17 साल में जंगल से खेत बने, 106 एकड़ पर कब्जे का खेल
Gariaband. उदंती टाइगर रिजर्व से लगे जैतपुरी गांव में सामने आया वन भूमि अतिक्रमण अब केवल अवैध कब्जे का मामला नहीं रह गया है। 17 साल में 10 एकड़ से बढ़कर 106 एकड़ से अधिक वन भूमि तक पहुंच चुके इस कब्जे ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सैटेलाइट तस्वीरों और वन विभाग से जुड़े जानकारों के आकलन के मुताबिक, इस दौरान करीब दो लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि यदि यह सब धीरे-धीरे हुआ तो वन विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी और अगर पता चल गया तो समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
2008 में शुरू हुआ कब्जा हर साल बढ़ता गया
जैतपुरी गांव में वन भूमि पर कब्जे की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई। शुरुआती दौर में करीब 10 एकड़ सरकारी जमीन पर स्थानीय और बाहरी लोगों ने खेती और बसाहट के लिए कब्जा करना शुरू किया। उस समय यदि कार्रवाई होती तो मामला शुरुआती स्तर पर ही रुक सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महज दो साल बाद 2010 तक कब्जा बढ़कर 15 एकड़ हो गया। इसके बाद भी स्थिति नहीं बदली। वर्ष 2015 तक अतिक्रमण 45 एकड़ वन भूमि को अपनी चपेट में ले चुका था। इस दौरान कब्जाधारी लगातार जंगल साफ करते गए और नई जमीन को खेती योग्य बनाते रहे या फिर आप मकान बनाए लगे। वर्ष 2026 तक यह आंकड़ा 106 एकड़ से अधिक पहुंच गया।
जंगल गायब होता रहा, विभाग चेतावनी देता रहा
स्थानीय सूत्रों और वन विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि पिछले 17 वर्षों में कई बार अतिक्रमण की जानकारी अधिकारियों तक पहुंची। वन विभाग केवल नोटिस और चेतावनी देता रहा, लेकिन बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा यह हुआ कि कब्जाधारी पहले टाइगर रिजर्व की सीमा से बाहर सक्रिय रहे और धीरे-धीरे संरक्षित वन क्षेत्र की ओर बढ़ते चले गए। यह सवाल भी उठ रहा है कि जब ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट मैपिंग और नियमित गश्त जैसी व्यवस्थाएं मौजूद थीं, तब आखिर इतने बड़े क्षेत्र में जंगल साफ कैसे हो गया।
सैटेलाइट तस्वीरों ने खोली तबाही की कहानी
वन विभाग से जुड़े जानकारों के अनुसार सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2008 में जिन इलाकों में प्रति एकड़ करीब आठ हजार पेड़ मौजूद थे, वहां अब कई हिस्सों में यह संख्या घटकर एक हजार से भी कम रह गई है। इसी आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि पिछले डेढ़ दशक में दो लाख से अधिक पेड़ों की कटाई हुई है। यदि यह आकलन सही है तो यह केवल वन भूमि अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि संरक्षित जंगल के बड़े पैमाने पर विनाश का मामला भी बनता है। इसका सीधा असर जैव विविधता, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उदंती टाइगर रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।
अब कार्रवाई, तो पुश्तैनी जमीन का दावा
वन विभाग ने हाल के दिनों में फिर से नोटिस जारी कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की है। कार्रवाई के दौरान कई कब्जाधारियों ने जमीन को अपनी पुश्तैनी संपत्ति बताया। हालांकि विभाग का कहना है कि दस्तावेज मांगने पर अधिकांश लोग वैध रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सके। उदंती के डीएफओ वरुण जैन का कहना है कि कुल 106 एकड़ से अधिक वन भूमि पर कब्जा किया गया है और विभाग लगातार इसे हटाने की कार्रवाई कर रहा है। उनके अनुसार विरोध जरूर होता है, लेकिन जमीन के दस्तावेज मांगने पर लोग पीछे हट जाते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पहले हुए ड्रोन सर्वे और वर्तमान स्थिति में काफी बदलाव आया है।
राजनीति भी गरमाई
मामले को लेकर कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि वन विभाग की मिलीभगत से दो लाख से अधिक पेड़ काटे गए और इलाके से खुलेआम लकड़ी की तस्करी होती रही। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों तक जंगल साफ होता रहा और अब पूरे मामले का दोष भोले-भाले आदिवासियों पर मढ़ा जा रहा है, जबकि असली जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो रही। विधायक यादव का कहना है कि इस संबंध में उन्होंने पत्र लिखकर एक शिकायत भी की है। वन विभाग ने इन आरोपों पर प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की है, लेकिन विभाग का कहना है कि वर्तमान में कब्जा हटाने की कार्रवाई जारी है। जो लोग कब्जे नहीं हटा रहे हैं उन्हें गिरफ्तार करने की तैयारी की जा रही है।
आखिर जवाबदेह कौन
जैतपुरी का मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 2008 में शुरू हुआ अतिक्रमण 2026 तक 106 एकड़ से अधिक कैसे पहुंच गया? यदि दो लाख से अधिक पेड़ काटे गए तो उनकी निगरानी कौन कर रहा था? क्या नियमित वन गश्त, सैटेलाइट निगरानी और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्टों में यह सब दर्ज नहीं हुआ? यदि हुआ, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अब जब अतिक्रमण हटाने की मुहिम शुरू हुई है, तब केवल कब्जाधारियों पर कार्रवाई से आगे बढ़कर पूरे घटनाक्रम की जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। क्योंकि सवाल सिर्फ 106 एकड़ वन भूमि का नहीं, बल्कि उस जंगल का है जो 17 वर्षों तक धीरे-धीरे सिमटता रहा और जिम्मेदार तंत्र उसे रोकने में सफल नहीं हो सका।
FAQ
- जैतपुरी में वन भूमि अतिक्रमण का मामला क्या है?
जैतपुरी गांव में वर्ष 2008 से वन भूमि पर अवैध कब्जा शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे बढ़कर 2026 में 106 एकड़ से अधिक क्षेत्र तक पहुंच गया। - भूमि अतिक्रमण क्या होता है?
भूमि अतिक्रमण का मतलब किसी सरकारी, वन या निजी जमीन पर बिना कानूनी अधिकार या अनुमति के कब्जा करना, निर्माण करना या उसका उपयोग करना होता है। वन भूमि पर अतिक्रमण को कानून के तहत अवैध माना जाता है और इसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। - भूमि अतिक्रमण पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
भूमि अतिक्रमण होने पर सरकार या संबंधित विभाग कब्जा हटाने के लिए नोटिस जारी कर सकता है। अगर कब्जाधारी जमीन खाली नहीं करता, तो अदालत के आदेश से ज़बरदस्ती कब्जा हटाया जा सकता है, और जिम्मेदारों के खिलाफ जुर्माना या गिरफ्तारी जैसी कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
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