पार्टियों को चाहिए नाम की नहीं काम की महिला नेत्री, नेता पत्नी को मनाही

Arun Tiwari | Sept 14, 2026, 14:49 IST
चार नगर निगमों में चुनाव
छत्तीसगढ़ के चार नगर निगमों में दिसंबर में प्रस्तावित चुनाव को लेकर पार्टियां महिला प्रत्याशियों की तलाश में जुट गई हैं। 230 वार्डों में 76 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।

Raipur : छत्तीसगढ़ में दिसंबर में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। राजधानी से जुड़े बीरगांव नगर निगम के साथ दुर्ग जिले के भिलाई, रिसाली और भिलाई-चरोदा नगर निगम में चुनाव होने हैं। इन चारों निगमों में वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आरक्षित वार्डों के लिए ऐसे महिला प्रत्याशियों की तलाश की है, जो केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सक्रिय राजनीति में अपनी पहचान रखती हों।इस बार महिला आरक्षित वार्डों में टिकट का गणित पिछले चुनावों से अलग रहने के संकेत मिल रहे हैं। राज्य शासन ने नगर निकायों में महिला जनप्रतिनिधियों के नाम पर उनके पति या परिवार के अन्य सदस्यों के कामकाज करने पर रोक लगाने की व्यवस्था की है। ऐसे में राजनीतिक दलों को उन महिलाओं को प्राथमिकता देनी होगी, जो स्वयं राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हों, जनता के बीच उनकी पकड़ हो और चुनाव जीतने के बाद पार्षद की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से निभा सकें।



नेता पत्नी नहीं कार्यकर्ता

इसका सीधा असर टिकट वितरण पर पड़ सकता है। अब केवल किसी प्रभावशाली नेता, पति या परिवार के राजनीतिक प्रभाव के आधार पर महिला को टिकट देने की परंपरा पर दलों को दोबारा विचार करना होगा। खासकर महिला आरक्षित वार्डों में ऐसे चेहरे तलाशे जा रहे हैं, जो लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े हों, संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हों और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के बीच उनकी पहचान हो।



मेयर पद का आरक्षण भी अहम

बीरगांव नगर निगम में महापौर का पद महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में यहां केवल पार्षद पदों के लिए ही नहीं, बल्कि महापौर पद के लिए भी सक्रिय महिला चेहरे तलाशना राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती होगी। महापौर पद के लिए ऐसी महिला की तलाश होगी, जो पार्षद चुनाव जीतने के साथ पूरे निगम क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव बनाने की क्षमता रखती हो।आरक्षित महापौर पद के कारण बीरगांव में महिला नेताओं की दावेदारी पर विशेष नजर रहेगी। पार्टियों के सामने ऐसी महिला को चुनने की चुनौती होगी, जो संगठन, स्थानीय राजनीति और मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रखती हो। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशियों के राजनीतिक सक्रियता, सामाजिक संपर्क और स्थानीय जनाधार को टिकट वितरण में महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है।



230 वार्ड, 76 महिलाओं के लिए आरक्षित

चारों नगर निगमों में कुल 230 वार्ड हैं। इनमें 76 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। आरक्षण के आंकड़ों के मुताबिक भिलाई के 70 वार्डों में 23 ओबीसी, 9 एससी, 3 एसटी और 35 सामान्य वार्ड हैं। रिसाली के 40 वार्डों में 8 ओबीसी, 7 एससी, 3 एसटी और 22 सामान्य वार्ड हैं। इसी तरह भिलाई-चरोदा के 40 वार्डों में 11 ओबीसी, 6 एससी, 2 एसटी और 21 सामान्य वार्ड हैं। बीरगांव के 40 वार्डों में 13 ओबीसी, 5 एससी, 2 एसटी और 20 सामान्य वार्ड हैं। कुल 230 पार्षद पदों में 76 पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।



पार्टियों के सामने दोहरी चुनौती

आरक्षण तय होने के बाद अब राजनीतिक दलों के सामने प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण चरण बन गई है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही संभावित प्रत्याशियों की तलाश और स्थानीय स्तर पर चर्चा शुरू कर चुके हैं। कई वार्डों में दावेदारों की सक्रियता और संगठन में उनकी भूमिका का आकलन किया जा रहा है।महिला आरक्षित वार्डों में इस बार पार्टियों को केवल आरक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार ढूंढने तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें ऐसी महिला को मैदान में उतारना होगा, जो चुनाव जीतने के बाद भी सक्रिय रहकर पार्षद की भूमिका निभा सके। इसलिए टिकट की दौड़ में राजनीतिक सक्रियता, स्थानीय पकड़, संगठन से जुड़ाव और मतदाताओं के बीच पहचान सबसे महत्वपूर्ण कसौटी बन सकती है। यानी इस बार आरक्षित वार्डों का चुनाव केवल महिला उम्मीदवार खोजने का नहीं, बल्कि सक्रिय और प्रभावी महिला नेतृत्व को सामने लाने का चुनाव भी साबित हो सकता है।



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