एसडीएम ने दिखाया जनजाति आयोग की रिपोर्ट को ठेंगा, फर्जी ग्राम सभा को असली बताकर हसदेव पर चलवाई अडानी की आरी
News In Short
- हसदेव पर भारी पड़ रहे एसडीएम
- राज्य जनजाति आयोग ने माना फर्जी ग्रामसभा
- एसडीएम ने जांच कर बताया असली ग्रामसभा
- इसी ग्राम सभा के आधार पर हसदेव पर चली अडानी की आरी
News In Detail
Raipur : छत्तीसगढ़ का हसदेव जंगल एक बार फिर चर्चा में है। वैसे भी हसदेव देश विदेश की मीडिया की कवर स्टोरी बनता रहा है। फर्जी ग्राम सभा की सहमति से हसदेव के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का मामला फिर चर्चा में आ गया है। जिन पेड़ों पर परसा कोल ब्लॉक के लिए अडानी की कंपनी की आरी चली उनके लिए फर्जी ग्रामसभा की अनुमति ली गई। यह राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग की रिपोर्ट में आया।
आयोग ने सरगुजा कलेक्टर को चिट्ठी भेजकर कार्यवाही रोकने को कहा। कलेक्टर ने एसडीएम से जांच करवाई। एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट में फर्जी ग्राम सभा को असली बता दिया। एसडीएम ने यह पत्र हाल ही में जनजाति आयोग के सचिव को भेजा है। अब सवाल उठने लगा है कि क्या अब फिर पेड़ कटने की बारी आ गई है।
जनजाति आयोग पर भारी एसडीएम
छत्तीसगढ़ में खनिज संपदा भरपूर है और यहां पर इसी खनिज संपदा की लूट मची हुई है। आदिवासी कहते हैं कि सरकार अडानी के दबाव में काम कर रही सरकार लाखों पेड़ों की बलि देने से भी पीछे नहीं हट रही। अडानी कंपनी को परसा कोल ब्लॉक के लिए हसदेव के जंगल में पेड़ों की कटाई की इजाजत फर्जी ग्राम सभा की अनुमति के आधार पर दी गई। राज्य जनजाति आयोग ने अपनी जांच में माना है
कि ग्राम सभा ने इस खनन की मंजूरी नहीं दी लेकिन अधिकारियों ने अडानी कंपनी के लिए फर्जी मंजूरी कराई। आदिवासियों ने इसका विरोध किया तो उन पर पुलिसिया लाठी बरसी। द सूत्र के पास जनजाति आयोग की रिपोर्ट के वे पन्ने भी हैं जिनमें दिखाया गया है कि किस तरह ग्राम सभा की फर्जी मंजूरी ली गई।
राज्य जनजाति आयोग ने सरगुजा कलेक्टर को पत्र लिखकर कोल ब्लॉक के लिए पेड़ों की कटाई रोकने को कहा। आयोग ने कहा कि फर्जी ग्रामसभा की अनुमति के आधार पर यह कार्यवाही हो रही है जिसे तत्काल रोका जाना चाहिए। कलेक्टर ने सरगुजा एसडीएम को इस संबंध में जांच कर रिपोर्ट देने को कहा। हाल ही में एसडीएम ने कलेक्टर और जनजाति आयोग के सचिव को रिपोर्ट भेज दी।
यह है एसडीएम की रिपोर्ट
सरगुजा एसडीएम ने हाल ही में यह रिपोर्ट राज्य जनजाति आयोग के सचिव को भेजी है। इस रिपोर्ट की कॉपी द सूत्र के पास है। इस रिपोर्ट में एसडीएम ने फर्जी ग्राम सभाओं को असली बताया है। जनजाति आयोग ने हरिहरपुर, साल्ही,घाटबर्रा और फत्तेपुर में हुई ग्रामसभाओं को फर्जी माना है। यह वही ग्राम सभाएं हैं जिनके आधार पर परसा कोल ब्लॉक की अनुमति जारी की गई।
एसडीएम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हरिहरपुर के पंचायत सचिव छत्रपाल सिंह ने बताया कि 24 जनवरी 2018 को ग्रामसभा हुई जिसमें प्वाइंट नंबर 22 में वन भूमि के डायवर्सन की अनुमति दी गई। इसी तरह साल्ही में भी ग्राम सभा की सर्वसम्मति से मंजूरी दिखाई गई।
इसमें भी लिखा गया कि राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को कोयला खदान के लिए वन की जमीन के डायवर्सन की अनुमति दी जाती है। इसी तरह फत्तेपुर और घाट बर्रा की ग्रामसभाओं को भी असली बताया गया।
कोल ब्लॉक के लिए ली गई ग्रामसभा की फर्जी अनुमति
