375 कैदियों की मौत का काला सच, बीमारी बताकर मामले को दबाने की साजिश!

VINAY VERMA | Sept 04, 2026, 19:09 IST
कैदियों की मौत
छत्तीसगढ़ की जेलों में बंदियों की मौत और लंबित जांच रिपोर्ट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2021 से 25 जून 2026 तक जेलों में 375 बंदियों की मौत हुई है, जबकि 62 मामलों की जांच रिपोर्ट अब तक लंबित है।

बिलासपुर जेल में बंदी श्रवण सूर्यवंशी की मौत ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की जेल व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामला इतना गंभीर हुआ कि पुलिस महानिदेशक अरुण गौतम को फटकार का सामना करना पड़ा। इसके बाद सवाल सिर्फ श्रवण की मौत तक सीमित नहीं रहे। अब जेलों में बंदियों की मौत, जांच की रफ्तार और मौत के कारणों की रिपोर्टिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं।



375 मौतों का आंकड़ा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी 2021 से 25 जून 2026 तक प्रदेश की जेलों में 375 बंदियों की मौत दर्ज हुई। इनमें 373 मामलों में दंडाधिकारी या न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। लेकिन 62 मामलों की जांच रिपोर्ट अब तक संबंधित विभाग तक नहीं पहुंची है। 311 मामलों की रिपोर्ट मिल चुकी है। यानी मौत के मामलों में जांच शुरू होना और उसका निष्कर्ष सामने आना दो अलग-अलग बातें बनी हुई हैं।



2022 सबसे घातक साल

आंकड़ों में 2022 सबसे गंभीर नजर आता है। इस साल जेलों में 90 बंदियों की मौत हुई। 2024 में 67 और 2025 में 55 मौतें दर्ज हुईं। 2026 में 25 जून तक ही 35 बंदियों की मौत हो चुकी है। इनमें सिर्फ तीन मामलों की जांच रिपोर्ट मिली है, जबकि 32 रिपोर्ट अभी लंबित हैं। 2025 की 55 मौतों में 28 जांच रिपोर्ट मिलीं और 27 मामले लंबित रहे। 2024 की 67 मौतों में भी तीन जांच रिपोर्ट बाकी हैं।



पुराने मामलों में भी सवाल

वर्ष 2021 और 2023 के सभी जांच प्रतिवेदन विभाग को मिल चुके हैं। लेकिन दूसरे वर्षों के लंबित मामलों की संख्या यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर जांच प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों खिंच रही है? मौत के बाद न्यायिक या मजिस्ट्रियल जांच का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि मौत के वास्तविक कारण और जिम्मेदारी को स्पष्ट करना है।



जनकराम के सिर की चोट

बिलासपुर सेंट्रल जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे जनकराम साहू की मौत भी सवालों के घेरे में रही। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया था और सिर पर गहरी चोट के निशान बताए गए। जेल रिपोर्ट में चोट का कारण बाथरूम में गिरना बताया गया। ऐसे मामलों में परिवार की आशंका और सरकारी रिपोर्ट के बीच अंतर होने पर निष्पक्ष जांच की अहमियत और बढ़ जाती है।



जीवन ठाकुर केस में सियासी टकराव

कांकेर के आदिवासी नेता जीवन ठाकुर की मौत को लेकर भी लंबे समय से विवाद रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे कस्टोडियल डेथ बताते हुए विधानसभा समिति से जांच की मांग की थी। गृह मंत्री विजय शर्मा ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। जीवन ठाकुर को फर्जी दस्तावेज बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कांकेर से उन्हें रायपुर सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां उनकी मौत की वजह शुगर बताई गई। भूपेश बघेल ने मजिस्ट्रेट जांच पर असंतोष जताते हुए मौत को 'सरकारी हत्या' तक कहा था।



संजय बघेल की मौत भी विवादित

रायगढ़ जिला जेल में विचाराधीन कैदी संजय बघेल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई। परिजनों और ग्रामीणों ने जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। हालांकि अंतिम रिपोर्ट में तबीयत खराब होना मौत का कारण बताया गया। ऐसे मामलों में सवाल यह है कि शुरुआती आरोपों और अंतिम जांच निष्कर्ष के बीच कितनी पारदर्शिता रहती है।



सवाल सिर्फ मौत का नहीं

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर 375 मौतें हुईं और 373 मामलों में जांच के आदेश हुए, तो 62 रिपोर्ट अब तक लंबित क्यों हैं? क्या हर मौत की जांच में जिम्मेदारी तय हो रही है? बीमारी, हार्ट अटैक, टीबी, कैंसर या आत्महत्या को मौत का कारण बताना पर्याप्त है या जेल में इलाज, निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था की भी जांच होनी चाहिए? श्रवण जैसे मामलों के बाद इन सवालों से बचना आसान नहीं होगा।



NHRC भी मांग चुका जवाब

पिछले वर्षों में जेलों में बंदियों की मौत के आंकड़ों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार से जवाब मांगा है। एक अन्य सरकारी आंकड़े में जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच 66 बंदियों की मौत बताई गई थी। इनमें गंभीर बीमारियां और आत्महत्या प्रमुख कारण बताए गए। 18 मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट जांच पूरी हो चुकी थी, जबकि 48 मामलों की जांच जारी थी।



अब जवाबदेही की बारी

जेल में बंद व्यक्ति राज्य की हिरासत में होता है। इसलिए उसकी सुरक्षा और इलाज की जिम्मेदारी भी राज्य की होती है। मौत के बाद जांच रिपोर्ट महीनों या वर्षों तक लंबित रहना व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। श्रवण की मौत ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है- जेल में मौत हुई तो सच सामने आने में इतना वक्त क्यों लगता है।



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