छत्तीसगढ़ सरकार ने JSW इस्पात के लिए आसान किया रास्ता, 1.40 हेक्टेयर जमीन को बनाया संरक्षित वन

VINAY VERMA | May 20, 2026, 16:17 IST
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छत्तीसगढ़ सरकार ने कांकेर में 1.40 हेक्टेयर घास मद की जमीन को संरक्षित वन घोषित किया है, जिससे ग्रामीणों के विरोध के बीच JSW इस्पात के लिए रास्ता आसान होने की संभावना है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तर बस्तर कांकेर जिले में एक बड़ा प्रशासनिक और रणनीतिक फैसला लिया है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने दुर्गुकोन्दल तहसील के राउरवाही गांव की 1.400 हेक्टेयर सरकारी जमीन को संरक्षित वन घोषित कर दिया है। नवा रायपुर अटल नगर से जारी अधिसूचना के बाद पूरे इलाके में चर्चा तेज हो गई है। कागजों में यह फैसला वन संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे सीधे तौर पर निजी कंपनी JSW ISPAT special projects ltd को राहत देने वाली कार्रवाई माना जा रहा है।



खदान तक पहुंच आसान करने की तैयारी:

जानकारी के अनुसार, कंपनी ने इस क्षेत्र में भूमिगत बिजली लाइन बिछाने और खदान तक पहुंच मार्ग के चौड़ीकरण का प्रस्ताव दिया था। इसी प्रस्ताव के बाद पूरी प्रक्रिया तेज हुई। प्रशासनिक स्तर पर जमीन को पहले वन विभाग के अधीन लाया गया और फिर उसे संरक्षित वन की श्रेणी में शामिल कर दिया गया। माना जा रहा है कि इस बदलाव के बाद भविष्य में कंपनी को लीज, डायवर्शन और परियोजना मंजूरी लेने में आसानी होगी।



वन कानून के तहत भेजा गया प्रस्ताव:

दस्तावेजों के मुताबिक, भानुप्रतापपुर वनमंडल के अंतर्गत आने वाली इस जमीन के लिए लगभग 1.396 हेक्टेयर भूमि का प्रस्ताव तैयार किया गया था। यह प्रस्ताव वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980 के तहत शासन को भेजा गया। अधिकारियों ने तकनीकी प्रक्रिया पूरी करते हुए जमीन को वन विभाग के नाम स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत इसे संरक्षित वन घोषित किया गया।



घास मद से सीधे वन विभाग तक:

पूरे मामले का सबसे अहम पहलू जमीन के वर्गीकरण में बदलाव माना जा रहा है। अधिसूचना जारी होने से पहले यह जमीन राजस्व रिकॉर्ड में “घास” मद के रूप में दर्ज थी। यानी यह सार्वजनिक उपयोग और चरागाह श्रेणी की जमीन थी। गांव के लोग वर्षों से इसका उपयोग कर रहे थे। लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए पहले इसका लैंड यूज बदला गया। फिर जमीन का नियंत्रण राजस्व विभाग से हटाकर वन विभाग को सौंप दिया गया। इसके बाद इस जमीन की कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल गई।



अब कंपनी को मिलेगी आसान मंजूरी?

विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी जमीन को वन विभाग के नियंत्रण में लाया जाता है, तब भविष्य में परियोजना डायवर्शन और उपयोग की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल हो जाती है। यही वजह है कि इस पूरे कदम को जेएसडब्ल्यू इस्पात के लिए “ग्रीन कॉरिडोर” तैयार करने के रूप में देखा जा रहा है। अधिसूचना में जमीन की सीमाओं को ग्लोबल जीपीएस कोऑर्डिनेट्स के जरिए लॉक भी कर दिया गया है। यानी भविष्य में सीमा विवाद या दावे की संभावना बेहद कम रहेगी।



गांव में बढ़ा विरोध और असंतोष:

राउरवाही गांव में इस फैसले को लेकर नाराजगी बढ़ती दिख रही है। ग्रामीणों का कहना है कि घास मद की जमीन सार्वजनिक होती है और इसका उपयोग गांव के एक हजार से अधिक लोग करते थे। लोगों का आरोप है कि बिना ग्रामसभा की सहमति और स्थानीय जरूरतों को देखे जमीन को निजी कंपनी के हित में बदल दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि इसी जमीन पर भविष्य में स्कूल, आंगनबाड़ी या अन्य सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की जा सकती थीं।



सरकार ने अपने पास रखी बड़ी शक्ति:

पूरे आदेश में एक अहम क्लॉज भी जोड़ा गया है। इसमें राज्य सरकार को भविष्य में इन अधिकारों में संशोधन या रूपांतरण का अधिकार सुरक्षित रखा गया है। आम तौर पर माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में स्थानीय विरोध की आशंका रहती है। ऐसे मामलों में सरकार कानूनी नियंत्रण अपने पास बनाए रखती है। यही वजह है कि इस अधिसूचना को केवल जमीन ट्रांसफर नहीं, बल्कि भविष्य की औद्योगिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।



सवाल अभी भी बाकी हैं:

सरकार इसे प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया बता रही है। लेकिन स्थानीय लोगों के बीच सवाल बना हुआ है कि आखिर सार्वजनिक उपयोग की जमीन को इतनी तेजी से संरक्षित वन घोषित करने की जरूरत क्यों पड़ी। आने वाले दिनों में यह मामला केवल वन प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्राम अधिकार, सार्वजनिक जमीन और औद्योगिक हितों के टकराव का बड़ा मुद्दा बन सकता है।



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