बस्तर में टेक्नोलॉजी का कमाल, जंगलों में फिर दिखी उड़ने वाली गिलहरी
छत्तीसगढ़ के घने जंगलों से एक सकारात्मक और उम्मीद भरी खबर सामने आई है। बस्तर क्षेत्र स्थित उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व में अब फिर से दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों की वापसी होने लगी है। कभी केवल पश्चिमी घाट और हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली प्रजातियाँ—जैसे मालाबार पाइड हॉर्नबिल, मालाबार विशाल गिलहरी और भारतीय उड़ने वाली गिलहरी—अब इस क्षेत्र में अपना विस्तार कर रही हैं।
सेंट्रल इंडियन हाइलैंड्स प्राकृतिक जैव पुल
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव अचानक नहीं बल्कि सुनियोजित प्रयासों का परिणाम है। दरअसल, यह पूरा क्षेत्र सेंट्रल इंडियन हाइलैंड्स का हिस्सा है, जो पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और हिमालय के बीच एक प्राकृतिक “फॉनल ब्रिज” यानी जीव-जंतुओं के आवागमन का मार्ग बनाता है। इस भौगोलिक विशेषता के कारण यहां जैव विविधता को बढ़ावा मिलने की बड़ी संभावना रहती है।
AI से जंगलों की निगरानी
वर्ष 2022 में टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने संरक्षण कार्यों में टेक्नोलॉजी को शामिल करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग शुरू किया। गूगल अर्थ इंजन आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक की मदद से लगभग 1840 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विश्लेषण किया गया। सेंटिनल और लैंडसैट उपग्रहों से मिले पिछले 15 वर्षों के आंकड़ों पर मशीन लर्निंग एल्गोरिदम लागू कर वनस्पति (NDVI) और जल (NDWI) सूचकांकों का अध्ययन किया गया।
ड्रोन से जमीनी सत्यापन
इस विश्लेषण के जरिए उन क्षेत्रों की पहचान की गई जहां वन आवरण घट रहा था, पेड़ों के बीच दूरी बढ़ रही थी और जल स्रोत सूख रहे थे। इन स्थानों को “हॉटस्पॉट” घोषित कर प्राथमिकता के आधार पर सुधार कार्य शुरू किए गए। इसके बाद ड्रोन तकनीक के माध्यम से इन क्षेत्रों का जमीनी सत्यापन किया गया, जिससे सटीक और अद्यतन जानकारी प्राप्त हुई।
समुदाय का अहम योगदान
हालांकि, केवल तकनीक ही इस सफलता की वजह नहीं रही। स्थानीय ग्रामीण समुदायों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। आसपास के कई गांवों के वनवासियों से बातचीत कर वन्यजीवों के पुराने आवास, भोजन स्रोत और आवाजाही के रास्तों की जानकारी जुटाई गई। यह पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक आंकड़ों का मजबूत पूरक साबित हुआ।
सौर पंप से जल संरक्षण
पिछले तीन वर्षों में इन जानकारियों के आधार पर कई बड़े कदम उठाए गए। करीब 850 हेक्टेयर क्षेत्र से अतिक्रमण हटाया गया। 21 तालाबों में सौर ऊर्जा संचालित पंप लगाए गए, जिससे गर्मियों में भी जल उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। साथ ही, बरगद, पीपल और सेमल जैसे फलदार वृक्षों का बड़े पैमाने पर रोपण किया गया और जल संरक्षण के लिए चेक डैम व अन्य संरचनाएं बनाई गईं।
शिकार पर सख्त कार्रवाई
वन विभाग ने अवैध शिकार और लकड़ी तस्करी पर भी सख्ती दिखाई। 60 से अधिक एंटी-पोचिंग अभियानों के तहत करीब 500 आरोपियों की गिरफ्तारी की गई। इसके साथ ही “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” और “वीविंग बैक द स्क्विरल कैनोपी” जैसी पहलें शुरू कर स्थानीय समुदाय को संरक्षण कार्यों में भागीदार बनाया गया।
इन प्रयासों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। मालाबार पाइड हॉर्नबिल, जो पहले सीमित क्षेत्र में दिखती थी, अब रिजर्व के चार परिक्षेत्रों में फैल चुकी है। इसी तरह गिलहरियों की प्रजातियाँ भी नए इलाकों में नजर आने लगी हैं। यह न केवल वन्यजीवों की वापसी का संकेत है, बल्कि जंगलों के बेहतर होते स्वास्थ्य का भी प्रमाण है।
इको-टूरिज्म से रोजगार बढ़ेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में इको-टूरिज्म की भी अपार संभावनाएं हैं, खासकर बर्ड वॉचिंग के लिए। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और पलायन में कमी आ सकती है।
कुल मिलाकर, उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व का यह मॉडल साबित करता है कि जब आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान का सही समन्वय होता है, तो पर्यावरण संरक्षण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है। यह पहल पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरी है।
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