हर साल धान गायब, फिर भी उन्हीें अफसरों और कर्मचारियों के भरोसे होती है धान खरीदी
Raipur. छत्तीसगढ़ में धान शॉर्टेज का मुद्दा फिर गरमा गया है। इस साल भी कई जिलों से हजारों क्विंटल धान गायब होने की खबरें सामने आई हैं। वजह वही पुरानी बताई जा रही हैकृमूसवा यानी चूहे। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर साल चूहे ही इतने संगठित हो जाते हैं कि सरकारी गोदाम खाली कर दें? हकीकत इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। यह मामला सीधे-सीधे सिस्टम फेल होने और जिम्मेदारों की लापरवाही की ओर इशारा करता है।
हर साल दोहराई जाती है वही कहानी
धान खरीदी खत्म होते ही हर साल शॉर्टेज का आंकड़ा सामने आता है। पहले जांच होती है, फिर कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई का दिखावा। लेकिन अगले ही सीजन में वही अधिकारी फिर से धान खरीदी का जिम्मा संभालते नजर आते हैं। यही सबसे बड़ा सवाल है। अगर गड़बड़ी साबित हो चुकी है, तो फिर जिम्मेदारी उन्हीं लोगों को क्यों सौंपी जाती है?
आंकड़े खोल रहे गड़बड़ी की पोल
साल 2024-25 के धान खरीदी सीजन में केवल रायपुर संभाग की 161 सहकारी समितियों और 200 उपार्जन केंद्रों में धान शॉर्टेज हुआ। कुल 15,772.21 मीट्रिक टन धान का हिसाब नहीं मिला। इसकी कीमत करीब 36 करोड़ 28 लाख रुपये बताई गई। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। प्रदेश भर का आंकड़ां अरबों में होता है लेकिन विभाग आंकड़े दबा देता है।
जिम्मेदारी फिर भी सिस्टम में एक्टिव
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन 71 समिति प्रभारियों और 26 उपार्जन केंद्र प्रभारियों पर शॉर्टेज का आरोप था, उनमें से कई को 2025-26 के धान खरीदी सीजन में फिर से जिम्मेदारी दे दी गई। यानी जिनके ऊपर सवाल हैं, वही फिर से व्यवस्था संभाल रहे हैं। इससे साफ है कि जवाबदेही तय करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हो रही।
FIR का भी कोई असर नहीं
हालांकि, कुछ मामलों में कार्रवाई भी हुई। साल 2025-26 में रायपुर संभाग के तीन राइस मिलर्स के खिलाफ पुलिस में शिकायत हुई। तीन समिति प्रभारियों और नौ उपार्जन केंद्र प्रभारियों के खिलाफ एफआईआर करवाई गई। लेकिन इतनी बड़ी गड़बड़ी के सामने यह कार्रवाई कम लगती है। सवाल यह है कि क्या इससे सिस्टम में सुधार आएगा या यह भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
संरचना बड़ी, निगरानी कमजोर
रायपुर संभाग में कुल 526 समितियां हैं और 677 उपार्जन केंद्र संचालित हो रहे हैं। इनमें से 161 समितियां और 200 केंद्र ऐसे हैं, जहां पहले ही शॉर्टेज सामने आ चुका है। इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद निगरानी कमजोर है। डिजिटल ट्रैकिंग, स्टॉक वेरिफिकेशन और जवाबदेही की व्यवस्था कागजों तक सीमित नजर आती है।
'मूसवा' या मैनेजमेंट फेल?
हर बार चूहों पर ठीकरा फोड़ना आसान है, लेकिन सच्चाई इससे अलग है। इतने बड़े पैमाने पर धान का गायब होना बिना मिलीभगत के संभव नहीं लगता। यह मैनेजमेंट फेलियर, स्टोरेज की खामियां और निगरानी की कमी का मिला-जुला नतीजा है। “मूसवा” अब सिर्फ एक बहाना बनकर रह गया है।
क्यों नहीं सुधार रहे सिस्टम
अगर यही हाल रहा तो हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी। पहले धान खरीदी, फिर शॉर्टेज, फिर जांच और फिर वही चेहरे जिम्मेदार। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा।
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