1950 का रिकॉर्ड नहीं तो भी मिलेगा जाति प्रमाणपत्र! अफसरों की मनमानी पर लगाई रोक
समझें क्या है पूरा मामला
Raipur : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र को लेकर बड़ा और राहत देने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि हर मामले में 1950 से पहले के दस्तावेज मांगना जरूरी नहीं है। यदि परिवार के अन्य सदस्यों के पास पहले से स्थायी जाति प्रमाणपत्र है तो उसी आधार पर भी आवेदन पर विचार करना होगा। सिर्फ पुराने रिकॉर्ड नहीं होने का हवाला देकर आवेदन लौटाना कानून के अनुरूप नहीं है।
दो भाई-बहनों का मामला बना मिसाल
मामला बिलासपुर जिले की बोदरी तहसील के ग्राम मुढ़ीपार का है। यहां रहने वाले ’’निष्ठा बघेल और अभय बघेल’’ ने स्थायी जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। राजस्व अधिकारियों ने यह कहते हुए आवेदन लौटा दिया कि उनके पास 1950 से पहले के ऐसे दस्तावेज नहीं हैं, जिनमें पूर्वजों की जाति का उल्लेख हो। इसके बाद दोनों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट ने पूछा, फिर पिता का प्रमाणपत्र क्यों नहीं माना?
मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि याचिकाकर्ताओं के पिता और सगी बहन के पास पहले से स्थायी जाति प्रमाणपत्र मौजूद है। इसके बावजूद अधिकारियों ने उस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद’’ की एकलपीठ ने इस रवैये पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि जब परिवार की जाति पहले ही प्रमाणित हो चुकी है तो उसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मनमानी नहीं चलेगी
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्राची दीवान ने दलील दी कि शासन पहले ही परिवार की जाति स्वीकार कर चुका है। ऐसे में 1950 से पहले के दस्तावेज मांगना तर्कसंगत नहीं है। कोर्ट ने इस दलील को महत्व दिया और कहा कि प्रशासन को नियमों का पालन करना चाहिए, लेकिन नियमों के नाम पर मनमानी नहीं की जा सकती। हर आवेदन का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
60 दिन में देना होगा फैसला
हाई कोर्ट ने संबंधित राजस्व अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आवेदन पर दोबारा विचार करें। कानून के मुताबिक जांच करें और 60 दिनों के भीतर’’ तर्कसंगत आदेश जारी करें। यदि किसी दस्तावेज की कमी है तो आवेदक से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा सकते हैं, लेकिन बिना ठोस कारण आवेदन लौटाना उचित नहीं होगा।
हजारों आवेदकों को बड़ी राहत
इस फैसले का असर केवल दो आवेदकों तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश में ऐसे हजारों लोग हैं, जिनके पास 1950 से पहले के राजस्व या अन्य रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे मामलों में अधिकारी अब केवल पुराने दस्तावेज न होने के आधार पर आवेदन खारिज नहीं कर सकेंगे। यदि परिवार के अन्य सदस्यों के वैध जाति प्रमाणपत्र और अन्य साक्ष्य उपलब्ध हैं तो उन्हें भी महत्व देना होगा।
अब बदलेगी प्रमाणपत्र की प्रक्रिया?
हाई कोर्ट के इस फैसले को जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में अहम माना जा रहा है। इससे राजस्व अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ेगी और आवेदनों की जांच अधिक व्यावहारिक तरीके से करनी होगी। फैसले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रमाण की जांच जरूरी है, लेकिन नियमों के नाम पर नागरिकों को अनावश्यक परेशानी देना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
FAQ
- क्या 1950 से पहले का रिकॉर्ड नहीं होने पर जाति प्रमाणपत्र नहीं बनेगा?
नहीं। हाई कोर्ट ने कहा है कि हर मामले में 1950 से पहले का रिकॉर्ड जरूरी नहीं है। - परिवार के किसी सदस्य का जाति प्रमाणपत्र मान्य होगा?
हां। पिता, भाई-बहन या अन्य परिजनों के वैध स्थायी जाति प्रमाणपत्र पर भी विचार किया जा सकता है। - हाई कोर्ट ने अधिकारियों को क्या निर्देश दिया है?
कोर्ट ने आवेदन पर दोबारा विचार कर 60 दिनों के भीतर तर्कसंगत आदेश देने को कहा है।
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