छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : सवालों के घेरे में कुर्सी, कमाई और सिस्टम
वेतन विश्वविद्यालय का, एटीएम परिवार का
विश्वविद्यालयों को कभी ज्ञान का मंदिर कहा जाता था। अब लगता है कुछ लोगों ने इसे पारिवारिक वित्तीय प्रबंधन संस्थान समझ लिया है। दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलसचिव की गिरफ्तारी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि विश्वविद्यालय का सबसे जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी ही एक दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी की कमाई पर हाथ साफ करने लगे, तो व्यवस्था से ईमानदारी की उम्मीद कौन करे? आरोप है कि महिला से घर में खाना बनवाया जाता रहा, वेतन विश्वविद्यालय देता रहा और उसका अधिकांश हिस्सा बेटे के खाते में ट्रांसफर कराया जाता रहा। महिला के हिस्से में केवल इतनी रकम बचती थी कि शायद वह अपनी मजबूरी जिंदा रख सके। हैरत की बात यह भी है कि यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा और किसी की नजर नहीं पड़ी। इससे पहले भी सरकारी वाहन के निजी उपयोग, मरम्मत में अनियमितता और वित्तीय गड़बड़ियों जैसे आरोप सामने आ चुके थे, लेकिन कार्रवाई का अतापता नहीं था। आखिरकार जब मामला पुलिस तक पहुंचा तो कुलसचिव जेल पहुंच गए। शिक्षा व्यवस्था के लिए यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि आईना है। विश्वविद्यालय अगर प्रतिभा गढ़ने की जगह व्यक्तिगत लाभ का केंद्र बन जाए, तो डिग्रियां जरूर निकलेंगी, लेकिन भरोसा लगातार फेल होता रहेगा।
अहम का टकराव
जनप्रतिनिधि और नौकरशाह लोकतंत्र की एक ही गाड़ी के दो पहिए माने जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में मामला ऐसा दिखा कि एक पहिया दूसरे को पहचानने से ही इनकार करता रहा। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और आईएएस अमित कटारिया के बीच विवाद नूराकुश्ती नहीं है, बल्कि अहम का टकराव है। सांसद बृजमोहन अग्रवाल का आरोप है कि स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया महीनों तक उनके पत्रों का जवाब देना जरूरी नहीं समझते थे। जब शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची तो फोन पर हुई बातचीत ने पूरे विवाद को राजनीतिक और संवैधानिक बहस में बदल दिया। अब मामला सीधे लोकसभा तक पहुंच चुका है और विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि पूरा विवाद किसी नीति या योजना पर नहीं, बल्कि संवाद की कमी पर खड़ा हुआ। लोकतंत्र में जनता सांसद चुनती है और प्रशासन सरकार चलाता है। दोनों के बीच यदि पत्रों का जवाब भी अदालत या संसद के रास्ते तय होने लगे तो यह प्रशासनिक संस्कृति पर बड़ा सवाल है। अब फैसला चाहे जो हो, लेकिन इस घटनाक्रम ने बता दिया कि फाइलों में दबे पत्र कभी-कभी दिल्ली तक पहुंच जाते हैं। नौकरशाही और राजनीति की इस रस्साकशी में सबसे बड़ा नुकसान उसी जनता का होता है, जिसके नाम पर दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाने का दावा करते हैं। हालांकि यह सही है कि छत्तीसगढ़ की नौकरशाही बेलगाम हो गई है। अफसर खुद को मंत्री से बड़ा मानने लगे हैं। सांसद विजय बघेल भी अफसरों को लेकर अपनी आपत्ति जता ही चुके हैं।
बीएसपी में लोहा कौन ले गया
भिलाई इस्पात संयंत्र में लोहा चोरी का मामला अब सिर्फ पुलिस केस नहीं रहा, बल्कि राजनीति की भट्ठी में भी पूरी गर्मी से तप रहा है। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत का आरोप है कि करोड़ों के लोहे की चोरी किसी चोर की जेब में नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की छाया में हुई है। उन्होंने भाजपा नेताओं, अधिकारियों और पुलिस की कथित मिलीभगत तक के आरोप लगा दिए। दूसरी ओर सरकार और जांच एजेंसियां अपनी प्रक्रिया में जुटी हैं। मजेदार बात यह है कि बीएसपी का नाम सुनते ही देश की औद्योगिक ताकत याद आती है, लेकिन इन दिनों चर्चा इस बात की है कि आखिर इतना लोहा बिना किसी की नजर में आए कैसे गायब होता रहा। यदि आरोप सही हैं तो सवाल केवल चोरी का नहीं, निगरानी व्यवस्था का भी है। यदि आरोप राजनीति का हिस्सा हैं, तो फिर जांच उन्हें भी बेनकाब कर देगी। फिलहाल जनता यही देख रही है कि लोहा चोरी से ज्यादा गर्म बहस उसके बाद शुरू हुई। अब देखना यह है कि जांच लोहे जितनी मजबूत निकलती है या फिर मामला भी धीरे-धीरे कबाड़ में डाल दिया जाता है।
तीन साल बाद बदलो कुर्सी, वरना ...
