शादी करने से खत्म नहीं होता POCSO केस! छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने युवक को दिया झटका

Harrison Masih | Aug 18, 2026, 19:54 IST
POCSO केस पर हाईकोर्ट का फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने POCSO मामले में शादी के बाद भी आरोपित युवक को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपराध उस समय हुआ, जब शिकायतकर्ता नाबालिग थी, तो बाद में हुई शादी से POCSO का मामला खत्म नहीं होता।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग से संबंध और POCSO मामले में आरोपित युवक को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अपराध उस समय हुआ, जब शिकायतकर्ता नाबालिग थी, तो बाद में दोनों की शादी हो जाने और साथ रहने से कथित POCSO अपराध अपने आप खत्म नहीं हो जाता।



चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने आरोपित की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें FIR, चार्जशीट, संज्ञान आदेश और आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी।



2011 से संपर्क में होने का दावा

मामला जांजगीर-चांपा का है। नवल किशोर आदित्य के खिलाफ महिला थाने में 22 अप्रैल 2026 को मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता वर्ष 2011 से आरोपित के संपर्क में थी।



आरोप है कि युवक ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। शिकायतकर्ता के मुताबिक आरोपित बाद में परिवार की परिस्थितियों का हवाला देकर शादी को टालता रहा।



इसी बीच दोनों ने 20 अप्रैल 2026 को शादी कर ली और पति-पत्नी के रूप में साथ रहने लगे।



शादी के बाद शिकायतकर्ता ने बदला बयान

शादी के चार दिन बाद यानी 24 अप्रैल 2026 को शिकायतकर्ता का बयान न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया गया। इसमें उसने कहा कि दोनों के बीच लंबे समय से संबंध थे और शादी में देरी परिवार की परिस्थितियों के कारण हुई।



शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि उसके द्वारा की गई शिकायत गलतफहमी में हुई थी और अब वह आरोपित के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती।



हालांकि, इस बयान के बाद भी पुलिस ने मामले की जांच जारी रखी।



पुलिस ने दाखिल की चार्जशीट

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 16 जून 2026 को मामले में चार्जशीट पेश कर दी। इसके बाद 19 जून 2026 को विशेष POCSO अदालत ने चार्जशीट पर संज्ञान लिया।



इसके बाद आरोपित युवक ने हाई कोर्ट का रुख किया। उसकी ओर से FIR, चार्जशीट, संज्ञान आदेश और आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई।



आरोपित की ओर से क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में कहा गया कि दोनों लंबे समय से एक-दूसरे के संपर्क में थे और आखिरकार उन्होंने शादी भी कर ली है। ऐसे में शुरुआत से शादी करने का झूठा इरादा होने की बात नहीं कही जा सकती।



याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि शादी में देरी को अपने आप शादी का झूठा वादा नहीं माना जा सकता। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रमोद सूर्यभान पवार और नईम अहमद समेत अन्य फैसलों का हवाला दिया गया।



याचिकाकर्ता की ओर से शिकायतकर्ता के मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान का भी उल्लेख किया गया, जिसमें उसने शिकायत को गलतफहमी का परिणाम बताया था और कार्रवाई नहीं चाहने की बात कही थी।



राज्य ने POCSO कानून का दिया हवाला

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। राज्य ने कहा कि कथित संबंध उस समय शुरू हुए थे, जब शिकायतकर्ता नाबालिग थी।



सरकार की ओर से दलील दी गई कि बाद में हुई शादी, समझौता या दोनों का पति-पत्नी के रूप में साथ रहना कथित POCSO अपराध को खत्म नहीं कर सकता।



राज्य के अनुसार, अपराध के समय शिकायतकर्ता की उम्र और उस समय के घटनाक्रम को देखते हुए POCSO कानून की धाराएं लागू होती हैं या नहीं, इसका फैसला उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट में होना चाहिए।



हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया देखा जाए तो संज्ञेय अपराध बनता है। मामले की जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस चार्जशीट भी दाखिल कर चुकी है।



कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का यह तर्क कि संबंध सहमति से थे, शिकायत गलतफहमी में दर्ज हुई और बाद में दोनों ने शादी कर ली—ये सभी ऐसे तथ्य हैं, जिनका फैसला साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ट्रायल में किया जाना चाहिए।



कोर्ट ने यह भी माना कि मामले में शिकायतकर्ता के नाबालिग होने की अवधि से जुड़े आरोप हैं। इसलिए POCSO कानून के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल के दौरान किया जाना उचित होगा।



बाद की शादी से अपराध खत्म नहीं होता

हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बाद में हुई शादी और दोनों का साथ रहना मामले की परिस्थितियों में प्रासंगिक हो सकता है, लेकिन केवल इन आधारों पर कथित अपराध को शुरुआती स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता।



कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 528 BNSS के तहत याचिका पर सुनवाई करते समय हाई कोर्ट विवादित तथ्यों और साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन कर मिनी ट्रायल नहीं कर सकता।



याचिका खारिज

डिवीजन बेंच ने FIR, चार्जशीट और विशेष POCSO अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने आगे की आपराधिक कार्यवाही पर भी रोक लगाने से इनकार करते हुए नवल किशोर आदित्य की याचिका खारिज कर दी।



मामले में अब कथित अपराध के समय शिकायतकर्ता की उम्र, संबंधों की परिस्थितियों, शिकायत और बाद में दिए गए बयान समेत अन्य साक्ष्यों का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाएगा।



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