हसदेव पर तीसरा हमला! खनन के लिए अडानी को मंजूरी, हाई कंजर्वेशन ज़ोन में 4.48 लाख पेड़ों की बलि
NEWS IN SHORT
- हसदेव अरण्य के 1,742.6 हेक्टेयर जंगल में खनन को मंजूरी
- करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की मंजूरी
- अडानी समूह करेगा खनन संचालन
- हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों पर असर की आशंका
- आदिवासी संगठनों और पर्यावरण समूहों का लगातार विरोध
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में फिर बड़ा फैसला हुआ है। सरकार ने 1,742.6 हेक्टेयर जंगल में नई कोयला खदान को मंजूरी दे दी है। इसी इलाके को सरकार के अपने डिसीजन सपोर्ट सिस्टम में हाई कंजर्वेशन ज़ोन बताया गया है। यानी ऐसा क्षेत्र, जहां जंगल और जैव विविधता सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी गई। अब इसी जंगल में करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई होगी।
यह मंजूरी राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड यानी RVUNL को मिली है। खनन सरगुजा जिले के केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में होगा। खनन का संचालन अडानी समूह करेगा। यह हसदेव में तीसरी बड़ी कोयला परियोजना होगी। पहले से परसा और पीईकेबी खदानें चल रही हैं।
कभी नो-गो ज़ोन, अब खुला खनन का रास्ता
हसदेव अरण्य को कभी नो-गो ज़ोन कहा गया था। मतलब ऐसा क्षेत्र जहां खनन की अनुमति नहीं होनी चाहिए। कारण साफ था। घने साल जंगल। हाथियों का कॉरिडोर। आदिवासी आबादी। नदियों का जलग्रहण क्षेत्र। लेकिन अब वही इलाका धीरे-धीरे कोयला बेल्ट में बदलता जा रहा है।
वन सलाहकार समिति यानी FAC ने 8 मई की बैठक में स्टेज-1 मंजूरी दे दी। दलील दी गई कि राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की जरूरत है। कहा गया कि मौजूदा कोल ब्लॉक पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए नई खदान जरूरी है।
अडानी करेगा खनन, राजस्थान को कोयला
आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक यह ब्लॉक RVUNL को 2015 में आवंटित हुआ था। कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ बिजली संयंत्रों में जाएगा। सरकार का दावा है कि 7830 मेगावाट क्षमता वाले प्लांट्स के लिए हर साल 24.05 मिलियन टन कोयला चाहिए। मौजूदा खदानों से जरूरत पूरी नहीं हो रही।
करीब 9 मिलियन टन अतिरिक्त कोयले की जरूरत बताई गई है। इसी तर्क के आधार पर जंगल डायवर्ट करने की मंजूरी मिली। हालांकि विरोध करने वाले सवाल पूछ रहे हैं। क्या बिजली के लिए जंगल खत्म करना ही एकमात्र रास्ता है? क्या ‘हाई कंजर्वेशन ज़ोन’ सिर्फ कागजों तक सीमित है?
चरणबद्ध कटाई का दावा
FAC ने कहा है कि खनन दो चरणों में होगा। पहला चरण 15 साल तक चलेगा। इस दौरान 1001.95 हेक्टेयर जंगल में खनन होगा। दूसरे चरण में बाकी 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र खोदा जाएगा। पेड़ों की कटाई भी चरणों में होगी। पहले पांच साल में 97,837 पेड़ काटे जाएंगे। अगले पांच साल में 59,712 पेड़ और हटेंगे। 60 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाले 67,414 पेड़ों को दूसरी जगह लगाने की बात कही गई है।
लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ता कह रहे हैं कि जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है। सदियों में बना प्राकृतिक तंत्र दोबारा खड़ा नहीं होता। कटे हुए साल जंगलों की भरपाई पौधे लगाकर नहीं हो सकती।
हाथियों के रास्ते में नई दीवार
यह इलाका लेमरू हाथी कॉरिडोर के बेहद करीब है। कोल ब्लॉक बफर जोन से 4 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है।
राज्य सरकार ने खुद माना है कि यहां हाथियों की आवाजाही होती है। इसके अलावा स्लॉथ भालू, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी और जंगली सूअर भी पाए जाते हैं।
FAC की बैठक के मिनट्स में साफ लिखा गया है कि खदान हाथियों की आवाजाही को प्रभावित कर सकती है। यानी सरकार को खतरे का अंदाजा है। फिर भी मंजूरी दी गई। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि कॉरिडोर टूटने का मतलब है मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ना। गांवों में हाथियों की घुसपैठ बढ़ सकती है। फसल नुकसान और जान का खतरा भी बढ़ेगा।
आदिवासियों का सवाल
हसदेव सिर्फ जंगल नहीं है। यह हजारों आदिवासी परिवारों की जिंदगी है। यहीं से पानी मिलता है। यहीं से रोज़गार मिलता है। यहीं संस्कृति और परंपरा जुड़ी है। नई खदान के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। कई गांवों में ग्राम सभाओं ने विरोध प्रस्ताव पास किए। सामाजिक संगठनों ने FAC को ज्ञापन भेजे। लेकिन मंजूरी फिर भी मिल गई।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी बात सुनी ही नहीं गई। जंगल बचाने के वादे किए गए। फिर एक-एक कर खदानों को मंजूरी दी जाती रही।
जंगल की भरपाई या सिर्फ कागजी इलाज?
सरकार ने कहा है कि क्षतिपूरक वनीकरण किया जाएगा। इसके लिए 3,233.3 हेक्टेयर खराब वन भूमि चिन्हित की गई है। 1,217 हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन भी तय की गई। लेकिन बड़ा सवाल वही है। क्या नया पौधा सदियों पुराने जंगल की जगह ले सकता है? क्या हाथियों का रास्ता दूसरी जगह बनाया जा सकता है?
क्या विस्थापन का दर्द कागजों में खत्म हो जाता है? हसदेव अरण्य मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह हसदेव नदी और बांगो बांध का जलग्रहण क्षेत्र है। इसे टाइगर कॉरिडोर के रूप में भी देखा जाता है।अब यहां तीसरी बड़ी कोयला खदान आने जा रही है। और सवाल फिर वही खड़ा है। देश को कोयला चाहिए या बचा हुआ जंगल?
FAQ
- हसदेव अरण्य में खनन क्यों किया जा रहा है?
राजस्थान के थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की जरूरत पूरी करने के लिए नई खदान का रास्ता खोला गया है। - कितने पेड़ काटे जाएंगे?
करीब 4.48 लाख पेड़ चरणबद्ध तरीके से काटे जाएंगे। - क्या यह क्षेत्र सुरक्षित है?
यह हाई कंजर्वेशन ज़ोन और हाथी कॉरिडोर के पास है, इसलिए पर्यावरण और वन्यजीवों पर असर की चिंता है। - स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भूमिका क्या रही?
आदिवासी और पर्यावरण समूह लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने खनन को मंजूरी दे दी।
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