ली थी राशि
कामधेनु ट्रेडिंग के अनुसार, राहत नहीं मिलने के बाद BSP ने 29 जून 2022 को पत्र जारी कर कंपनी की जमा 10 लाख रुपए की बयाना राशि और जीएसटी राशि जब्त कर ली। इसके खिलाफ कंपनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर राशि वापस करने की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा- मध्यस्थता प्रक्रिया अपनाएं
सुनवाई के दौरान BSP की ओर से अधिवक्ता डॉ. सौरभ कुमार पांडे ने कोर्ट को बताया कि ऑनलाइन ऑक्शन की शर्तों में साफ लिखा है कि किसी भी विवाद का समाधान मध्यस्थता के जरिए किया जाएगा।
हाई कोर्ट ने जब याचिकाकर्ता से इस संबंध में जानकारी मांगी तो कंपनी की ओर से भी माना गया कि अनुबंध में मध्यस्थता की शर्त मौजूद है।
संविदात्मक विवाद में नहीं होगा सीधा हस्तक्षेप
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब दोनों पक्षों ने अनुबंध करते समय विवाद समाधान के लिए एक प्रक्रिया तय की है, तो ऐसे मामलों में सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि निर्यात शुल्क बढ़ने से व्यापार प्रभावित होना और बयाना राशि जब्त करना दोनों ही अनुबंध की शर्तों से जुड़े विषय हैं। इनका फैसला मध्यस्थता मंच के जरिए ही किया जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कंपनी कानून के अनुसार मध्यस्थता या अन्य वैधानिक विकल्प अपना सकती है।
FAQ
- हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
हाई कोर्ट ने कामधेनु ट्रेडिंग की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) विवाद है और इसका समाधान मध्यस्थता (Arbitration) के जरिए किया जाना चाहिए। - कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया था?
कंपनी ने BSP द्वारा 10 लाख रुपए की बयाना राशि (EMD) और जीएसटी राशि जब्त किए जाने को चुनौती देते हुए रकम वापस करने की मांग की थी। - विवाद की मुख्य वजह क्या थी?
कंपनी का कहना था कि केंद्र सरकार द्वारा लौह उत्पादों पर निर्यात शुल्क 15% से बढ़ाकर 50% किए जाने के बाद सौदा आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं रहा, इसलिए वह अनुबंध पूरा नहीं कर सकी।
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