हसदेव कोल ब्लॉक से 9 लाख टन सालाना उत्पादन, 5 साल में 98 हजार पेड़ कटेंगे
छत्तीसगढ़ के जैव विविधता से समृद्ध हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक को केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है।
इस मंजूरी के साथ ही परियोजना में प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख (9 मिलियन) टन कोयला उत्पादन का मार्ग तैयार हो गया है। हालांकि इस फैसले को लेकर पर्यावरणविदों, आदिवासी समुदायों और विपक्ष ने गंभीर चिंता जताई है।
मंत्रालय ने 24 जून को पर्यावरणीय स्वीकृति जारी की, जो इससे पहले 9 जून को मिली सैद्धांतिक वन स्वीकृति के बाद दी गई है। कोयला मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने जनवरी 2025 में ही इस परियोजना को मंजूरी देने की सिफारिश की थी।
तीसरा बड़ा कोयला प्रोजेक्ट:
यह हसदेव-अरण्य क्षेत्र का तीसरा बड़ा कोयला प्रोजेक्ट है, जिसे मंजूरी मिली है। इससे पहले परसा और परसा ईस्ट-केते बसन (पीईकेबी) खदानें पहले से संचालित हैं। कभी इस पूरे क्षेत्र को जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के कारण खनन के लिए "नो-गो जोन" माना जाता था।
सूरजपुर जिले में करीब 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक का आवंटन वर्ष 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को किया गया था।
परियोजना का संचालन और विकास अडानी समूह करेगा। यहां से निकाले जाने वाले कोयले की आपूर्ति राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को की जाएगी।
हसदेव को माना जाता है मध्य भारत का ग्रीन लंग:
हसदेव-अरण्य को मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां लगभग 640 वनस्पति प्रजातियां और अनुसूची-1 के तहत संरक्षित 9 वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं।
यह क्षेत्र हाथियों का महत्वपूर्ण आवास है और अनुमानतः 40 से 50 हाथी नियमित रूप से इस वन क्षेत्र का उपयोग करते हैं। हसदेव नदी का जलग्रहण क्षेत्र भी यही है, जो आगे चलकर महानदी में मिलती है।
भारतीय वन अनुसंधान की रिपोर्ट:
भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की संयुक्त जैव विविधता अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया था कि यदि परियोजना को आगे बढ़ाया जाए तो कड़े पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण के साथ ही इसे लागू किया जाना चाहिए।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा। इसके तहत कुल 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। हालांकि पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। पहले पांच वर्षों में लगभग 98 हजार पेड़ काटे जाएंगे, जबकि शेष कटाई परियोजना की आवश्यकता के अनुसार आगे की जाएगी।
राज्य सरकार ने 60 सेंटीमीटर से कम घेराव वाले 67,414 पेड़ों को प्रतिरोपित करने और शेष पेड़ों की चरणबद्ध कटाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
4 गांव के लोग प्रभावित:
इस परियोजना से सूरजपुर जिले के केते, बसन, चकेरी और परोगिया गांवों के लोग प्रभावित होंगे। इन परिवारों का पुनर्वास राज्य सरकार की स्वीकृत पुनर्वास एवं राहत नीति के तहत किया जाएगा।
हसदेव-अरण्य में खनन का स्थानीय आदिवासी समुदाय और कई सामाजिक संगठन लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से जैव विविधता, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ेगा।
वहीं सरकार का तर्क है कि सभी आवश्यक पर्यावरणीय शर्तों और सुरक्षा उपायों का पालन करते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा। हसदेव-अरण्य में इस नई मंजूरी के बाद एक बार फिर विकास, ऊर्जा जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।
ये खबरें भी पढ़ें...
देश में 97 हजार हेक्टेयर जंगल खत्म, MP का 25 तो CG राजस्थान का 10% हिस्सा शामिल
हसदेव जंगल प्रोजेक्ट: छत्तीसगढ़ में महाविनाश का आगाज, जंगल उजाड़ने अडानी को बीजेपी सरकार की हां !
देश में 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी, छत्तीसगढ़ का हसदेव पहले नंबर पर
बृजमोहन का पुराना बयान वायरल, राज्य सरकार रद्द करे हसदेव कोल ब्लॉक की अनुमति