दूधिया से लाल हुआ चित्रकोट जलप्रपात, जानिए कैसे खोखली हो रही है बस्तर की जमीन

Aishwarya Dwivedi | Aug 18, 2026, 15:50 IST
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चित्रकोट का लाल पानी पर्यटकों को भले लुभाता है, लेकिन यह इंद्रावती नदी में गंभीर मिट्टी कटाव का संकेत है। CWC के अनुसार प्रति लीटर पानी 1.97 ग्राम उपजाऊ मिट्टी बह रही है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • चित्रकोट का लाल पानी पर्यटकों को बहुत भाता है।
  • लेकिन यह पानी बस्तर की उपजाऊ जमीन को खोखला कर रहा है।
  • इंद्रावती नदी में बारिश के दौरान भारी मिट्टी बह जाती है।
  • केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ था।
  • अब नदी तट पर 80 हजार पौधे लगाने की मांग उठी है।

चित्रकोट जलप्रपात में हजारों पर्यटक

बस्तर का चित्रकोट जलप्रपात पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मानसून में इसे देखने हजारों पर्यटक आते हैं। इस मौसम में झरने का पानी गहरा लाल दिखाई देता है। पर्यटक इस लाल पानी को देखकर बहुत रोमांचित होते हैं।



लेकिन यह लाल पानी एक सुंदर दृश्य मात्र नहीं है। इसके पीछे बस्तर का एक बड़ा दर्द छिपा है। यह लाल रंग नदी के तटों से बहती उपजाऊ मिट्टी का है। पानी के साथ बस्तर की जमीन बहकर नष्ट हो रही है।



इंद्रावती नदी बस्तर की असली जीवनरेखा मानी जाती है। यह नदी यहां की खेती और जल सुरक्षा का आधार है। पर्यावरण और जैव विविधता भी इसी नदी पर निर्भर है। लेकिन अब नदी तटों का क्षरण चिंता का विषय है।



CWC ने जारी रिपोर्ट की रिपोर्ट

केंद्रीय जल आयोग (CWC – Central Water Commission) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। वर्ष 2020 की इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े आए। बारिश में एक लीटर पानी के साथ 1.97 ग्राम मिट्टी बहती है।



इसका सीधा अर्थ है कि नदी में केवल पानी नहीं बहता। बारिश के दौरान लाखों टन उर्वरक मिट्टी बह जाती है। बस्तर के खेतों की सबसे ऊपरी और उपजाऊ परत खत्म हो रही है। इससे जमीन की पैदावार क्षमता पर असर पड़ रहा है।



मिट्टी कटाव का बस्तर पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार नदी में तलछट जमा होना बहुत हानिकारक है। इसे वैज्ञानिक भाषा में सेडिमेंट (Sediment – Deposited Earth Material) कहते हैं। तलछट जमा होने से नदी की जलधारण क्षमता घट जाती है।



जलधारण क्षमता घटने से बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह तंत्र भी पूरी तरह बिगड़ जाता है। इसके अलावा जल में रहने वाले जीवों को नुकसान पहुंचता है। जलीय पारिस्थितिकी का संतुलन पूरी तरह से प्रभावित होता है।



खेती की उपजाऊ मिट्टी बहने से किसान परेशान हैं। खेतों की उर्वरता कम होने से फसल उत्पादन घट सकता है। इसलिए यह केवल नदी को बचाने की बात नहीं है। यह बस्तर के पूरे कृषि तंत्र को बचाने की लड़ाई है।



80 हजार पौधे लगाने की मांग

इस खतरे को देखते हुए जनआंदोलन शुरू हो गया है। इंद्रावती बचाओ अभियान (IBA – Indravati Bachao Abhiyan) आगे आया है। अभियान ने नदी तटों पर 80 हजार पौधे लगाने की मांग की है।



अभियान के सदस्यों ने बस्तर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है। जिला कलेक्टर आकाश छिकारा (Akash Chhikara – District Collector) को यह ज्ञापन दिया गया। इसमें पूर्व सर्वे के आधार पर पौधारोपण की स्वीकृति मांगी गई।



ज्ञापन सौंपने वालों में कई प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। इनमें ट्री मैन सम्पत झा और दशरथ कश्यप मुख्य हैं। इसके अलावा किशोर पारख और अप्रतिम झा भी मौजूद रहे। रोहित सिंह बैस और शिव नारायण चांडक भी शामिल थे।



