घोटालों की गर्मी के बीच आहत हसदेव की कहानी
छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते घोटाले, ट्रांसफर और फाइलों की राजनीति सबसे ज्यादा चर्चा में रही। शराब घोटाले से जुड़े मैनपावर स्कैम और पीडब्ल्यूडी के टेंडर खेल ने सरकारी सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। उधर हसदेव में 7 लाख पेड़ काटने की तैयारी ने जंगल बनाम विकास की बहस फिर तेज कर दी। व्यापम की जगह नया चयन मंडल बना, लेकिन भर्तियां नियमों और फाइलों में उलझ गईं। वहीं एनसीआरबी रिपोर्ट ने बता दिया कि भ्रष्टाचार अब खबर नहीं, बल्कि सरकारी काम का एक हिस्सा बन चुका है।
ओवरटाइम का ओवरलोड
छत्तीसगढ़ का चर्चित शराब घोटाला अब सिर्फ शराब तक सीमित नहीं रहा। इस हफ्ते उसकी नई शाखा मैनपावर घोटाले के रूप में सामने आई। एसीबी-ईओडब्ल्यू ने इस मामले में सात गिरफ्तारियां कर दीं। मामला सुनने में जितना तकनीकी लगता है, अंदर से उतना ही देसी जुगाड़ वाला निकला। सरकारी कर्मचारियों को ऐसा ओवरटाइम दिया गया, मानो वे इंसान नहीं बल्कि 24 घंटे चलने वाली मशीन हों। 2019 से 2024 के बीच 100 करोड़ से ज्यादा का भुगतान सिर्फ ओवरटाइम के नाम पर हुआ। रिकॉर्ड ऐसे गायब हुए जैसे किसी ने सरकारी फाइलों पर व्हाइटनर फेर दिया हो। कहीं काम के घंटे नहीं, कहीं उपस्थिति नहीं, लेकिन पैसा लगातार बहता रहा। अब एजेंसियां कह रही हैं कि यह पूरा खेल 3200 करोड़ के शराब घोटाले से जुड़ा हुआ है। यानी शराब की बोतल से निकली धार सीधे मैनपावर एजेंसियों तक पहुंची। इस घोटाले का मास्टरमाइंड भोपाल का बिल्डर संजीव जैन निकला। इसने सात फर्जी कंपनी बनाकर यह घोटाला किया। सबके सामने हुआ यह घोटाला किसी को दिखा नहीं क्योंकि उनकी आंखों पर भी ओवरटाइम की हरी पट्टी बंधी हुई थी। इसे ही सिस्टम कहते हैं।
कानून कड़क, बाजार बेफिक्र
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट इस हफ्ते प्लास्टिक पर ऐसा बरसा कि सीधे मुख्य सचिव से जवाब मांग लिया। कोर्ट का सवाल सीधा था। जब राज्य में सिंगल यूज प्लास्टिक बैन है, तो बाजार में यह ऐसे क्यों बिक रहा है जैसे सरकारी योजना का मुफ्त सामान हो? राज्य में कानून इतना सख्त है कि पॉलीबैग से लेकर फ्लेक्स, बैनर तक प्रतिबंधित हैं। वहीं जमीनी हालात ऐसे हैं कि सब्जी वाले से लेकर ऑनलाइन फूड डिलीवरी तक हर कोई प्लास्टिक में लिपटा घूम रहा है। यानी कानून किताबों में है और प्लास्टिक बाजार में। पर्यावरण विशेषज्ञ नितिन सिंघवी की याचिका ने सरकार की मुश्किल बढ़ा दी है। आरोप है कि रिसाइक्लेबल और कम्पोस्टेबल के नाम पर वही पुराना प्लास्टिक नए मेकअप में बेचा जा रहा है। सरकारी विभागों की हालत ऐसी दिखी जैसे परीक्षा में छात्र से वही सवाल पूछ लिया गया हो जिसकी तैयारी नहीं की। विडंबना देखिए… शहरों में पर्यावरण बचाने के पोस्टर भी फ्लेक्स, बैनर पर ही छप रहे हैं। अब कोर्ट की सख्ती के बाद देखने वाली बात यह होगी कि प्लास्टिक सच में हटेगा या फिर सिर्फ फाइलों में नया एक्शन टेकन रिपोर्ट के रूप में जुड़ जाएगा।
कट पेस्ट टेंडर मॉडल
