AI से बनाए फर्जी वन अधिकार पट्टे : 500 आदिवासियों से लाखों की वसूली, जांच ठप

VINAY VERMA | Jul 30, 2026, 22:36 IST
AI से बनाए फर्जी वन अधिकार पट्टे
छत्तीसगढ़ में AI से फर्जी वन अधिकार पट्टे बनाने और आदिवासियों से 30 हजार रुपए तक वसूली का आरोप सामने आया है। कोटा और लोरमी क्षेत्र के 400-500 ग्रामीणों के दस्तावेज संदिग्ध मिले हैं। डीएफओ ने फर्जी बताया है। विधानसभा में जांच की मांग तेज हुई है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • 30 हजार में फर्जी पट्टे का आरोप
  • 400-500 आदिवासी बताए गए पीड़ित
  • डीएफओ ने दस्तावेज फर्जी बताए
  • राजस्व मिलीभगत की आशंका उठी
  • विधानसभा में जांच की मांग तेज

Raipur : छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पट्टों को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। बांटे जाने वाले पट्टे वास्तविक लगे इसके लिए इसे AI से तैयार किया गया है। हर पट्टे के बदले 30 हजार रुपए तक वसूले गए। इस फर्जीवाड़ा का शिकार कोटा और लोरमी क्षेत्र के 400 से 500 आदिवासी हो चुके हैं। प्रारंभिक जांच में स्थानीय डीएफओ खुद इन पट्टों को फर्जी बताया हैं। कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव का आरोप है कि वन मंत्री से शिकायत के बाद कार्रवाई तो दूर, विस्तृत जांच भी नहीं हो रही।



फर्जी दस्तावेज बनाने वाले गिरोह सक्रिय

वन अधिकार कानून का मकसद वर्षों से जंगल में रह रहे पात्र वनवासियों को कानूनी अधिकार देना था। लेकिन इसी कानून का फायदा उठाकर फर्जी दस्तावेज बनाने वाले गिरोह सक्रिय हो गए। पहले नकली रिकॉर्ड तैयार होते हैं। फिर सरकारी आदेश जैसी भाषा और डिजाइन में दस्तावेज बनाए जाते हैं। अब आरोप है कि एआई तकनीक का इस्तेमाल कर ऐसे पट्टे और भी असली जैसे दिखाए जा रहे हैं। ग्रामीणों को भरोसा दिलाया जाता है कि उनका नाम सरकारी सूची में जुड़ गया है। बदले में मोटी रकम वसूली जाती है।



रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं मिला

लोरमी क्षेत्र के रहने वाले भगत राम को वन अधिकार पट्टा देने का दावा किया गया। परिवार से 30 हजार रुपए लिए गए। बाद में जब दस्तावेज का सत्यापन हुआ तो वह रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं मिला। स्थानीय वन अधिकारियों ने प्रारंभिक स्तर पर ऐसे दस्तावेजों को फर्जी बताया। इससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। अब सवाल यह है कि ऐसे दस्तावेज तैयार किसने किए और रकम किसके पास पहुंची? यही कहानी कोटा के भुलउ राम की भी है। कहना है कि उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि अब जमीन पर उनका पूरा अधिकार हो गया है। बाद में विभागीय स्तर पर दस्तावेज संदिग्ध बताए गए।



वन विभाग जांच से दूर क्यों?

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि डीएफओ सार्वजनिक रूप से दस्तावेजों को फर्जी बता रहे हैं, तो एफआईआर, साइबर जांच और विशेष जांच दल की कार्रवाई तुरंत क्यों नहीं दिख रही? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में वन विभाग, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन के रिकॉर्ड का मिलान जरूरी होता है। यदि किसी स्तर पर मिलीभगत हुई है, तो जांच कई अधिकारियों तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि कार्रवाई की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अभी तक किसी अधिकारी की भूमिका आधिकारिक जांच में सिद्ध नहीं हुई है।



राजस्व विभाग की भूमिका भी घेरे में

विधानसभा में यह आरोप भी लगाया गया कि राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका है। वन अधिकार पट्टा जारी करने की प्रक्रिया में ग्राम सभा, राजस्व रिकॉर्ड, वन विभाग और जिला स्तरीय समितियों की भूमिका होती है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज चल रहे हैं, तो रिकॉर्ड की कई परतों की जांच जरूरी होगी। बिना दस्तावेजी और तकनीकी सत्यापन के किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, लेकिन सवाल लगातार उठ रहे हैं।



सरकार बदलने के बाद क्या बदला?

सत्ता परिवर्तन के बाद कई पुराने मामलों की दोबारा जांच शुरू हुई है। कोयला, शराब और अन्य मामलों में एजेंसियों की सक्रियता बढ़ी है। यदि वन अधिकार पट्टा मामले में भी व्यापक जांच बैठती है, तो फर्जी दस्तावेज बनाने वाले गिरोह, बिचौलियों और किसी संभावित प्रशासनिक भूमिका की परतें खुल सकती हैं। इससे पात्र आदिवासियों के असली अधिकार भी सुरक्षित हो सकते हैं। लेकिन यदि जांच लंबी खिंची, तो असली हितग्राही और फर्जीवाड़े के शिकार लोग वर्षों तक न्याय का इंतजार करते रहेंगे।



अब जवाब विभाग को देना होगा

वन अधिकार कानून भरोसे का कानून है। इसी भरोसे पर आदिवासी अपने अधिकार मांगते हैं। यदि फर्जी पट्टे बेचने का आरोप सही है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि सामाजिक विश्वास पर हमला है। विधानसभा में मामला उठ चुका है। डीएफओ का बयान भी चर्चा में है। अब नजर इस पर है कि वन मंत्री जांच के आदेश देते हैं या नहीं। यदि सच्चाई सामने नहीं आई, तो जंगल से ज्यादा भरोसा उजड़ने का खतरा रहेगा।



FAQ

  1. छत्तीसगढ़ में फर्जी वन अधिकार पट्टा मामले में क्या आरोप हैं?
    आरोप है कि AI की मदद से नकली वन अधिकार पट्टे तैयार किए गए और आदिवासियों से 30 हजार रुपए तक वसूले गए।
  2. फर्जी वन अधिकार पट्टे मामले में कितने लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं?
    कोटा और लोरमी क्षेत्र में करीब 400 से 500 आदिवासियों के इस फर्जीवाड़े का शिकार होने की बात सामने आई है।
  3. क्या फर्जी पट्टा मामले में किसी अधिकारी पर कार्रवाई हुई है?
    अभी तक किसी अधिकारी की भूमिका जांच में साबित नहीं हुई है। मामले में विस्तृत जांच और कार्रवाई की मांग की जा रही है।

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