बीजेपी सरकार ने विधानसभा संकल्प को दिखाया ठेंगा, राजस्थान को नए कोल ब्लॉक की जरूरत ही नहीं
Raipur. छत्तीसगढ़ में एक और कोल ब्लॉक को खोलने की मंजूरी मिल गई है। हसदेव में खनन की स्वीकृति से विधानसभा संकल्प को ठेंगा दिखा दिया गया है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में 26 जुलाई 2022 को सर्व सम्मति से यह संकल्प प्रस्ताव पारित किया गया था कि हसदेव अरण्य के सभी कोल ब्लॉक को निरस्त किया जाए।
बीजेपी सरकार विधानसभा के उस संकल्प के विरोध में जाकर नए कोल ब्लॉक को मंजूरी दे रही है। हैरानी की बात यह है कि विपक्ष में रहते हुए बीजेपी हसदेव की कोयला खदानों का विरोध कर रही थी। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का कहना है कि सिर्फ निजी उद्योगपति अडानी के मुनाफे के लिए इस खदान को अनुमति जारी की जा रही है।
भूपेश सरकार ने किया था विरोध:
केंते एक्सटेंसन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण का भूपेश सरकार ने विरोध किया था। यहां तक कि वन स्वीकृति के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्यावरणीय जनसुनवाई निरस्त करते हुए परियोजना के भूमि अधिग्रहण के विरोध में कोयला मंत्रालय को आपत्ति भेजी थी। वर्तमान बीजेपी सरकार ने पिछली सरकार के फैसले को पलट दिया है।
राजस्थान को इतने कोयले की ज़रूरत नहीं :
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने राजस्थान की बिजली जरूरत के संशोधित आकंडे जारी किए हैं। जिसके अनुसार राजस्थान में वर्ष 2025- 2026 से 2035-2036 तक 16561 मेगावाट बिजली की जरूरत है जो पूर्व 20532 मेगावाट बताई गई थी। यहाँ तक कि कालीसिंध और छाबड़ा पॉवर प्लांट के विस्तार से राजस्थान में 830 मेगावाट बिजली अतिरिक्त रहेगी । इसके अतिरिक्त राजस्थान में 32000 मेगावाट की सोलर परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं जिससे कोयला आधारित बिजली की जरूरत ही नहीं रहेगी।
वर्तमान कोल ब्लॉक से ज़रूरत पूरी:
राजस्थान के वर्तमान और विस्तारित पॉवर प्लांटों को मात्र 21 मिलियन टन कोयले की जरूरत है जिसे हसदेव अरण्य की सिर्फ़ PEKB खदान से पूरा किया जा रहा है । राजस्थान को न तो परसा कोल ब्लॉक की जरूरत थी और केते एक्सटेंसन की । छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का कहना है कि यह खदानें सिर्फ अडानी की लूट के लिए खोली जा रही हैं। ताकि रिजेक्ट कोयले के नाम पर अडानी के पॉवर प्लांट तक मुफ्त का कोयला पहुंचता रहे।
7 लाख पेड़ कटेंगे:
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का कहना है कि हसदेव अरण्य में नए कोल ब्लॉक के लिए 7 लाख पेड़ो को काटने की केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अनुशंसा की है। मंत्रालय की सलाहकार समिति (AC) की 8 मई 2026 को हुई बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित और अडानी के एमडीओ वाले केते एक्सटेंसन कोल ब्लॉक वन भूमि डायवर्सन की स्टेज-I अनुमति जारी कर दी है। हसदेव बचाओ संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार का यह निर्णय न सिर्फ हसदेव बल्कि सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के लिए विनाशकारी कदम है।
पहले भी जताया था विरोध:
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने लिखित में सलाहकार समिति को इस परियोजना से होने वाले पर्यावरणीय विनाश की जानकारी दी थी। प्रभावित समुदाय की आपत्तियों और पर्यावरणीय चिंताओं को अब केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की निर्णय प्रक्रियाओं में संज्ञान में नहीं लिया जाता| संगठन का कहना है कि जिस मंत्रालय का काम है किसी भी परियोजना के पर्यावरणीय पहलुओं को समझना, जांचना और उसका विश्लेषण करके परियोजना की स्वीकृति पर निर्णय लेना है, वह केवल अडानी जैसे कॉर्पोरेट समूह को फायदा पहुँचाने का काम कर रहा है| सालों से चल रहे आदिवासियों के विरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। पहले ही हसदेव अरण्य में राजस्थान की दो खदाने परसा ईस्ट केते बासेन (PEKB) एवं परसा संचालित हैं जिनमे 10630 एकड़ जंगल, जमीन का विनाश कर लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं।
नहीं बचेगा हसदेव-बांगो जलाशय :
भारतीय वन्य जीव संस्थान ने हसदेव की जैव विविधता अध्ययन रिपोर्ट में लिखा है की खनन से हसदेव नदी और बांगो जलाशय का विनाश होगा । बांगो जलाशय छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जलाशय है जिससे लगभग 6 लाख हेक्टेयर जंगल में सिंचाई होती है। जंगल के काटने से मानव और हाथियों का संघर्ष इतना व्यापक होगा कि भविष्य में इसे संभाला नहीं जा सकेगा।
रामगढ़ पर संकट:
कार्यकर्ताओं का कहना है कि खदान की वन स्वीकृति देने के लिए वन विभाग और जिला प्रशासन ने लगातार ग़लत और झूठे दस्तावेज कंपनी के पक्ष में जमा किए है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के रामगढ़ पहाड़ जिसकी दूरी 9 किलोमीटर है उसे जानबूझकर11 किलोमीटर दिखाया गया। वर्तमान में खनन संचालित खदान के कारण रामगढ़ में बड़ी बड़ी दरारें आ चुकि हैं। इस खदान के खुलने से सम्पूर्ण रामगढ़ पहाड़ का विनाश होगा।
प्रस्तावित परियोजना का 98 प्रतिशन क्षेत्र घना वन है जिस पर आसपास के गाँव के हज़ारों परिवारों का निस्तार और लघु वनोपज का संग्रहण होता है। भारतीय वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार हसदेव में ग्रामीणों की आय का 70 प्रतिशत हिस्सा जंगलों से आता है। पूर्व में संचालित खदानों से पहले से ही जंगल में भारी कमी आ चुकी है यहँ तक कि आदिवासियों के देव स्थल का भी विनाश किया जा चुका है। वनाधिकार मान्यता कानून के तहत वन अधिकारों की प्रक्रिया भी पूर्ण नहीं की गई है ।
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