बृजमोहन का पुराना बयान वायरल, राज्य सरकार रद्द करे हसदेव कोल ब्लॉक की अनुमति
Arun Tiwari | Jun 16, 2026, 16:41 IST
हसदेव पर बृजमोहन का पुराना बयान वायरल 2026
छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य कोल ब्लॉक से जुड़ा बृजमोहन अग्रवाल का पुराना बयान वायरल हो गया है, जिसमें वे राज्य सरकार की सहमति के बिना खदान नहीं खोलने और परियोजना रद्द करने की बात कहते नजर आ रहे हैं। यह बयान फिर चर्चा में आ गया है।
छत्तीसगढ़ के वर्तमान सांसद और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का एक पुराना बयान वायरल हो रहा है। इस बयान ने राज्य सरकार को फिर संकट में डाल दिया है। यह बयान उस समय का है जब बीजेपी विपक्ष में थी और प्रदेश में भूपेश बघेल की सरकार थी।
उस वक्त भी हसदेव के कोल ब्लॉक की अनुमति का मुद्दा खड़ा हुआ था। बृजमोहन कह रहे हैं कि केंद्र सरकार भले ही अनुमति दे दे लेकिन राज्य सरकार की सहमति के बिना कोयले की खदान को नहीं खोला जा सकता।
वे यह भी कह रहे हैं कि इस कोल ब्लॉक का आवंटन रद्द किया जाना चाहिए। यह बयान इसलिए वायरल हुआ है क्योंकि अभी फिर उसी कोल ब्लॉक की अनुमति दी जा चुकी है। तो क्या अब बृजमोहन अपनी सरकार से यही बात कहेंगे या फिर सरकार उनकी यह बात मानेगी।
बृजमोहन अग्रवाल इस बयान में तत्कालीन भूपेश सरकार पर निशाना साध रहे हैं। वे कह रहे हैँ कि केंद्र सरकार भले ही अनुमति दे दे लेकिन राज्य सरकार की सहमति के बिना कोयलाा खदान नहीं खोदी जा सकती। छत्तीसगढ़ के आदिवासी बड़ा आंदोलन कर रहे हैं और यह आंदोलन पूरे देश में हो रहा है।
सीएम लोगों को गुमराह कर रहे हैं। क्या राज्य सरकार की अनुमति के बिना खदान चालू हो सकती है। क्या पेड़ कट सकते हैं, राज्य सरकार को अधिकार है कि वो इसको रोक सके। राज्य सरकार का एक ही मकसद है पैसा कमाना। और इस पैसा कमाने के लिए उसे हसदेव की मौत की चिंता नहीं है।
आदिवासियों के उजड़ने की चिंता नहीं है। चार लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे, उसकी चिंता नहीं है। हसदेव डेम से हो रही लाखों एकड़ सिंचाई भी समाप्त हो जाएगी। सरकार को आदिवासियों की चिंता करते हुए इसकी खुदाई, वृक्षों की कटाई और खदान की अनुमति निरस्त करनी चाहिए।
इस बयान के वायरल होने के बाद छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता और ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। आलोक शुक्ला ने यह बयान अपने एक्स पर पोस्ट किया है। आलोक शुक्ला का कहना है कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने सहमति दी है लेकिन जब तक राज्य सरकार सहमति नहीं देगी खदान नहीं खुल सकती।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को तत्काल बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेता की बात मानते हुए हसदेव की परसा और केंते एक्सटेंशन खदान की स्वीकृति निरस्त कर देनी चाहिए । ये बयान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार के दौरान दिया गया था। लेकिन ये सही है की राज्य सरकार की अनुमति बिना कोई खदान नहीं खुल सकती है क्योंकि अंतिम वन स्वीकृति और पर्यावरण स्वीकृति राज्य सरकार ही जारी करती है । इसलिए राज्य सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए वन भूमि के उपयोग की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। यह परियोजना राजस्थान सरकार को आवंटित की गई है और इसका खनन कार्य अडानी समूह द्वारा किया जाएगा।
मंत्रालय ने लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि को खनन के लिए डायवर्जन करने की अनुमति दी है। इस निर्णय के बाद हसदेव-अरण्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगल कटाई की आशंका बढ़ गई है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना के कारण लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई होगी। इनमें से लगभग 97,837 पेड़ पहले पांच वर्षों में ही काटे जाएंगे। पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों ने इस फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
वर्ष 2021 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद द्वारा किए गए जैव विविधता अध्ययन में हसदेव-अरण्य को अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र बताया गया था। अध्ययन में सिफारिश की गई थी कि पहले से संचालित परसा ईस्ट केंटे बासन खदान को छोड़कर इस क्षेत्र में किसी नए खनन कार्य की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यह क्षेत्र हाथियों के महत्वपूर्ण आवासों में से एक है और यहां खनन बढ़ने से मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि हो सकती है।
मंत्रालय द्वारा दी गई मंजूरी कुछ शर्तों के साथ प्रदान की गई है। खनन कार्य को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में लगभग 1,001.95 हेक्टेयर भूमि पर 15 वर्षों तक खनन किया जाएगा। दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन तभी शुरू होगा जब पहले चरण के दौरान पुनर्वनीकरण (Reforestation) और जैव विविधता संरक्षण से संबंधित निर्धारित शर्तों का पालन किया जाएगा।
