रायपुर एयरपोर्ट पर पुश्तैनी दावा : किसान ने मांगा 3500 करोड़ का मुआवजा

Aishwarya Dwivedi | Jul 04, 2026, 13:41 IST
किसान ने रायपुर एयरपोर्ट की ज़मीन पर दावा किया
रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान ने 3500 करोड़ का पुश्तैनी दावा ठोककर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है, जिससे प्रदेश के अन्य भूविस्थापितों का पुराना संघर्ष भी दोबारा गहरा गया है।

समझें क्या है पूरा मामला

रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन को लेकर बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। किसान अश्विनी बांधे ने एयरपोर्ट की 34.35 हेक्टेयर जमीन पर पुश्तैनी दावा ठोका है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर 3500 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा है। किसान का कहना है कि यह जमीन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने लीज पर ली थी। 84 साल बाद भी न जमीन लौटी और न ही किराया मिला। इस मामले ने प्रदेश के अन्य भूविस्थापित परिवारों के संघर्ष को भी सामने ला दिया है। भिलाई और कोरबा के किसान भी दशकों से रोजगार और पुनर्वास के लिए जूझ रहे हैं।



कागजात के लिए खर्च हुए करोड़ों रुपए

किसान का दावा है कि एयरपोर्ट की मौजूदा टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बने हैं। पिछले 35 सालों से वे रिकॉर्ड रूम, दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। इस पूरी लड़ाई में अब तक करीब 20 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। यह रकम दस्तावेज जुटाने और कानूनी प्रक्रिया में लगी है।



संस्कृति विभाग से मिले पुराने दस्तावेज

इस लड़ाई को तब बड़ी मजबूती मिली जब संस्कृति विभाग की एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी में किसान को अपनी जमीन के सरकारी दस्तावेज मिले। संस्कृति विभाग के एक अधिकारी ने भी इसकी पुष्टि की है। उनके मुताबिक द्वितीय विश्व युद्ध के समय माना एयर फील्ड के लिए बरौदा, रामचंडी और आसपास के गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। इसके राजस्व रिकॉर्ड आज भी सुरक्षित हैं। किसान ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत इन प्रमाणित प्रतियों को निकालकर अपना दावा मजबूत किया है।



अंग्रेजों ने लीज पर ली थी जमीन

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने 1939 में डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट लागू किया था। इसी के तहत 1942 में हवाई जहाजों के लिए जमीनें अधिग्रहित की गई थीं।किसान का कहना है कि उनके पूर्वजों से यह जमीन सिर्फ 1300 रुपए सालाना किराए पर ली गई थी। शर्त थी कि युद्ध खत्म होने के बाद जमीन लौटाई जाएगी। लेकिन 84 साल बीतने के बाद भी न जमीन वापस मिली और न किराया।भिलाई में जमीन गई,



रायपुर एयरपोर्ट पर पुश्तैनी दावा


नौकरी की जगह मिली दिहाड़ी

भिलाई इस्पात संयंत्र की बुनियाद जिन किसानों की जमीन पर रखी गई, आज उनके बच्चे उसी जमीन पर दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। साल 1990 के बाद प्रबंधन ने भूविस्थापित परिवारों को नौकरी देना बंद कर दिया था। कई किसान परिवारों को उस समय बेहद कम मुआवजा मिला था। आज उनके वंशज ठेकेदारों के पास महज सात से आठ हजार रुपए महीने की दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं।



कोरबा में भी दशकों से जारी है संघर्ष

कोरबा जिले में एसईसीएल की कोयला खदानों के लिए जमीन देने वाले किसान भी चार दशक से रोजगार की लड़ाई लड़ रहे हैं। कई परिवारों ने 1980 के दशक में अपनी जमीन दी थी। आज भी वे नौकरी की उम्मीद में बूढ़े हो चुके हैं। एक किसान संगठन के पदाधिकारी का कहना है कि प्रबंधन छोटी-मोटी दस्तावेजी कमियों का बहाना बनाकर पात्र लोगों को रोजगार से वंचित रख रहा है।



आगे क्या हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट में रायपुर एयरपोर्ट जमीन मामले पर अब आगे की सुनवाई होनी है। किसान को उम्मीद है कि दशकों पुराने दस्तावेजों के आधार पर उन्हें न्याय मिलेगा।वहीं भिलाई और कोरबा के भूविस्थापित परिवारों का संघर्ष भी जारी है। यह देखना अहम होगा कि इन मामलों में प्रशासन और अदालतें आगे क्या रुख अपनाती हैं।



FAQ

  1. रायपुर एयरपोर्ट जमीन विवाद क्या है?
    किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि एयरपोर्ट की जमीन उनके पूर्वजों की पुश्तैनी संपत्ति है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में 3500 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा है। यह जमीन 1942 में लीज पर ली गई थी।
  2. रायपुर एयरपोर्ट जमीन विवाद में किसान का दावा किन दस्तावेजों पर आधारित है?
    किसान को संस्कृति विभाग की एक प्रदर्शनी में पुराने सरकारी दस्तावेज मिले थे। इनमें द्वितीय विश्व युद्ध के समय जमीन अधिग्रहण के राजस्व रिकॉर्ड शामिल हैं। इन्हीं के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में दावा किया गया है।
  3. भिलाई और कोरबा के भूविस्थापितों की स्थिति क्या है?
    भिलाई में जमीन देने वाले किसानों के बच्चे आज उसी जमीन पर दिहाड़ी मजदूरी कर रहे हैं। कोरबा में भी भूविस्थापित परिवार चार दशक से रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दोनों जगह मुआवजा तो मिला, लेकिन स्थायी नौकरी नहीं मिली।

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