सरकारी दफ्तरों में कुछ कुर्सियां ऐसी होती हैं, जिन पर बैठे लोग खुद को स्थायी फर्नीचर समझने लगते हैं। सरकार ने अब इस पर ब्रेक लगाने का फैसला किया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने आदेश जारी कर दिया है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को एक ही डेस्क पर तीन साल से ज्यादा नहीं बैठाया जाएगा। पहली नजर में यह सिर्फ प्रशासनिक आदेश लगता है, लेकिन इसके पीछे वर्षों से जमी उस संस्कृति पर चोट है, जहां एक सीट के साथ रिश्ते इतने गहरे हो जाते हैं कि फाइल भी उसी दिशा में चलती है, जहां कुर्सी इशारा करे। अब हर तीन साल में कार्य बदलने का नियम लागू होगा और यदि किसी को उसी जगह रखना है तो उसका लिखित कारण देना होगा। यानी अब यहीं ठीक हूं वाला तर्क नहीं चलेगा। आदेश कितना सफल होगा, यह तो समय बताएगा, क्योंकि सरकारी व्यवस्था में नियम बनाना आसान और आदत बदलना कठिन माना जाता है। फिर भी संदेश साफ है कि सरकार अब सीटों पर जमी स्थायी व्यवस्था को हिलाना चाहती है। अगर यह आदेश ईमानदारी से लागू हुआ तो कई दफ्तरों की हवा जरूर बदलेगी।
ऑनलाइन खरीदो, शिकायत मुफ्त पाओ
ऑनलाइन खरीदारी ने बाजार को जेब में पहुंचा दिया, लेकिन शिकायतों ने उपभोक्ताओं का धैर्य भी मोबाइल स्क्रीन पर ला दिया है। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि एक साल में ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ पांच लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं। सूची में फ्लिपकार्ट पहले नंबर पर है और अमेजन दूसरे पर। छत्तीसगढ़ से भी शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका मतलब साफ है कि लोग ऑनलाइन खरीद तो रहे हैं, लेकिन भरोसा उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा। अच्छी बात यह है कि अब शिकायत दर्ज करना भी पहले से आसान हो गया है। टोल फ्री नंबर से लेकर व्हाट्सएप और ऐप तक कई रास्ते उपलब्ध हैं। सरकार दावा कर रही है कि शिकायतों का निपटारा पहले से तेज हुआ है, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर सेवा इतनी बेहतर होती जा रही है तो शिकायतों का ग्राफ लगातार ऊपर क्यों जा रहा है? सुविधा और परेशानी अब साथ-साथ चल रहे हैं। एक क्लिक में सामान घर पहुंच जाता है और दूसरे क्लिक में शिकायत दर्ज करनी पड़ जाती है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में लगता है कि डिलीवरी जितनी तेज हुई है, डिस्प्यूट भी उतनी ही तेजी से बढ़ा है।
युवा राजनीति का स्टार्टअप
कभी युवा राजनीति विचारों की प्रयोगशाला मानी जाती थी। अब चर्चा इस बात की है कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए विचार ज्यादा जरूरी हैं या करोड़ों का इंतजाम। युवा कांग्रेस चुनाव को लेकर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे बताते हैं कि सदस्यता अभियान, प्रचार और संगठनात्मक प्रबंधन का खर्च इतना बढ़ चुका है कि सामान्य कार्यकर्ता शुरुआत में ही खुद को दौड़ से बाहर महसूस करने लगता है। कहा जा रहा है कि प्रदेश अध्यक्ष पद की लड़ाई में करोड़ों रुपए खर्च हो सकते हैं। यदि ऐसा है तो सवाल केवल एक संगठन का नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति का है। जिस युवा के पास संसाधन नहीं, लेकिन संगठन के लिए वर्षों का संघर्ष है, क्या उसके लिए शीर्ष पद तक पहुंचने का रास्ता बचता है? राजनीति में निवेश जितना बढ़ेगा, भविष्य में उसकी वसूली की आशंका भी उतनी ही मजबूत होगी। यही वजह है कि आज राजनीति को सेवा नहीं, निवेश मानने की बहस तेज हो रही है। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं कि नेतृत्व की पहली योग्यता जेब का वजन बन जाए। आखिर संगठन कार्यकर्ताओं से बनते हैं या खर्च के हिसाब-किताब से?
अटैचमेंट गया, प्रतिनियुक्ति आ गई…
स्कूल शिक्षा विभाग ने पहले अटैचमेंट खत्म करने का आदेश दिया तो लगा कि अब स्कूलों से बाबू और कर्मचारी वापस अपने मूल संस्थानों में लौटेंगे, लेकिन कुछ ही समय बाद प्रतिनियुक्ति का नया रास्ता सामने आ गया। अब कलेक्टर और संभागायुक्त कार्यालय जरूरत बताकर उन्हीं कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर मांग सकते हैं। यानी दरवाजा बंद हुआ तो खिड़की खुल गई। कागज पर शर्त जरूर रखी गई है कि किसी स्कूल को कर्मचारीविहीन नहीं किया जाएगा, लेकिन अनुभव कहता है कि कई बार नियम फाइलों में ज्यादा मजबूत रहते हैं और जमीन पर कमजोर पड़ जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल वही है कि यदि कलेक्ट्रेट और कमिश्नर कार्यालयों में स्वीकृत पद खाली हैं तो नियमित भर्ती क्यों नहीं होती? हर बार स्कूलों के कर्मचारियों से ही प्रशासनिक कमी क्यों पूरे किए जाते है? स्कूलों में लिपिक और भृत्य भी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्हें हटाकर दफ्तर चलेंगे तो स्कूलों का काम कौन संभालेगा? फिलहाल ऐसा लगता है कि अटैचमेंट की कहानी खत्म नहीं हुई, उसने सिर्फ नया नाम पहन लिया है।
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