प्रदेश के पीडब्ल्यूडी विभाग ने इस हफ्ते टेंडर प्रक्रिया को नया आयाम दे दिया। यहां 50 लाख का काम उस फर्म को दे दिया गया, जिसने टेंडर में हिस्सा ही नहीं लिया था। यानी प्रतियोगिता किसी और ने लड़ी और ट्रॉफी किसी और को पकड़ा दी गई। वैसे ऐसे अजब-गजब काम सरकारी अफसरों की आदत में शुमार है। मामला एलईडी लाइट लगाने का था। नियमों के मुताबिक एल-1 फर्म को काम मिलना चाहिए था। शुरुआती आदेश भी उसी के नाम जारी हुआ। लेकिन बाद में फाइलों में ऐसा जादू चला कि नाम कट गया और उसकी जगह फॉर्च्यून अंश आ गया। मजेदार बात यह कि यह फर्म टेंडर प्रक्रिया में थी ही नहीं। सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि फाइलें बोलती हैं, लेकिन यहां तो फाइलों ने खुद नाम बदल लिया। नोटशीट में जिस तरह कटिंग-पेस्टिंग हुई उसे देखकर लगता है कि विभाग में टेंडर नहीं, एडिटिंग प्रतियोगिता चल रही थी। सबसे दिलचस्प हिस्सा यह रहा कि अधिकारियों ने बिना ज्यादा सवाल पूछे 50 लाख का भुगतान भी कर दिया। यानी सिस्टम ने पहले आंख बंद की, फिर चेक साइन किया और बाद में कहा-हमें जानकारी नहीं थी। घोटाला हुआ या नहीं हम इसकी बात नहीं कर रहे हैं। सोचों, अगर टेंडर प्रक्रिया इतनी लचीली है, तो अगली बार शायद कोई फर्म बिना अस्तित्व के भी काम हासिल कर सकती है।
व्यापम गया, नया मंडल आया
छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते भर्ती सिस्टम का नया अध्याय शुरु हुआ। व्यापम अब इतिहास बनने जा रहा है और उसकी जगह छत्तीसगढ़ कर्मचारी चयन मंडल लेगा। इसकी कमान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रेणु जी पिल्लै को दी गई है। सरकार का दावा है कि इससे भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी और तेज होगी। युवाओं ने भी हमेशा की तरह राहत की सांस ली। हालांकि छत्तीसगढ़ में भर्ती प्रक्रिया को लेकर जनता इतनी बार प्रयोग देख चुकी है कि अब हर नई व्यवस्था को पहले संदेह से देखा जाता है। दिलचस्प यह है कि एक ही अधिकारी को कई संस्थाओं की जिम्मेदारी देकर सरकार मल्टीटास्किंग मॉडल पर चलती दिख रही है। व्यापम का नाम बदलने से व्यवस्था कितनी बदलेगी, यह आने वाले समय में साफ होगा, क्योंकि भारत में कई बार सिस्टम वही रहता है, सिर्फ बोर्ड बदल जाता है।
हसदेव फिर सुर्ख़ियों में
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य एक बार फिर सुर्खियों में है। खबर आई कि केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मंजूरी देने की तैयारी है और इसके लिए करीब 7 लाख पेड़ काटे जा सकते हैं। एक बार फिर हसदेव में आरी की आवाज सुनाई देगी। आंदोलनकारी इसे अडानी के लिए जंगल की कुर्बानी बता रहे हैं। उनका कहना है कि राजस्थान की बिजली जरुरत को देखते हुए छत्तीसगढ़ के जंगल खत्म किए जा रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार और कंपनियों का तर्क विकास और ऊर्जा सुरक्षा है। हसदेव अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा। यह आदिवासी अस्तित्व, हाथी कॉरिडोर, जल स्रोत और कॉर्पोरेट राजनीति का मिश्रण बन चुका है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पहले भी लाखों पेड़ कट चुके हैं और अब बचा हुआ जंगल भी खतरे में है। विडंबना यह है कि गर्जी के दौर में भी कोयले की भूख कम नहीं हो रही। जंगल, जो बोल नहीं सकते आज सबसे बड़ी कीमत वही चुका रहे हैं और कल इंसान चुकाएंगे।
