सदन में घिरे स्वास्थ्य मंत्री की घोषणा, 15 दिन बाद ही लौट आया मनचाही पोस्टिंग का सिस्टम
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य विभाग का चर्चित अटैचमेंट सिस्टम एक बार फिर सवालों में है। विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने पूरे प्रदेश में डी-अटैचमेंट की बड़ी घोषणा की थी। दावा किया गया था कि अब डॉक्टर, नर्स और कर्मचारी अपनी मूल पदस्थापना पर लौटेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि घोषणा के महज 15 दिन बाद ही विभाग में फिर से मनचाहे अटैचमेंट का खेल शुरू हो गया।
सदन में घिरे तो हुई थी बड़ी घोषणा:
यह पूरा मामला विधानसभा के बजट सत्र में उठा था। प्रबोध मिंज ने स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रभावशाली कर्मचारी मनचाही जगह पोस्टिंग करा लेते हैं और गांवों की जनता इलाज के लिए परेशान होती है। लंबी बहस के दौरान स्वास्थ्य मंत्री सवालों के घेरे में आ गए थे। इसके बाद उन्होंने पूरे प्रदेश में अटैचमेंट खत्म करने की घोषणा कर दी थी।
आदेश निकले, लेकिन कर्मचारी नहीं लौटे:
राजधानी रायपुर से लेकर दुर्ग, कवर्धा, बिलासपुर, जगदलपुर, कांकेर, गरियाबंद और धमतरी तक हालात लगभग एक जैसे बताए जा रहे हैं। कागजों में डी-अटैचमेंट हो गया, लेकिन कर्मचारी अब भी उसी जगह जमे हुए हैं जहां वे पहले अटैच थे।
रायपुर में सीएमएचओ ने 87 कर्मचारियों के डी-अटैचमेंट का आदेश जारी किया। इनमें डॉक्टर से लेकर चतुर्थ वर्ग कर्मचारी तक शामिल थे। लेकिन अधिकांश कर्मचारी अपने मूल पदस्थापना स्थल नहीं पहुंचे। वे पुराने दफ्तरों में ही ड्यूटी कर रहे हैं। वहीं की उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर हो रहे हैं और ऑनलाइन हाजिरी भी वहीं से लग रही है।
अंबिकापुर में नया तरीका:
अंबिकापुर में तो मामला और दिलचस्प बताया जा रहा है। यहां सीएमएचओ ने 16 कर्मचारियों को डी-अटैच करने का आदेश निकाला। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें फिर से अटैच कर दिया गया। वजह बताई गई कि मूल पदस्थापना पर भेजने से काम प्रभावित हो रहा है। यानी आदेश भी जारी हो रहा है और उसी आदेश का रास्ता भी निकाल लिया जा रहा है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कई जिलों में यही फॉर्मूला अपनाया जा रहा है।
गांवों में डॉक्टर नहीं, शहरों में भीड़:
स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से अटैचमेंट बड़ा मुद्दा रहा है। आरोप लगते रहे हैं कि पहुंच और राजनीतिक दबाव के जरिए कर्मचारी ग्रामीण अस्पतालों से शहरों में अटैच हो जाते हैं। इसका असर सीधे गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टरों और स्टाफ की कमी से जूझते रहते हैं। जबकि शहरों के बड़े अस्पतालों और कार्यालयों में जरूरत से ज्यादा कर्मचारी दिखाई देते हैं।
सचिव का पत्र, जिलों में कार्रवाई:
मंत्री की घोषणा के बाद स्वास्थ्य सचिव ने सभी जिलों के सीएमएचओ को पत्र जारी किया। निर्देश दिया गया कि जिला स्तर पर डी-अटैचमेंट के आदेश जारी किए जाएं और उसकी जानकारी मुख्यालय भेजी जाए। इसके बाद जिलों ने तेजी से आदेश जारी किए। कई जगह सूची भी जारी हुई। मुख्यालय को रिपोर्ट भी भेज दी गई। लेकिन जमीनी स्थिति अब भी अलग नजर आ रही है।
विशेष परिस्थिति बना नया रास्ता:
सरकार ने घोषणा के दौरान यह भी कहा था कि विशेष परिस्थिति में ही अटैचमेंट होगा और उसके लिए विभागीय अनुमति जरूरी होगी। अब यही विशेष परिस्थिति नया रास्ता बनती दिख रही है। कई जिलों में काम प्रभावित होने, स्टाफ की कमी और प्रशासनिक जरूरत का हवाला देकर पुराने अटैचमेंट फिर बहाल किए जा रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि अगर सभी जिलों में यही स्थिति है तो फिर डी-अटैचमेंट का फैसला सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह गया क्या?
विभागीय सिस्टम पर उठ रहे सवाल:
स्वास्थ्य विभाग के भीतर अब यह चर्चा तेज है कि क्या जिलों में जारी आदेश सिर्फ मुख्यालय को संतुष्ट करने के लिए निकाले गए थे। क्योंकि आदेश के बाद भी कर्मचारी वहीं जमे हैं जहां वे पहले से काम कर रहे थे। इस पूरे मामले ने सरकार की मंशा और विभागीय अमले की कार्यप्रणाली दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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