सीएम साय की मंजूरी से होगी क्लास-1 अधिकारियों की जांच, 45 दिन में होगा मंज़ूरी पर फैसला
RAIPUR : छत्तीसगढ़ सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच एवं अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया में बदलाव किया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने नई गाइडलाइन जारी कर भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई को पारदर्शी, समयबद्ध और जवाबदेह बनाने का निर्णय लिया है। नई व्यवस्था के तहत अब राज्य के क्लास-1 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने से पहले मुख्यमंत्री की मंजूरी आवश्यक होगी। वहीं अभियोजन स्वीकृति से जुड़े मामलों में भी तय समय-सीमा निर्धारित कर दी गई है। इस मामले में सवाल उठाया जा रहा है कि क्या ये अफसरों को बचाने का नया तरीका है।
ये है आदेश:
जारी आदेश के अनुसार, जिन मामलों में पहले से अंतिम निर्णय लिया जा चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। नई व्यवस्था का उद्देश्य भ्रष्टाचार के मामलों में लंबित प्रक्रियाओं को कम करना और जांच एजेंसियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध कराना बताया गया है। नई गाइडलाइन के तहत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस), भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के साथ-साथ राज्य प्रशासनिक सेवा के क्लास-1 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी जांच शुरू करने के लिए समन्वय के माध्यम से सीएम साय की स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा। इसके बाद ही किसी प्रकार की जांच आगे बढ़ सकेगी।
नई प्रक्रिया तय:
सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(क) के तहत सरकारी कार्यों के दौरान लिए गए निर्णयों की जांच के लिए भी नई प्रक्रिया निर्धारित की है। इसके अनुसार यदि जांच एजेंसी किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव भेजती है और नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी को मामला प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है, तो उसे आवेदन प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर अभियोजन स्वीकृति जारी करनी होगी।
कानूनी राय लेगा विभाग:
यदि संबंधित विभाग को यह लगता है कि मामला अभियोजन योग्य नहीं है, तो उसे 30 दिनों के भीतर अपनी कानूनी राय प्राप्त करने के लिए प्रकरण विधि विभाग को भेजना होगा। विधि विभाग को ऐसे मामलों में 15 दिनों के भीतर अपना अभिमत देना अनिवार्य होगा। इस प्रकार पूरी प्रक्रिया अधिकतम 45 दिनों में पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।
कैबिनेट कमेटी तक जाएगा मामला:
नई व्यवस्था में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी मामले में प्रशासनिक विभाग और विधि विभाग की राय अलग-अलग होती है, तो मामला सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से कैबिनेट समिति अथवा समन्वय समिति को भेजा जाएगा। ऐसी स्थिति में आवेदन प्राप्त होने की तारीख से अधिकतम तीन माह के भीतर अंतिम निर्णय लेना अनिवार्य होगा।
निजी शिकायत पर जानेंगे पक्ष:
सरकार ने निजी शिकायतों के आधार पर दर्ज होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों के लिए भी स्पष्ट नियम बनाए हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत करता है, तो संबंधित लोक सेवक को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का अवसर दिए बिना मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसे मामलों में नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी को संबंधित अधिकारी या कर्मचारी का पक्ष सुनने के बाद तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
दैनिक वेतनभोगी, संविदा और नियमित कर्मचारियों के मामलों में अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया समान रहेगी। हालांकि आउटसोर्स और मानदेय पर कार्यरत कर्मियों के मामले में अलग व्यवस्था लागू होगी। चूंकि इन कर्मचारियों के लिए सरकार नियुक्तिकर्ता प्राधिकारी नहीं होती, इसलिए उनके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी और जांच एजेंसियां सीधे कानूनी कार्रवाई कर सकेंगी।
क्या कहती है सरकार:
सरकार का मानना है कि नई गाइडलाइन से भ्रष्टाचार के मामलों में अनावश्यक देरी कम होगी, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी और जांच प्रक्रिया अधिक प्रभावी एवं समयबद्ध बन सकेगी। इससे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई को गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
FAQ
- छत्तीसगढ़ सरकार ने क्लास-1 अधिकारियों की जांच के नियमों में क्या बड़ा बदलाव किया है?
उत्तर: अब राज्य के क्लास-1 श्रेणी के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने से पहले मुख्यमंत्री (CM) की अनुमति/मंज़ूरी अनिवार्य कर दी गई है। - क्या दैनिक वेतनभोगी (Daily Wagers) और संविदा (Contractual) कर्मचारियों के लिए कोई अलग प्रक्रिया तय की गई है?
उत्तर: नहीं। दैनिक वेतनभोगी, संविदा और नियमित कर्मचारियों के मामलों में अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) की प्रक्रिया पूरी तरह से समान रहेगी। (केवल आउटसोर्स और मानदेय कर्मियों के लिए छूट है)। - निजी शिकायतों के आधार पर होने वाली जांच के लिए क्या नियम बनाया गया है?
उत्तर: यदि कोई नागरिक निजी शिकायत करता है, तो संबंधित सरकारी कर्मचारी/अधिकारी को अपना पक्ष रखने (सुनवाई का अवसर) दिए बिना मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं होगी। इस पर भी 3 महीने में निर्णय लेना होगा।
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