एमडी की विदाई पार्टी दो घंटे में खत्म
छत्तीसगढ़ के सहकारिता विभाग में इस हफ्ते ऐसा राजनीतिक, प्रशासनिक ट्विस्ट आया कि टीवी सीरियल के लेखक भी नोट्स लेने बैठ जाएं। अपेक्स बैंक के एमडी कमल नारायण कांडे को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों के बाद पद से हटाने का आदेश जारी हुआ। खबर बाहर आते ही विभाग में वर्षों से जमा असंतोष अचानक फूट पड़ा। जिनकी फाइलें कभी कांडे साहब के कमरे के बाहर घंटों लाइन में खड़ी रहती थीं, वे अब सिस्टम में न्याय जिंदा है वाला भाव चेहरे पर लेकर घूमते दिखे। बताया जाता है कि कुछ लोगों ने तो विदाई पार्टी की तैयारी भी शुरु कर दी थी, लेकिन छत्तीसगढ़ की नौकरशाही इतनी सीधी कहानी कब लिखती है? महज दो घंटे बाद नया आदेश आया और पूरा खेल पलट गया। कांडे की प्रतिनियुक्ति सेवा फिर बढ़ा दी गई। मतलब जो अफसर शाम तक पूर्व एमडी बन चुके थे, वे रात होते-होते फिर वर्तमान एमडी हो गए। फर्क सिर्फ इतना रहा कि मंत्री के ओएसडी पद से उनकी छुट्टी बरकरार रही। सरकारी गलियारों में अब चर्चा किसी जांच की नहीं, बल्कि कनेक्शन की ताकत की हो रही है। कहा जा रहा है कि राजनांदगांव वाला पुराना नेटवर्क और रिटायरमेंट में बचे दो महीने आखिरकार भारी पड़ गए। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ में ट्रांसफर और पोस्टिंग अब प्रशासनिक प्रक्रिया कम, राजनीतिक रोमांच का हिस्सा बन चुकी है।
भ्रष्टाचार की अमरबेल और फाइलों का जंगल
एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट ने इस हफ्ते वह सच फिर सामने रख दिया, जिसे हर नागरिक जानता है। वैसे हर सरकार भूल जाने का अभिनय करती है। भ्रष्टाचार अब अपराध नहीं है बल्कि ये एक सरकारी योजना बन चुका है। मध्यप्रदेश और राजस्थान भ्रष्टाचार के मामलों में देश के टॉप-10 राज्यों में शामिल हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में पिछले दो साल में इस तरह के मामलों में साढ़े तीन गुना बढ़ोतरी दर्ज हुई है। यानी भ्रष्टाचार अब इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि एक फलता फूलता प्रशासनिक उद्योग बन चुका है। कुल मिलकर केस दर्ज हो रहे हैं, जांच चल रही है, फाइलें घूम रही हैं… मगर विभागीय कार्रवाई लगभग गायब है। मध्यप्रदेश में सैकड़ों मामले लंबित हैं, लेकिन किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं। राजस्थान में हजारों जांचें धूल खा रही हैं। और छत्तीसगढ़ में तो 97 प्रतिशत मामले अब भी जांच के जंगल में रास्ता खोज रहे हैं। स्थिति यह है कि रिश्वत लेते पकड़ा गया अफसर पहले निलंबन से बचता है, फिर जांच से और अंत में रिटायरमेंट तक पहुंच जाता है। जनता शिकायत करती रह जाती है और फाइलें सरकारी अलमारी में आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर लेती हैं।
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