छत्तीसगढ़ में पेटेंट की हैट्रिक ; IIT, NIT और IIIT ने रचा इतिहास
NEWS IN SHORT
- IIT भिलाई ने 3.5 साल में 71 पेटेंट दर्ज किए
- NIT रायपुर ने 2015 से अब तक 43 पेटेंट बनाए
- IIIT नया रायपुर ने अब तक 16 पेटेंट दर्ज किए
- राज्य में नवाचार हो रहा, पर आईपी कन्वर्जन प्रक्रिया धीमी
- जागरूकता, प्रोत्साहन और नीति सुधार से बढ़ेगा पेटेंट कल्चर
NEWS IN DETAIL
आज दुनिया भर में 'विश्व बौद्धिक संपदा दिवस' मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के लिए यह दिन गर्व और आत्मचिंतन दोनों का अवसर लेकर आया है। राज्य के प्रमुख तकनीकी संस्थानों— IIT भिलाई, NIT रायपुर और IIIT नया रायपुर —ने पेटेंट फाइलिंग के मामले में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया है, लेकिन विडंबना यह है कि यह सफलता व्यक्तिगत संस्थानों की चारदीवारी तक ही सीमित नजर आ रही है।
प्रमुख संस्थानों का शानदार प्रदर्शन
आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में बौद्धिक संपदा (IP) की नींव मजबूत हो रही है:
IIT भिलाई: महज 3.5 साल के छोटे से सफर में 71 पेटेंट फाइल कर राज्य में शीर्ष स्थान बनाया है।
NIT रायपुर: वर्ष 2015 से अब तक संस्थान ने 43 पेटेंट दर्ज किए हैं।
IIIT नया रायपुर: उभरते हुए इस संस्थान ने अब तक 16 पेटेंट अपने नाम करने में सफलता पाई है।
आइडिया तो हैं, पर कानूनी सुरक्षा का अभाव
मजबूत आंकड़ों के बावजूद राज्य का 'ओवरऑल आईपी इंडेक्स' चिंताजनक है। IIIT नया रायपुर के डायरेक्टर डॉ. ओ.पी. व्यास के अनुसार, राज्य में नवाचार (Innovation) तो हो रहा है, लेकिन उसे IP कन्वर्जन (पेटेंट या ट्रेडमार्क में बदलना) तक ले जाने की प्रक्रिया धीमी है। उदाहरण के तौर पर, 'ट्राइब कनेक्ट' जैसे प्रोजेक्ट लैब में तो सफल हैं, लेकिन उन्हें व्यावसायिक और कानूनी सुरक्षा दिलाकर जमीन पर उतारना अभी बाकी है।
बाधाएं और समाधान
सरकार द्वारा स्टार्टअप पॉलिसी के तहत 75% पेटेंट सब्सिडी और सहयोग दिए जाने के बावजूद व्यापक स्तर पर पेटेंट कल्चर विकसित नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाने जरूरी हैं:
1. अकादमिक मान्यता: पेटेंट को केवल एक उपलब्धि न मानकर रिसर्च पब्लिकेशन की तरह शैक्षणिक मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
2. प्रोत्साहन: फैकल्टी और छात्रों के मूल्यांकन में पेटेंट फाइलिंग, कॉपीराइट और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को वेटेज दिया जाए।
3. जागरूकता: लैब से निकलकर आइडिया को कानूनी सुरक्षा (IP Protection) दिलाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्यशालाओं की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ में संस्थानों की सफलता यह दर्शाती है कि प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन जब तक नवाचार को व्यावसायिक सुरक्षा और सामाजिक लाभ से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक राज्य की बौद्धिक संपदा का पूर्ण विकास एक चुनौती बना रहेगा।
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