मौसेरे भाई-बहन की शादी को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नहीं दी मान्यता, महिला को मिलेगा भरण-पोषण

VINAY VERMA | May 20, 2026, 15:08 IST
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मौसेरे भाई-बहन की शादी को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अवैध माना। कोर्ट ने विवाह शून्य घोषित किया, लेकिन महिला को भरण-पोषण का अधिकार बरकरार रखा।

RAIPUR : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाह विवाद के एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि मौसेरे भाई-बहन के बीच हुआ विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में आता है। इसलिए ऐसा विवाह कानूनन शून्य माना जाएगा। हाईकोर्ट ने जांजगीर-चांपा फैमिली कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें सामाजिक प्रथा का हवाला देकर विवाह को वैध माना गया था। इस फैसले को विवाह कानून और पारिवारिक विवादों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



डिवीजन बेंच ने दिया स्पष्ट संदेश:

मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने की। इसमें जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल शामिल थे। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि दो सगे भाइयों या सगी बहनों के बच्चों के बीच विवाह “प्रतिषिद्ध नातेदारी” के दायरे में आता है। हिंदू विवाह अधिनियम ऐसे रिश्तों को वैधता नहीं देता। इसलिए यह विवाह शुरू से ही शून्य माना जाएगा।



धारा 5(4) का हवाला:

हाईकोर्ट ने फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(4) का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इस धारा के तहत निषिद्ध संबंधों में विवाह वैध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सामाजिक परंपरा या समुदाय की प्रथा का हवाला देकर कानून को दरकिनार नहीं किया जा सकता। किसी प्रथा को वैध मानने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि वह लंबे समय से चली आ रही हो, लगातार प्रचलन में हो और सार्वजनिक नीति के खिलाफ न हो।



क्यों खारिज हुआ ब्रह्म विवाह का तर्क:

दरअसल फैमिली कोर्ट ने पटेल समाज में प्रचलित कथित “ब्रह्म विवाह” प्रथा का उल्लेख करते हुए इस विवाह को वैध माना था। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मामले में ऐसी कोई ठोस सामग्री या प्रमाण पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि यह प्रथा प्राचीन और कानूनी रूप से मान्य है। अदालत ने कहा कि केवल मौखिक तर्क या सामाजिक दावा पर्याप्त नहीं होता। किसी प्रथा को कानून के रूप में मान्यता देने के लिए साक्ष्य जरूरी हैं।



यह था पूरा मामला:

मामला जांजगीर चांपा जिले से जुड़ा है। यहां एक युवक ने 20 अप्रैल 2018 को गांव की युवती से विवाह किया था। शादी के कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। इसके बाद पति ने अदालत में याचिका दायर कर विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की। उसका कहना था कि उसकी मां और पत्नी की मां सगी बहनें हैं। यानी दोनों मौसेरे भाई-बहन हैं। इसलिए यह विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार अवैध है।



विवाह शून्य, महिला के अधिकार बरकरार:

हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह शून्य घोषित होने का मतलब यह नहीं है कि महिला के सभी अधिकार खत्म हो जाएंगे। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत महिला स्थायी भरण-पोषण यानी गुजारा भत्ता मांग सकती है। कोर्ट ने माना कि कानून का उद्देश्य केवल विवाह की वैधता तय करना नहीं, बल्कि प्रभावित पक्ष को न्याय देना भी है। इसी वजह से अदालत ने वैवाहिक कानून और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।



फैसले के दूरगामी असर:

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य के कई मामलों में मिसाल बन सकता है। खासकर उन मामलों में, जहां सामाजिक प्रथा और वैवाहिक कानून आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि परंपरा तभी मान्य होगी, जब वह कानून की कसौटी पर खरी उतरेगी।



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