दस्तावेजों के अनुसार खनन से प्राप्त कोयला राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को सप्लाई किया जाएगा। यह कोल ब्लॉक वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार को आवंटित किया गया था ताकि राज्य के बिजली उत्पादन संयंत्रों के लिए कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
परियोजना के तहत पेड़ों की कटाई के बदले 130.6 हेक्टेयर गैर-वन भूमि और 4450.326 हेक्टेयर क्षतिग्रस्त वन भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा। इसके अलावा राज्य वन विभाग को 60 सेंटीमीटर से कम परिधि वाले लगभग *67,414 पेड़ों को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं।
हसदेव-अरण्य छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला हुआ है और इसका क्षेत्रफल लगभग 1.75 लाख हेक्टेयर माना जाता है। यह क्षेत्र घने साल वनों, समृद्ध जैव विविधता और अनेक वन्यजीव प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां तेंदुए, भालू, हाथी सहित कई संरक्षित वन्यजीव पाए जाते हैं। यह क्षेत्र हसदेव नदी और बांगो बांध का महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र भी है तथा लेमरू हाथी अभयारण्य के निकट स्थित है।
पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के लिए कार्यरत संगठनों ने इस निर्णय का विरोध किया है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित कई समूहों का कहना है कि खनन से न केवल जंगल और वन्यजीव प्रभावित होंगे, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली पर भी गंभीर असर पड़ेगा।
हसदेव-अरण्य को लंबे समय से देश के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में कोयला खनन को मिली मंजूरी ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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उस वक्त भी हसदेव के कोल ब्लॉक की अनुमति का मुद्दा खड़ा हुआ था। बृजमोहन कह रहे हैं कि केंद्र सरकार भले ही अनुमति दे दे लेकिन राज्य सरकार की सहमति के बिना कोयले की खदान को नहीं खोला जा सकता।
वे यह भी कह रहे हैं कि इस कोल ब्लॉक का आवंटन रद्द किया जाना चाहिए। यह बयान इसलिए वायरल हुआ है क्योंकि अभी फिर उसी कोल ब्लॉक की अनुमति दी जा चुकी है। तो क्या अब बृजमोहन अपनी सरकार से यही बात कहेंगे या फिर सरकार उनकी यह बात मानेगी।
क्या कह रहे हैं बृजमोहन :
सीएम लोगों को गुमराह कर रहे हैं। क्या राज्य सरकार की अनुमति के बिना खदान चालू हो सकती है। क्या पेड़ कट सकते हैं, राज्य सरकार को अधिकार है कि वो इसको रोक सके। राज्य सरकार का एक ही मकसद है पैसा कमाना। और इस पैसा कमाने के लिए उसे हसदेव की मौत की चिंता नहीं है।
आदिवासियों के उजड़ने की चिंता नहीं है। चार लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे, उसकी चिंता नहीं है। हसदेव डेम से हो रही लाखों एकड़ सिंचाई भी समाप्त हो जाएगी। सरकार को आदिवासियों की चिंता करते हुए इसकी खुदाई, वृक्षों की कटाई और खदान की अनुमति निरस्त करनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का बयान :
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को तत्काल बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेता की बात मानते हुए हसदेव की परसा और केंते एक्सटेंशन खदान की स्वीकृति निरस्त कर देनी चाहिए । ये बयान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार के दौरान दिया गया था। लेकिन ये सही है की राज्य सरकार की अनुमति बिना कोई खदान नहीं खुल सकती है क्योंकि अंतिम वन स्वीकृति और पर्यावरण स्वीकृति राज्य सरकार ही जारी करती है । इसलिए राज्य सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
यह है मामला :
मंत्रालय ने लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि को खनन के लिए डायवर्जन करने की अनुमति दी है। इस निर्णय के बाद हसदेव-अरण्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगल कटाई की आशंका बढ़ गई है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना के कारण लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई होगी। इनमें से लगभग 97,837 पेड़ पहले पांच वर्षों में ही काटे जाएंगे। पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों ने इस फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
सेंसटिव ज़ोन घोषित है हसदेव:
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यह क्षेत्र हाथियों के महत्वपूर्ण आवासों में से एक है और यहां खनन बढ़ने से मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि हो सकती है।
इन शर्तों पर मंज़ूरी:
राजस्थान को सप्लाई होगा कोयला:
पेड़ कटाई के बदले नए पेड़:
लंग्स ज़ोन है हसदेव:
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का विरोध:
हसदेव-अरण्य को लंबे समय से देश के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में कोयला खनन को मिली मंजूरी ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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