सुनील खेडूलकर, लक्ष्मी कश्यप और गाजिया अंजुम ने भी समर्थन दिया। सोनू सोरी समेत अभियान के कई अन्य सदस्य भी साथ रहे। सभी ने एक स्वर में नदी को बचाने की अपील की।



वन विभाग की निगरानी जरूरी

इंद्रावती बचाओ अभियान का मानना है कि काम आसान नहीं है। केवल जन-जागरूकता के भरोसे पौधे बचाना संभव नहीं होगा। नदी किनारे पौधे लगाना आम पौधारोपण से काफी अलग है।



इसके लिए वैज्ञानिक तरीकों का पालन करना बहुत आवश्यक है। पौधों के चयन में विशेष सावधानी बरतनी होगी। रोपण की दूरी और स्थानीय प्रजातियों का ध्यान रखना होगा। मिट्टी और नमी की स्थिति देखकर ही पौधे लगाने होंगे।



पौधों की सुरक्षा के लिए मजबूत तंत्र बनाना जरूरी है। इसके लिए वन विभाग (FD – Forest Department) की निगरानी आवश्यक है। तकनीकी मार्गदर्शन के बिना यह अभियान सफल नहीं हो सकता।



ग्रीन बेल्ट क्यों है जरूरी?

नदी किनारे पेड़ों की हरित पट्टी बनाना बहुत फायदेमंद है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को कसकर पकड़ कर रखती हैं। इससे बारिश के तेज पानी में मिट्टी नहीं बहती।



ग्रीन बेल्ट बनने से नदी में गाद की मात्रा घटती है। कृषि भूमि की उपजाऊ ऊपरी मिट्टी सुरक्षित रहती है। नदी के किनारों को मजबूती और स्थिरता मिलती है।



स्थानीय प्रजातियों के पेड़ वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास बनाते हैं। यह पौधे वातावरण से कार्बन डाइआक्साइड सोखते हैं। इससे स्थानीय तापमान और नमी का संतुलन भी बना रहता है।



64 ग्राम पंचायतों में सर्वे

वर्ष 2020 में जिला प्रशासन ने एक बड़ा सर्वे कराया था। नदी तट पर पौधारोपण के लिए 64 पंचायतें चुनी गई थीं। यह पंचायतें कुल पांच अलग-अलग ब्लॉकों में स्थित हैं।



इसमें बकावंड ब्लॉक की 10 ग्राम पंचायतें शामिल हैं। लोहांडीगुड़ा की 8 और तोकापाल की 8 पंचायतें तय थीं। जगदलपुर की 14 और बस्तर जनपद की 24 पंचायतें चुनी गईं।



अब जरूरत इन योजनाओं को धरातल पर लागू करने की है। केवल पौधे लगा देना ही काफी नहीं होगा। अगले कई वर्षों तक पौधों का संरक्षण करना जरूरी होगा। जिस दिन चित्रकोट का पानी मानसून में भी सफेद दिखेगा। उसी दिन पौधारोपण अभियान को पूरी तरह सफल माना जाएगा।



FAQ

  1. चित्रकोट जलप्रपात का पानी बारिश के मौसम में लाल क्यों दिखता है?
    उत्तर: बारिश में इंद्रावती नदी के किनारों पर भारी मिट्टी कटाव होता है। यह कछारी मिट्टी पानी में घुलकर झरने से नीचे गिरती है। इसी वजह से चित्रकोट का पानी लाल दिखाई देता है।
  2. इंद्रावती नदी में मिट्टी कटाव से क्या नुकसान हो रहा है?
    उत्तर: नदी में हर साल लाखों टन उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। इससे खेतों की उर्वरता घटती है और कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। साथ ही नदी में गाद जमा होने से जलधारण क्षमता कम होती है।
  3. इंद्रावती नदी को बचाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
    उत्तर: इंद्रावती बचाओ अभियान ने नदी तटों की 64 पंचायतों में 80 हजार पौधे लगाने की मांग की है। वन विभाग की वैज्ञानिक देखरेख में हरित पट्टी बनाकर कटाव रोकने की योजना है।

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