3000 करोड़ रुपए खर्च, नहीं हो सके गांव कनेक्ट, केंद्र से मिले 3,942 करोड़ से डिजिटल छत्तीसगढ़ का दावा
NEWS IN SHORT :
- प्रदेश में कुल 19,567 गांव हैं।
- इनमें से सिर्फ 18,367 गांवों तक ही नेटवर्क पहुंचा है।
- 1200 गांव अब भी डिजिटल इंडिया से कटे हुए हैं।
- बस्तर, सरगुजा, कोरिया जैसे वनांचल क्षेत्रों में स्थिति बेहद खराब है।
NEWS IN DETAIL :
कागजों में डिजिटल क्रांति, जमीन पर नेटवर्क का संकट
छत्तीसगढ़ की तस्वीर इन दिनों कुछ ऐसी ही नजर आ रही है। केंद्र सरकार ने राज्य में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने और दूरदराज के गांवों तक इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाने के लिए करीब 4 हजार करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि भेजी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब साल 2018 से ही करीब 3 हजार करोड़ रुपए अलग-अलग योजनाओं के तहत मिल चुके हैं, तो उसका उपयोग आखिर हुआ कहां? क्योंकि आज भी प्रदेश के हजारों गांव ऐसे हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट किसी सपने से कम नहीं।
पहले चरण में छत्तीसगढ़ की 5987 ग्राम पंचायतें आप्टिकल फाइवर के जरिए इंटरनेट से भारत नेट के कंट्रोल रूम से जोड़ना था। इसके लिए केबल जमीन से 1.65 मीटर नीचे बिछाया जाना था। दावा था कि इसमें 48 कोर व वायर प्राकृतिक आपदा के दौरान भी काम करेंगे। लेकिन बस्तर जैसे कई जगहों में ये केबल गायब हो गए हैं।
सदन में बवाल
प्रदेश में डिजिटल कनेक्टिविटी को लेकर सदन तक में सवाल उठ चुका है। जिसके बाद मांग मे ंआए गांवों को डिजिटल बनाने के लिए केंद्र सरकार से मांग की। केंद्र ने फरवरी महीने में राज्य को 3,942 करोड़ रुपए की स्वीकृति दी।
कागजों में डिजिटल इंडिया, गांवों में ‘नो सिग्नल
छत्तीसगढ़ के बस्तर, सरगुजा और अन्य आदिवासी बहुल इलाकों में हालात जस के तस बने हुए हैं। कई गांवों में आज भी लोग एक कॉल करने के लिए पहाड़ियों या पेड़ों पर चढ़ने को मजबूर हैं। डिजिटल सेवाओं की बात तो दूर, सामान्य मोबाइल कनेक्टिविटी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। जबकि साल 2018 मे ही छग सरकार ने अलग से बस्तर नेट नामक प्रोग्राम चलाया था।
केंद्र का पैसा, राज्य की जिम्मेदारी’
क्रेंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे भारतनेट और यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड के तहत यह राशि राज्य को दी गई थी, ताकि फाइबर नेटवर्क बिछाकर गांव-गांव तक इंटरनेट पहुंचाया जा सके। लेकिन ऐसा न हो सका, इसी लापरवाही का नतीजा है कि कई क्षेत्रों में लोग योजनाओं का लाभ लेने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं।
डिजिटल योजनाएं ठप, जनता परेशान
सरकार की कई योजनाएं अब पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं चाहे राशन वितरण हो, पेंशन, छात्रवृत्ति या स्वास्थ्य सेवाएं। लेकिन जिन इलाकों में नेटवर्क ही नहीं है, वहां के लोग इन सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। गांवों में राशन दुकानें अक्सर ‘सर्वर डाउन’ का बहाना बनाकर वितरण टाल देती हैं। वहीं छात्र ऑनलाइन पढ़ाई और परीक्षा से भी पीछे छूट रहे हैं।
नई राशि, पुरानी कहानी दोहराने का खतरा
अब जब केंद्र ने एक बार फिर 4 हजार करोड़ रुपए की राशि भेजी है, तो उम्मीद है कि इस बार कुछ ठोस होगा। लेकिन अगर सिस्टम में सुधार नहीं हुआ, तो यह रकम भी पहले की तरह फाइलों और कागजों में ही सिमट सकती है। राज्य सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती है पिछली राशि का ऑडिट कराना, अधूरी परियोजनाओं को पूरा करना और सबसे जरूरी, जवाबदेही तय करना।
ग्राउंड जीरो पर क्या चाहिए?
डिजिटल छत्तीसगढ़ (Digital Chhattisgarh) का सपना तभी पूरा होगा जब हर गांव तक फाइबर नेटवर्क पहुंचे, मोबाइल टावरों की संख्या बढ़े, नेटवर्क की गुणवत्ता सुधरे और स्थानीय स्तर पर तकनीकी मेंटेनेंस की व्यवस्था हो।
जनता पूछ रही, डिजिटल कब होंगे हम?
आज गांव का आम आदमी यही सवाल पूछ रहा है कि आखिर डिजिटल इंडिया का हिस्सा वह कब बनेगा? जब सरकारें डिजिटल सेवाओं को अनिवार्य बना रही हैं, तो बुनियादी ढांचा भी उतनी ही तेजी से तैयार होना चाहिए।
निष्कर्ष:
छत्तीसगढ़ में डिजिटल क्रांति के लिए पैसा तो भरपूर आया, लेकिन नतीजे अब भी अधूरे हैं। 2018 से अब तक मिले हजारों करोड़ रुपए का हिसाब साफ नहीं है। ऐसे में नई राशि के साथ उम्मीद से ज्यादा सवाल खड़े हो गए हैं। अगर इस बार भी निगरानी और पारदर्शिता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो डिजिटल छत्तीसगढ़ का सपना सिर्फ भाषणों और घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा और गांवों में लोग यूं ही नेटवर्क तलाशते रहेंगे।
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