छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने संतान खो चुके दंपति को दी IVF की अनुमति
Raipur : Chhattisgarh News :छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में संतान खो चुके दंपति को IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) उपचार की अनुमति दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पति की आयु के आधार पर माता-पिता बनने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पत्नी वैधानिक आयु सीमा के भीतर है
और दोनों चिकित्सकीय रूप से फिट हैं, ऐसे में इलाज से इनकार करना उनके माता-पिता बनने के अधिकार का स्थायी हनन होगा।
यह असाधारण परिस्थिति
जस्टिस अमितेंद्र किशोर ने 24 अप्रैल को दिए आदेश में कहा कि यह मामला असाधारण परिस्थितियों में आता है, जहां न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।
दंपति ने वर्ष 2022 में अपनी इकलौती संतान को खो दिया था, जिससे वे गहरे मानसिक और भावनात्मक आघात में थे और तुरंत परिवार बढ़ाने का निर्णय नहीं ले सके।
पत्नी आयु सीमा में, उपचार से इनकार अनुचित
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे और अधिवक्ता अपूर्वा घोरे ने दलील दी कि पत्नी की उम्र 50 वर्ष से कम है और वह सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम 2021 के प्रावधानों के तहत पात्र है।
उन्होंने कहा कि पति की आयु सीमा को कठोरता से लागू करते हुए उपचार से इनकार करना मनमाना और अन्यायपूर्ण है तथा अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है।
अदालत ने दी सहमति
अदालत ने भी माना कि ART अधिनियम व्यक्तिगत (individual-centric) दृष्टिकोण अपनाता है, न कि केवल दंपति आधारित। इसमें महिला और पुरुष दोनों के लिए आयु सीमा अलग-अलग निर्धारित की गई है। महिला के लिए 21 से 50 वर्ष और पुरुष के लिए 21 से 55 वर्ष।
माता-पिता बनने का अधिकार, मौलिक अधिकार का हिस्सा
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में प्रजनन स्वायत्तता (reproductive autonomy) भी शामिल है। ऐसे मामलों में कानून की व्याख्या उद्देश्यपूर्ण और लचीले तरीके से की जानी चाहिए, न कि कठोर और यांत्रिक ढंग से।
अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ताओं ने अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति झेली है। उपचार लेने में हुई देरी उचित और वास्तविक कारणों से है। पत्नी आयु सीमा में है, दोनों चिकित्सकीय रूप से सक्षम हैं, और उपचार से इनकार उन्हें माता-पिता बनने के अधिकार से स्थायी रूप से वंचित कर देगा।
क्लिनिक और राज्य का विरोध
राज्य की ओर से पैनल वकील अनादि शर्मा ने दलील दी कि ART अधिनियम चिकित्सा, सामाजिक और नैतिक पहलुओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है और इसमें निर्धारित आयु सीमा को शिथिल करना कानून के उद्देश्य को कमजोर करेगा।
वहीं IVF क्लिनिक की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि वे अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं और कानूनी प्रावधानों का पालन करना उनकी जिम्मेदारी है। अधिनियम उन्हें आयु सीमा में छूट देने या उसकी पुनर्व्याख्या करने का अधिकार नहीं देता।
हाईकोर्ट का निर्देश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने IVF क्लिनिक को निर्देश दिया कि दंपति को उपचार की अनुमति दी जाए और प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य प्रजनन तकनीकों तक पहुंच को आसान बनाना है, न कि अनावश्यक बाधाएं खड़ी करना।
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