छग-मप्र, राजस्थान के हेल्थ सिस्टम की खुली पोल, 10 में 6 मौतों के वक्त डॉक्टर गायब
News in Short
- बिहार और झारखंड के बाद छत्तीसगढ़ तीसरे नंबर पर
- 60.4% मौतों के समय प्रशिक्षित मेडिकल कर्मी मौजूद नहीं थे
- डॉक्टरों के पद खाली, गांवों में झोलाछापों का राज
- नए मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टर नहीं मिल रहे
- करोड़ों खर्च के बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल
News in Detail
एक राष्ट्रीय रिपोर्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारी दावों की पोल खोल दी है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान इस सूची में क्रमशः तीसरे और चौथे स्थान पर हैं।
छत्तीसगढ़ में जितनी मौतें हुईं, उनमें से 60.4 प्रतिशत मरीजों की मौत ऐसे समय हुई, जब कोई प्रशिक्षित मेडिकल कर्मी मौजूद नहीं था। जबकि राजस्थान में 54.2 प्रतिशत मरीजों के पास डॉक्टर मौजूद नहीं थे। मप्र के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। यहां भी 100 में से 40 मरीज झोलछाप के हाथों मर रहे हैं।
छग तीसरे और राजस्थान चौथे नंबर पर
रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में बिहार 62 प्रतिशत और झारखंड 61.8 प्रतिशत के साथ पहले और दूसरे स्थान पर हैं। छत्तीसगढ़ 60.4 प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर है। इसके बाद राजस्थान 54.2 प्रतिशत के साथ चौथे स्थान पर है। सवाल यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के दावों के बावजूद छत्तीसगढ़ की हालत आखिर इतनी खराब क्यों है?
झोलाछापों के भरोसे चल रहा इलाज
विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़ी संख्या में लोग आज भी झोलाछाप डॉक्टरों, अप्रमाणित स्वास्थ्यकर्मियों और घरेलू इलाज पर निर्भर हैं। गांवों और दूरस्थ इलाकों में मरीज अक्सर अस्पताल पहुंचने से पहले ऐसे लोगों के पास जाते हैं। कई बार हालत बिगड़ने तक इलाज चलता रहता है और जब तक मरीज अस्पताल पहुंचता है, बहुत देर हो चुकी होती है।
अगर इन मरीजों को समय रहते प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों तक पहुंचाया जाता, तो मौतों के आंकड़े काफी कम हो सकते थे। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी अस्पतालों में लंबी कतारें, जांच की कमी, बेड की समस्या और डॉक्टरों की अनुपलब्धता लोगों को वैकल्पिक रास्तों की ओर धकेल रही है।
चार साल में भयावह उछाल
सबसे चौंकाने वाली बात राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दे रही है। वर्ष 2020 में बिना प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की मौजूदगी वाली मौतों का राष्ट्रीय औसत करीब 18 प्रतिशत था। अब यह बढ़कर 45.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह बदलाव सिर्फ चिंता का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र के लिए चेतावनी माना जा रहा है।
करोड़ों खर्च, फिर भी डॉक्टर नहीं
राज्य सरकार मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और स्वास्थ्य योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है। लगातार नए भवन बन रहे हैं। मशीनें खरीदी जा रही हैं। योजनाएं लॉन्च हो रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि भवनों में डॉक्टर कहां हैं?
विशेषज्ञ डॉक्टरों के 10,773 स्वीकृत पदों में से 1,418 पद खाली हैं। दंत चिकित्सकों के 112 पदों में से 102 पद रिक्त हैं। बस्तर संभाग में तो कई स्थानों पर नियमित डेंटल डॉक्टर तक नहीं हैं। ऐसे में ग्रामीण मरीजों को इलाज कहां से मिलेगा, यह बड़ा सवाल है।
नए मेडिकल कॉलेजों में पहले से संकट
दंतेवाड़ा, कवर्धा, मनेंद्रगढ़, जांजगीर-चांपा और जशपुर में नए मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं। सरकार ने फैकल्टी के 175 पदों के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए। लेकिन तस्वीर चौंकाने वाली रही। सिर्फ 9 डॉक्टर पहुंचे और मात्र 8 की नियुक्ति हो सकी।यह स्थिति बताती है कि केवल मेडिकल कॉलेज खोलना पर्याप्त नहीं है। वहां पढ़ाने और इलाज करने वाले डॉक्टर भी चाहिए।
बस्तर-सुकमा में सबसे गंभीर हालात
आदिवासी अंचलों की तस्वीर सबसे ज्यादा चिंताजनक है। सुकमा में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 32 पदों में से 31 पद खाली हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में अतिरिक्त वेतन और प्रोत्साहन देने के बाद भी डॉक्टर सेवा देने के लिए तैयार नहीं हो रहे।
कई गांव ऐसे हैं, जहां मरीज को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। एंबुलेंस की उपलब्धता सीमित है। सड़क और संचार सुविधाएं कमजोर हैं। ऐसे में कई मौतें घरों में ही हो जाती हैं।
एम्स रायपुर भी नहीं बचा संकट से
स्थिति केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। रायपुर स्थित एम्स में भी पिछले तीन वर्षों में 35 डॉक्टर इस्तीफा दे चुके हैं। लगभग 40 प्रतिशत फैकल्टी पद खाली बताए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों से आने वाले मरीजों के चलते यहां बहुत अधिक दबाव रहता है। जब देश के प्रमुख संस्थानों में से एक ऐसी चुनौती से जूझ रहा हो, तब राज्य के छोटे अस्पतालों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्यों छोड़ रहे सरकारी नौकरी?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार निजी अस्पतालों के आकर्षक पैकेज डॉक्टरों को अपनी ओर खींच रहे हैं। दूसरी ओर सरकारी सेवा में संविदा नियुक्तियों पर ज्यादा निर्भरता है। नियमित भर्ती की गति धीमी है। सुविधाओं और करियर ग्रोथ की कमी भी बड़ी वजह मानी जा रही है।यही कारण है कि डॉक्टर सरकारी व्यवस्था में टिक नहीं पा रहे हैं और इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है।
केरल ने दिखाया रास्ता
रिपोर्ट में केरल सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल है। वहां केवल 26.8 प्रतिशत मौतों के समय प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी मौजूद नहीं थे। कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों का प्रदर्शन भी छत्तीसगढ़ से बेहतर रहा।
FAQ
- किस राज्य में मौतों के समय प्रशिक्षित मेडिकल कर्मी सबसे कम मौजूद थे?
छत्तीसगढ़ में 60.4% मौतों के समय डॉक्टर मौजूद नहीं थे। - छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों और दंत चिकित्सकों के कितने पद खाली हैं?
डॉक्टरों के 10,773 पदों में 1,418 खाली, दंत चिकित्सकों के 112 पदों में 102 रिक्त। - नए मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी नियुक्ति की स्थिति क्या है?
175 पदों के लिए सिर्फ 9 डॉक्टर पहुंचे और 8 की नियुक्ति हुई।
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