ACB ट्रैप केस में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 2 बरी

Umeshwari Baghel | Jul 12, 2026, 19:00 IST
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
सीजी हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिश्वत मांगने का पुख्ता सबूत जरूरी है। सिर्फ पैसे बरामद होने से दोष साबित नहीं होता। बिना 65-B सर्टिफिकेट और वॉइस ऑथेंटिकेशन रिकॉर्डिंग को मान्य नहीं माना गया।

समझें क्या है पूरा मामला

Bilaspur। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की बिलासपुर बेंच ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि रिश्वतखोरी के मामले में आरोपी को दोषी ठहराने के लिए रिश्वत मांगने का स्पष्ट और भरोसेमंद सबूत होना जरूरी है। सिर्फ रिश्वत की रकम बरामद होना दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।



हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।



वॉइस रिकॉर्डिंग को नहीं माना गया भरोसेमंद सबूत

मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने पाया कि रिश्वत मांगने की कथित बातचीत की रिकॉर्डिंग पेश की गई थी। हालांकि इस रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता को लेकर जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।



कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत के तौर पर पेश करने के लिए इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65-B के तहत प्रमाण पत्र जरूरी होता है। इसके अलावा रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की पहचान के लिए वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण होती है।



इस मामले में जांच एजेंसी आरोपियों और शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल हासिल नहीं कर सकी थी। रिकॉर्डिंग की आवाज को प्रमाणित करने के लिए भी पर्याप्त प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी।



ये है पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार शिकायतकर्ता की पत्नी की सैलरी कई महीनों से रुकी हुई थी। आरोप था कि वेतन जारी करने के बदले 5 हजार रुपये रिश्वत मांगी गई थी।



शिकायतकर्ता ने एंटी करप्शन ब्यूरो की मदद से बातचीत रिकॉर्ड की थी। इसके बाद 12 अक्टूबर 2010 को ट्रैप कार्रवाई की गई थी। इस दौरान आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद होने का दावा किया गया था।



इसी आधार पर विशेष न्यायालय ने आरोपियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। इसके बाद फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।



जांच में सामने आईं कई कमियां

सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि आरोपियों और शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल नहीं लिए गए थे। रिकॉर्ड की गई बातचीत भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी।



गवाहों ने बताया कि रिकॉर्डिंग में कई लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। ऐसे में यह तय करना मुश्किल था कि रिश्वत मांगने वाली आवाज किसकी थी।



हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्डर जब्त होने से पहले कई दिनों तक शिकायतकर्ता के पास रहा था। इसलिए उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।



हाई कोर्ट ने रद्द किया निचली अदालत का फैसला

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिश्वत की मांग साबित करना सबसे अहम पहलू है। केवल रिश्वत की रकम मिलने से आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता।



हाई कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि टेप रिकॉर्डिंग को सबूत मानने के लिए आवाज की पहचान, रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता और उसमें छेड़छाड़ नहीं होने का प्रमाण जरूरी है।



इन कमियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही दोनों सरकारी कर्मचारियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।



महत्वपूर्ण तथ्य

फैसला: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की बिलासपुर बेंच ने भ्रष्टाचार मामले में अहम निर्णय दिया।



मुख्य बात: रिश्वत मांगने का स्पष्ट सबूत होना दोषसिद्धि के लिए जरूरी है।



बरी हुए आरोपी: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को राहत मिली।



रिकॉर्डिंग पर सवाल: रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग को कोर्ट ने प्रमाणिक नहीं माना।



कानूनी कमी: रिकॉर्डिंग के लिए इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65-B सर्टिफिकेट पेश नहीं किया गया था।



वॉइस जांच: आरोपियों और शिकायतकर्ता के वॉइस सैंपल नहीं लिए गए थे।



कोर्ट की टिप्पणी: सिर्फ रिश्वत की रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं है।



मामले की कार्रवाई: 12 अक्टूबर 2010 को एंटी करप्शन ब्यूरो ने ट्रैप कार्रवाई की थी।



रिश्वत राशि: शिकायतकर्ता से 5 हजार रुपये मांगने का आरोप था।



अंतिम फैसला: हाई कोर्ट ने निचली अदालत की सजा रद्द कर दोनों आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया।



FAQ

  1. बिलासपुर हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में क्या फैसला दिया?
    हाई कोर्ट ने दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिश्वत मांगने का पुख्ता सबूत नहीं होने पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
  2. क्या सिर्फ रिश्वत की रकम बरामद होने से सजा हो सकती है?
    नहीं। कोर्ट ने कहा कि केवल रिश्वत की रकम मिलना पर्याप्त नहीं है। रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का ठोस प्रमाण जरूरी है।
  3. वॉइस रिकॉर्डिंग को कोर्ट ने क्यों नहीं माना?
    कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्डिंग के लिए धारा 65-B सर्टिफिकेट, वॉइस सैंपल और फॉरेंसिक जांच जैसी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी नहीं की गई थीं।

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