राजस्थान सरकार को बिजली देने के लिए यहां पर अडानी कंपनी को तीन कोल ब्लॉक आवंटित किए गए हैं। इनमें से दूसरे परसा कोल ब्लॉक के लिए पेडों की कटाई हुई। इन कोल ब्लॉक को पर्यावरण समेत अन्य स्वीकृतियां मिली हैं वे ग्राम सभा की मंजूरी के आधार पर दी गई हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है कि ग्राम सभा की मंजूरी ही पूरी तरह से फर्जी है। जनजाति आयोग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट है
कि अधिकारियों ने अडानी कंपनी के लिए ग्राम सभा की फर्जी अनुमति तैयार की। आयोग ने अपनी जांच में यह स्पष्ट तौर पर पाया है कि स्थानीय अधिकारियों ने ग्राम सभा के सदस्यों को इसकी अनुमति के लिए धमकाया और जब ये आदिवासी नहीं माने तो अधिकारियों ने फर्जी अनुमति तैयार कर ली।
इस तरह तैयार की गई फर्जी अनुमति
27 जनवरी 2018 की ग्राम सभा की कार्यवाही पंजी में प्रस्ताव क्रमांक 21 के बारे में बैठक में चर्चा हुई। यह चर्चा वन अधिकार कानूनों को लेकर थी। इस विषय पर बात कर ग्राम सभा समाप्त कर दी गई। इस पर ग्राम सभा प्रधान, सचिव और सरपंच ने हस्ताक्षर किए। लेकिन अधिकारियों ने इस पंजी में ही खेल कर दिया। उन्होंने इन हस्ताक्षरों के नीचे प्रस्ताव 22 जोड़कर परसा कोल ब्लॉक की अनापत्ति ले ली।
उसमें लिख दिया कि ग्राम सभा में यह प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित किया गया। जबकि ग्राम सभा में इस बात की चर्चा ही नहीं हुई। यहां पर अकेले सचिव के हस्ताक्षर करवा लिए गए। इस तरह इस फर्जी अनुमति से यह कोल ब्लॉक आवंटित कर दिया गया। जबकि नियमानुसार ग्राम सभा की अनुमति के बिना ये कोल ब्लॉक जारी नहीं किया जा सकता।
इसका दूसरा भाग बताते हैं। ग्राम सभा में उपस्थित गांव की सरपंच रनिया बाई ने भी आयोग को बयान दिया। रनिया बाई ने कहा कि जो ग्राम सभा हुई थी उसमें प्रस्ताव एक से 21 तक ही चर्चा की गई। इसमें परसा कोयला खदान की कोई बात ही नहीं की गई। मेरे घर पर रात के 8 बजे तहसीलदार,पटवारी,जनपद सीईओ और पुलिस अधिकारी समेत 7_8 लोग आए।
उन्होंने वहीं पर सचिव को बुलाकर प्रस्ताव 22 तैयार किया और सचिव के हस्ताक्षर करवाए। इन लोगों ने मुझे धमकाया और कहा कि साइन नहीं किया तो सरपंच पद से हटा देंगे,महिला पुलिस को बुलाकर तुम्हे पकड़कर ले जाएंग। इसके बाद भी मैने हस्ताक्षर नहीं किए। अगले दिन फिर मुझे और मेरे पति को रेस्ट हाउस बुलाकर धमकाया कि तुम्हारे पति को झूठे केस में अंदर कर देंगे यदि तुमने साइन नहीं किए तो। हमने फिर भी साइन नहीं किए और वहां से जैसे तैसे निकलकर घर आए।
अब आगे क्या
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, सर्व आदिवासी समाज और छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के सदस्यों ने मांग की है कि जनजाति आयोग की रिपोर्ट समेत सारे दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाए। परसा खदान समेत सभी कोल ब्लॉक के लिए हो रही पेड़ कटाई को तत्काल बंद कराया जाए। जिन अधिकारियों और अडानी कंपनी के कर्ताधर्ता की सांठगांठ से यह फर्जीवाड़ा हुआ है उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में लोगों की सांसों पर भी संकट आ जाएगा।
निष्कर्ष
आंदोलन के कार्यकर्ता कहते हैं कि यह बात साबित हो चुकी है कि इन कोल ब्लॉक की अनुमति ग्राम सभा ने नहीं दी और फर्जी अनुमति से ही इन खदानों को मंजूरी दी गई है। इसके बाद भी न तो सरकार सुन रही है और न ही राजभवन में सुनवाई हुई। वे कहते हैं कि उनकी आजीविका को छीना जा रहा है।
गाँव का विस्थापन हमारे अस्तित्व को ही ख़त्म कर रहा है। जंगलों का विनाश करना पूरे छत्तीसगढ़ के पर्यावरण का विनाश है। इससे जल संकट और मानव जीवन संबंधी सभी समस्याओं में भी वृद्धि हो रही है। इसलिए हसदेव क्षेत्र में जंगलों की कटाई और कोयला उत्खनन पर प्रतिबंध लगाने के निवेदन के साथ यह आंदोलन किया जा रहा है।
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