विधानसभा भर्ती में फिर सवाल, मेरिट को रोक अपनों को बैकडोर से एंट्री का खेल
पांच बड़े सवाल
- 47 पदों की मेरिट फाइनल क्यों नहीं हुई?
- परीक्षा के बाद भर्ती प्रक्रिया क्यों रोकी गई?
- खाली पदों पर अस्थायी नियुक्तियां किस आधार पर हुईं?
- कर्मचारियों-अधिकारियों के रिश्तेदारों को फायदा मिला?
- वर्ग-4 में दैनिक वेतनभोगियों की नियुक्ति कैसे हुई?
छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय में भर्ती को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। हाईकोर्ट द्वारा मार्शलों को नियुक्ति रद्द करने के बाद अब वर्ग-3 और वर्ग-4 की भर्तियों में गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि भर्ती की नियमित प्रक्रिया को बीच में रोककर बैकडोर एंट्री का रास्ता खुला रखा गया। इसमें विधानसभा में पहले से काम कर रहे कर्मचारियों-अधिकारियों के बेटे, भाई और रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया जा सके। मामले मे विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा भर्ती प्रक्रिया में लगने वाले आरोप को गलत बता रहे हैं।
47 पद, परीक्षा हुई, मेरिट अटकी
मामला साल 2019 में निकले वर्ग-3 के 47 पदों का है। इन पदों के लिए प्रदेशभर से उम्मीदवारों ने परीक्षा दी थी। इसके बाद प्राथमिक मेरिट सूची तैयार हुई। लेकिन यह सूची कभी अंतिम चयन तक पहुंची ही नहीं। चयन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। यहीं से पूरा मामला संदेह के घेरे में आ गया। सवाल यही है कि परीक्षा लेने के बाद मेरिट को मंजिल तक क्यों नहीं पहुंचाया गया?
काम का बहाना, बैकडोर का रास्ता
आरोप है कि पद खाली रहने से काम प्रभावित होने का हवाला देकर इन्हीं पदों पर अस्थायी नियुक्तियां की जाने लगीं। यानी जिन पदों के लिए उम्मीदवारों ने परीक्षा दी, उनके बजाय दूसरे लोगों को काम का मौका मिलने लगा। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इसी रास्ते से विधानसभा के अंदर पहले से जुड़े लोगों के परिजनों और करीबियों को जगह दी गई। अगर नियमित भर्ती जरूरी थी, तो मेरिट लिस्ट को अंतिम रूप देने से रोकने की वजह क्या थी?
मेरिट वालों का हक, करीबियों की एंट्री
भर्ती में कथित अनियमितता को लेकर कई नाम भी सामने आए हैं। सहायक ग्रेड-3 और अनुवादक पदों में तोरण लाल कुम्भकार, कुमुदनी साहू, अनिल गोटेफोड़े, अशोक अग्रवाल, युक्ति साहू और सतीश दीवान के नाम बताए गए हैं। वाहन चालक के पद पर संजय कुमार घरडे, संजय साहू, गोलू, जायता यादव और हेमंत राजपूत के नाम का दावा है। बुक-लिफ्टर पद पर सुनील देशमुख का नाम भी शिकायत में शामिल बताया गया है।
अभ्यर्थियों के सवाल, जवाब नहीं
अभ्यर्थी धर्मेंद्र गायकवाड़ ने द सूत्र से कहा कि प्राथमिक सूची जारी होने के बाद उसे होल्ड क्यों रखा गया, विधानसभा की ओर से इसका कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है। अभ्यर्थी कई बार विधानसभा सचिवालय के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन अब तक स्थिति साफ नहीं हुई। इधर विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उन पर लगाए गए सभी आरोप कपोल काल्पनिक हैं।
रिश्तेदारी का कनेक्शन भी सामने
आरोप सिर्फ चयन प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। शिकायत में विधानसभा के कर्मचारियों और अधिकारियों के रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने के आरोप भी लगाए गए हैं। इसमें कर्मचारी दिलीप प्रजापति के पुत्र शुभम प्रजापति, कर्मचारी के भाई निलेश देवांगन, एसडीओ की बहन लखवीर कौर और कारपेंटर के भाई भूपेंद्र साहू के नाम बताए गए हैं। प्लम्बर के बेटे हेम कुमार यादव, भृत्य की बेटी ऋतू साहू और अधिकारी के पुत्र भूपेंद्र श्रीवास्तव का नाम भी शिकायत में दर्ज होने का दावा है। राकेश साहू, पूजा चौहान और मुकेश देवांगन के नाम भी सूची में बताए गए हैं।
वर्ग-4 में भी वही खेल?
वर्ग-4 के पदों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि इन पदों को भी चुपचाप विधानसभा में पहले से काम कर रहे दैनिक वेतनभोगियों से भरा जा रहा है। यानी बाहर के बेरोजगारों के लिए दरवाजा बंद और अंदर काम कर रहे लोगों के लिए रास्ता खुला। अगर ऐसा हुआ है तो भर्ती नियम, आरक्षण और पारदर्शिता तीनों पर सवाल खड़े होना तय है। विधानसभा जैसी संस्था में भर्ती प्रक्रिया पर ही सवाल उठना गंभीर मामला है।
कांग्रेस के गंभीर आरोप
कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने कहा है कि भाजपा पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होने कहा है कि भाजपा कार्यकाल में नौकरी रोकने का ही काम होता है। नियुक्तियों में गड़बड़ी कर युवाओं का हक मारने में इनकीं विशेषज्ञा है। हम जांच कर कार्रवाई की मांग करते हैं।
कोर्ट जा पहुंचा है मामला
मामला रायपुर कोर्ट जा पहुंचा है। जिसमें शिकायर्ता अविनाश साहू ने भर्ती प्रक्रिया में कथित फर्जीवाड़े, अनियमितता और बैकडोर नियुक्तियों की जांच की मांग की है। अब असली सवाल जांच का है...क्या भर्ती का पूरा रिकॉर्ड खुलेगा? मेरिट क्यों रोकी गई? और जिन लोगों को अस्थायी रास्ते से एंट्री मिली, उनकी नियुक्ति का आधार क्या था?
FAQ
- विधानसभा में भर्ती विवाद किस बात को लेकर है?
47 वर्ग-3 पदों की परीक्षा के बाद प्राथमिक मेरिट सूची तैयार हुई, लेकिन उसे अंतिम रूप नहीं दिया गया। आरोप है कि नियमित भर्ती रोककर अस्थायी नियुक्तियों का रास्ता अपनाया गया। - क्या कर्मचारियों-अधिकारियों के रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने का आरोप है?
हां, शिकायत में विधानसभा में कार्यरत कर्मचारियों-अधिकारियों के बेटे, भाई और अन्य रिश्तेदारों को नियुक्तियों में फायदा पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं। - मामले में अब क्या कार्रवाई हो रही है?
मामला रायपुर कोर्ट पहुंच गया है। शिकायतकर्ता ने भर्ती प्रक्रिया में कथित फर्जीवाड़े, अनियमितता और बैकडोर नियुक्तियों की जांच की मांग की है।
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