शराब फैक्ट्रियों पर हाईकोर्ट का शिकंजा, अब कोर्ट कमिश्नर बताएंगे नदियां साफ हैं या नहीं

VINAY VERMA | Jun 02, 2026, 21:48 IST
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी रिपोर्ट खारिज कर शराब फैक्ट्रियों द्वारा नदी प्रदूषण की जांच हेतु कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए हैं, जो 30 दिनों में सीलबंद जमीनी रिपोर्ट सौंपेंगे.

RAIPUR : छत्तीसगढ़ की नदियों में प्रदूषण के आरोपों को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने प्रदेश की शराब निर्माण इकाइयों की विस्तृत जांच कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि केवल विभागीय दावों के आधार पर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता। वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वतंत्र निरीक्षण जरूरी है।



30 दिन में मांगी गई सीलबंद रिपोर्ट

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने दो अधिवक्ताओं को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया है। उन्हें 30 दिनों के भीतर संयुक्त निरीक्षण कर सीलबंद रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।



नदियों का पानी मानक के अनुरूप-सरकार

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि अधिकारियों की टीम ने संबंधित क्षेत्रों का निरीक्षण किया है। जांच के दौरान शिवनाथ और खारून नदी के जल का परीक्षण भी किया गया। सरकार के अनुसार दोनों नदियों में ऑक्सीजन का स्तर निर्धारित मानकों के अनुरूप पाया गया। अधिकारियों ने अदालत को बताया कि जल गुणवत्ता संतोषजनक है।



रिपोर्ट के बाद पहुंचा मामला कोर्ट

यह पूरा मामला एक समाचार रिपोर्ट के बाद अदालत की निगरानी में आया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि शराब फैक्ट्रियों के कारण नदियां प्रदूषित हो रही हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया। अदालत ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव को देखते हुए विस्तृत जानकारी तलब की थी।



पर्यावरण मंडल ने भी पेश किया शपथ पत्र

छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के सचिव ने अदालत में शपथ पत्र दाखिल किया। संबंधित फैक्ट्री प्रबंधन की ओर से भी जवाब प्रस्तुत किया गया। शपथ पत्र में कहा गया कि निरीक्षण के दौरान प्रदूषण के आरोपों की पुष्टि नहीं हुई। दोनों नदियों की जल गुणवत्ता संतोषजनक पाई गई। पर्यावरणीय मानकों के पालन का भी दावा किया गया।



भाटिया डिस्टिलरीज ने आरोपों को बताया गलत

मामले में भाटिया डिस्टिलरीज ने भी अपना पक्ष रखा। कंपनी ने कहा कि समाचार रिपोर्ट में लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं। प्रबंधन के अनुसार संयंत्र 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' प्रणाली के तहत संचालित होता है। फैक्ट्री से किसी भी प्रकार का रासायनिक अपशिष्ट बाहर नहीं छोड़ा जाता। इसलिए नदी प्रदूषण के आरोप निराधार हैं।



वेलकम डिस्टिलरीज पर पहले हो चुकी कार्रवाई

सुनवाई के दौरान पर्यावरण संरक्षण मंडल ने एक अहम जानकारी भी दी। मंडल ने बताया कि वेलकम डिस्टिलरीज के खिलाफ पहले कार्रवाई की जा चुकी है। लगातार नियमों के उल्लंघन के कारण इकाई को बंद करने के आदेश दिए गए थे। साथ ही उस पर 54.60 लाख रुपए का पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क भी लगाया गया था।



निरीक्षण में मिली थीं गंभीर खामियां

मंडल के अनुसार हालिया निरीक्षण के दौरान कई अनियमितताएं सामने आई थीं। फैक्ट्री में ऑनलाइन प्रदूषण निगरानी प्रणाली बंद पाई गई। वायु प्रदूषण का स्तर भी निर्धारित सीमा से अधिक दर्ज किया गया था। इन तथ्यों को अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पर रखा गया।



कोर्ट कमिश्नर करेंगे जमीनी जांच

हाईकोर्ट ने अधिवक्ता वैभव शुक्ला और अपूर्व त्रिपाठी को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया है। दोनों अधिकारी पर्यावरण संरक्षण मंडल के प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त निरीक्षण करेंगे। तीनों डिस्टिलरी इकाइयों की मौके पर जांच होगी। अदालत ने फैक्ट्री प्रबंधन को जांच में पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया है।



रिपोर्ट से तय होगी आगे की दिशा

अब सभी की नजर कोर्ट कमिश्नरों की रिपोर्ट पर टिकी है। यदि रिपोर्ट में प्रदूषण की पुष्टि होती है तो संबंधित इकाइयों पर बड़ी कार्रवाई हो सकती है। वहीं यदि दावे सही पाए गए तो फैक्ट्रियों को राहत मिल सकती है। फिलहाल हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि पर्यावरण और नदियों की सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।




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