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Photograph: (the sootr)
News In Short
- राजस्थान के मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति पर खड़ा हुआ कानूनी विवाद।
- तीन साल के कार्यकाल की नई व्याख्या पर उठे कानूनी सवाल।
- एमएल लाठर की सूचना आयुक्त से मुख्य सूचना आयुक्त पद पर हुई थी नियुक्ति।
- 4 जनवरी 2026 को हो चुका है अधिकतम तीन वर्ष का कार्यकाल
- सूचना आयुक्त से मुख्य सूचना आयुक्त बनने पर मान रहे हैं नया कार्यकाल
News In Detail
राजस्थान में मुख्य सूचना आयुक्त मोहनलाल लाठर के कार्यकाल को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। राजभवन पहुंची शिकायत के अनुसार उन्हें पहले जनवरी 2023 में सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया था, फिर जुलाई 2024 में मुख्य सूचना आयुक्त बनाया गया। आरोप है कि पदोन्नति को नई नियुक्ति मानकर तीन वर्ष का नया कार्यकाल देना सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 16(1) की भावना के विपरीत है, जिसमें कुल कार्यकाल तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक सीमित है। मामला राजस्थान में पारदर्शिता और संवैधानिक प्रावधानों पर व्यापक बहस का विषय बन सकता है।
लाठर के खिलाफ यह है शिकायत
एडवोकेट महेंद्र गौड़ की शिकायत के अनुसार मोहन लाल लाठर को 12 जनवरी 2023 को राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया था। उनकी नियुक्ति तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु में जो भी पहल हो, के लिए गई थी। उन्होंने 15 जनवरी 2023 को पदभार ग्रहण किया। इसके बाद 4 जुलाई 2024 को जब वे सूचना आयुक्त के रूप में कार्यरत थे, उन्हें राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया था। उन्होंने 9 जुलाई 2024 को सीआईसी के रूप में शपथ ग्रहण की थी।
नहीं मान सकते नया कार्यकाल
शिकायत में कहा है कि सूचना आयुक्त से मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर पदोन्नति को नई नियुक्ति मानकर लाठर का कार्यकाल नए सिरे से पुनः तीन वर्ष के लिए निर्धारित करना विधि सम्मत नहीं है। शिकायतकर्ता का कहना है कि सूचना आयोग में उनका कार्यकाल 15 जनवरी 2023 से गिना जाना चाहिए। इस आधार पर 14 जनवरी 2026 को तीन वर्ष की अधिकतम अवधि पूर्ण हो चुकी है। ऐसे में इसके बाद उनका पद पर बने रहना आरटीआई अधिनियम की धारा 16(1) के विपरीत है।
यह है प्रावधान
सूचना का अधिकार अधिनियम धारा-16(1) के अनुसार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक जो भी पहले हो निर्धारित है। शिकायत में कहा गया है कि अधिनियम में कहीं भी यह स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि सूचना आयुक्त से मुख्य सूचना आयुक्त बनने पर नए सिरे से तीन साल का कार्यकाल प्रारंभ हो जाएगा या कुल सेवा अवधि तीन वर्ष से अधिक हो सकती है।
कानूनी मंशा ही नहीं है यह तो
शिकायत में कहा है कि विधायिका की मंशा सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 और 2019 में हुए संशोधन के तहत विधायिका की मंशा सूचना आयुक्त को मुख्य सूचना आयुक्त बनाकर तीन साल का एक नया कार्यकाल देने की नहीं है। यह कानून का सुस्थापित सिद्वांत है कि जो कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता।
इसलिए जुलाई 2024 में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के तहत पदोन्नति देकर कार्यकाल को रीसेट करना विधायिका की मंशा को दरकिनार करना है। अधिनियम का उद्देश्य आयोग में सीमित अवधि सुनिश्चित कर पारदर्शिता, जवाबदेही और पदों पर नियमित परिवर्तन को बढ़ावा देना है, ताकि किसी एक व्यक्ति का लंबे समय तक प्रभाव न बना रहे।
लाठर की नियुक्ति मनमाना फैसला
शिकायत में चयन प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठाए हैं। आरोप है कि चयन समिति ने अन्य योग्य उम्मीदवारों की तुलना में लाठर को प्राथमिकता देने के पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए। इसे मनमाना और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि बाहरी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर दिए बिना किसी वर्तमान सूचना आयुक्त को सीधे मुख्य सूचना आयुक्त बनाना निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।
दूसरे राज्यों में नहीं है ऐसा
अभ्यावेदन में अन्य राज्यों की प्रथाओं का उदाहरण देकर बताया है कि महाराष्ट्र,कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में कार्यकाल को आयोग में कुल सेवा अवधि के रूप में गिना गया है,न कि पदोन्नति के बाद नए सिरे से। दिल्ली और तमिलनाडु में भी अदालत ने कहा है कि यदि कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो तो कार्यकाल का विस्तार या पुनर्नियुक्ति स्वीकार्य नहीं है।
लाठर को तत्काल हटाया जाए
शिकायतकर्ता ने राज्यपाल से मांग की है कि 14 जनवरी 2026 के बाद लाठर का कार्यकाल समाप्त घोषित करके उन्हें तत्काल पद छोड़ने का निर्देश दिया जाए। साथ ही राज्य सरकार को नए मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए ताजा चयन प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश देने की भी मांग की गई है।
पहले भी हो चुकी है शिकायत
अभ्यावेदन में 15 अप्रैल 2025 की एक शिकायत का भी उल्लेख किया है। इस शिकायत में लाठर पर कथित रुप से पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे। यह शिकायत भी अब तक राज्यपाल के समक्ष लंबित बताई गई है।
व्यापक होगा प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला आरटीआई अधिनियम के तहत कार्यकाल की व्याख्या,पारदर्शिता और संविधानिक समानता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ा होने के कारण कानूनी और प्रशासनिक हलकों में व्यापक बहस का विषय बन सकता है। इस संबंध में राज्यपाल का निर्णय न केवल राजस्थान बल्कि अन्य राज्यों में भी समान परिस्थितियों पर प्रभाव डाल सकता है।
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