अब अफसर नहीं, नीति चलाएगी छत्तीसगढ़ की सहकारिता! घोटालों, घाटे और राजनीतिक कब्जे पर केंद्र का बड़ा वार

VINAY VERMA | May 12, 2026, 12:07 IST
cooperative-reform-paddy-procurement-monitoring
छत्तीसगढ़ में सहकारिता व्यवस्था सुधारने केंद्र सरकार ने बड़ा प्लान तैयार किया है। पंचायत स्तर पर नई समितियां, डिजिटल मॉनिटरिंग, PACS को मल्टी सर्विस सेंटर और धान खरीदी में पारदर्शिता पर जोर।

News In Short :

  • धान खरीदी में गड़बड़ी रोकने की कवायद
  • पंचायत स्तर पर नई समितियों के गठन का लक्ष्य
  • भ्रष्टाचार रोकने के लिए डिजिटल निगरानी की तैयारी
  • बंद और निष्क्रिय समितियों की होगी पहचान
  • सहकारी समितियों का डेटा होगा ऑनलाइन
  • कर्मचारियों को तकनीकी ट्रेनिंग देने की तैयारी

News in Details:

छत्तीसगढ़ की सहकारिता व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा दखल दिया है। वर्षों से भ्रष्टाचार, राजनीतिक कब्जे, फर्जी ऑडिट और घाटे से जूझ रहे सहकारिता विभाग को अब नई नीति के जरिए चलाने की तैयारी है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने राज्य को करीब 40 पेज का विस्तृत ड्राफ्ट भेजा है। इस नीति को नाम दिया गया है ”सहकार से समृद्धि”। सरकार का दावा है कि इससे गांव की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।



गांव तक पहुंचेगी सहकारिता:

नई नीति के तहत पंचायतवार, जिलेवार और ब्लॉकवार सहकारी समितियों का पूरा डेटा तैयार किया जाएगा। सरकार ने साफ निर्देश दिए हैं कि जहां समितियां बंद पड़ी हैं, उन्हें सक्रिय किया जाए और जहां एक भी समिति नहीं है, वहां नई समितियां बनाई जाएं। पैक्स, मत्स्य समिति, दुग्ध समिति और बहुउद्देश्यीय समितियों को एक बड़े नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी है।



सरकार का मकसद सिर्फ समितियां बनाना नहीं, बल्कि उन्हें गांव के “मल्टी सर्विस सेंटर” में बदलना है। यानी किसान को खाद, बीज, बैंकिंग, जनऔषधि, ई-डिस्ट्रिक्ट सेवा और सरकारी योजनाओं की सुविधा एक ही जगह मिले।



पैक्स को बनाया जाएगा गांव का मिनी सचिवालय

राज्य सरकार अब पैक्स को “मल्टी परपज पैक्स” के रूप में विकसित करने की तैयारी कर रही है। इसका मतलब है कि धान खरीदी केंद्र तक सीमित पैक्स अब गांव के आर्थिक केंद्र बनेंगे। सरकार का मानना है कि इससे किसानों और मजदूरों का समय और पैसा दोनों बचेंगे।



दरअसल, अभी तक अधिकांश पैक्स सिर्फ धान खरीदी और खाद वितरण तक सीमित हैं। कई जगहों पर भवन हैं लेकिन गतिविधियां नहीं। कई समितियां सिर्फ चुनाव और राजनीतिक नियुक्तियों का अड्डा बनकर रह गई हैं। अब केंद्र सरकार चाहती है कि पैक्स को बैंकिंग, डिजिटल सेवा और ग्रामीण कारोबार से जोड़ा जाए।



खरीफ से पहले ऑडिट का अल्टीमेटम :

सरकार ने आगामी खरीफ सीजन को देखते हुए सभी समितियों के पुराने कामकाज का ऑडिट अनिवार्य करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि हर साल धान खरीदी के दौरान फर्जीवाड़े, भुगतान विवाद और गड़बड़ियों के मामले सामने आते रहे हैं। राज्य में इस समय 2058 सहकारी समितियां और 2739 धान उपार्जन केंद्र संचालित हैं। कई समितियों के रिकॉर्ड वर्षों से अपडेट नहीं हुए। ऐसे में सरकार अब पुराने खातों और लंबित मामलों की जांच करवाने की तैयारी में है।



भरोसा, सहकारिता में सबसे बड़ा संकट:

छत्तीसगढ़ की सहकारिता व्यवस्था लंबे समय से भरोसे के संकट से जूझ रही है। विभाग में छोटे से लेकर बड़े घोटालों की जांच भी विभागीय ऑडिटर ही करते हैं। कई मामलों में उन्हीं अधिकारियों को जांच सौंप दी जाती है जिन पर सवाल उठते हैं। ऐसे में कार्रवाई फाइलों में दबकर रह जाती है।



यही वजह है कि सहकारी बैंकों और समितियों में वित्तीय अनियमितताओं के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। करोड़ों के घोटाले के बावजूद दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। नई नीति में जवाबदेही तय करने और डिजिटल रिकॉर्ड मजबूत करने पर जोर दिया गया है।



राजनीतिक कब्जे ने बिगाड़ी व्यवस्था:

सहकारिता विभाग की सबसे बड़ी बीमारी राजनीतिक हस्तक्षेप मानी जाती है। सहकारी समितियों और बैंकों में वर्षों से राजनीतिक नियुक्तियां होती रही हैं। कई समितियां नेताओं के प्रभाव में काम करती हैं, जिससे उनकी स्वायत्तता खत्म हो जाती है। सरकार की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई समितियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। उनका इक्विटी आधार कमजोर है और ऋण वसूली की स्थिति बेहद खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान कर्ज लौटाने में असमर्थ हैं, जबकि समितियां वसूली के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पातीं।



सिस्टम अभी भी कागजों में कैद:

देशभर में बैंकिंग सिस्टम तेजी से डिजिटल हो रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ की कई सहकारी संस्थाएं अब भी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। कई जगह रिकॉर्ड मैनुअल तरीके से रखे जाते हैं। कर्मचारियों को नई तकनीक की पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिली है। नई नीति में नेशनल कोऑपरेटिव डेटाबेस से सभी समितियों को जोड़ने और रिकॉर्ड अपडेट करने पर जोर दिया गया है। सरकार चाहती है कि हर समिति का डिजिटल प्रोफाइल तैयार हो, ताकि वित्तीय लेनदेन और गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके।



जनऔषधि से ई-डिस्ट्रिक्ट तक एक ही नेटवर्क:

नई नीति सिर्फ खेती और बैंकिंग तक सीमित नहीं है। सरकार अब सहकारी समितियों को प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र, कॉमन सर्विस सेंटर और ई-डिस्ट्रिक्ट सेवाओं से भी जोड़ना चाहती है। इसके अलावा विश्व अन्न भंडारण योजना, भारतीय बीज सहकारी समिति और राष्ट्रीय सहकारी निर्यात समिति की योजनाओं को भी सहकारिता नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। सरकार का लक्ष्य साफ है गांवों में सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण सर्विस हब बनाना। यानी आने वाले समय में गांव का आम आदमी छोटी-छोटी सरकारी सेवाओं के लिए शहरों के चक्कर नहीं लगाएगा।



क्या बदल पाएगा सिस्टम?

केंद्र सरकार ने रोडमैप भेज दिया है, लेकिन छत्तीसगढ़ में सहकारिता विभाग की पुरानी छवि बदलना आसान नहीं होगा। विभाग वर्षों से घाटे, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और फर्जी ऑडिट की शिकायतों से घिरा रहा है। कई सहकारी शक्कर कारखाने लगातार घाटे में हैं। छोटे किसानों की भागीदारी भी घटती जा रही है। ऐसे में “सहकार से समृद्धि” सिर्फ कागजी नारा बनता है या वाकई गांवों की तस्वीर बदलता है, यह आने वाले महीनों में साफ होगा। फिलहाल इतना तय है कि केंद्र सरकार अब छत्तीसगढ़ की सहकारिता व्यवस्था को पुराने ढर्रे पर चलने देने के मूड में नहीं दिख रही।



ये खबरें भी पढ़ें...

हर साल धान गायब, फिर भी उन्हीें अफसरों और कर्मचारियों के भरोसे होती है धान खरीदी



धान खरीदी केंद्र में बड़ा फर्जीवाड़ा! मोटर पंप से धान भिगोने का वीडियो वायरल, 4 कर्मचारी बर्खास्त



सिवनी में धान खरीदी को लेकर बड़ा विवाद, समय से पहले बंद हो गया पोर्टल, हाईकोर्ट ने मांगी रिपोर्ट



आज होगी साय कैबिनेट की बैठक, धान खरीदी की तारीख बढ़ाने पर लगेगी मुहर, सीएम साय ने दिए हैं संकेत



Tags:
  • अमित शाह
  • केंद्र सरकार
  • धान खरीदी
  • सहकारिता विभाग
  • सहकारिता