दबाव के आगे कभी नहीं झुकने वाले छत्तीसगढ़ के आईपीएस अजय यादव की कहानी

Harrison Masih | Jul 11, 2026, 15:22 IST
आईपीएस अजय यादव
छत्तीसगढ़ कैडर के 2004 बैच के आईपीएस अधिकारी अजय यादव अपनी सख्त लेकिन संतुलित कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। राष्ट्रपति वीरता पदक और राष्ट्रपति सराहनीय सेवा पदक से सम्मानित अजय यादव को हाल ही में राजनांदगांव रेंज का आईजी नियुक्त किया गया है।

छत्तीसगढ़ कैडर के 2004 बैच के आईपीएस अधिकारी अजय यादव उन अफसरों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान प्रचार से नहीं, बल्कि उनके काम से बनी है। शांत स्वभाव, सख्त कार्यशैली और अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ मजबूती से खड़े रहने की छवि ने उन्हें पुलिस महकमे में अलग पहचान दिलाई है। नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय तक नेतृत्व करने से लेकर बड़े शहरों की कानून-व्यवस्था संभालने तक, अजय यादव ने हर जिम्मेदारी को जमीनी पुलिसिंग के नजरिए से निभाया है। दिलचस्प बात यह है कि उनका चयन पहले इंडियन डिफेंस अकाउंट्स सर्विस (आईडीएएस) में हुआ था, लेकिन उनका लक्ष्य शुरू से भारतीय पुलिस सेवा था। इसी कारण उन्होंने दोबारा यूपीएससी की परीक्षा दी और आख़िरकार आईपीएस बनने का सपना पूरा किया। उनका मानना था कि समाज में सीधे बदलाव लाने का सबसे प्रभावी माध्यम पुलिस सेवा है। हाल ही में हुए प्रशासनिक फेरबदल में उन्हें राजनांदगांव रेंज का आईजी बनाया गया है।



बस्तर की धरती से शुरू हुआ सफर

अजय यादव का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ। उनके पिता कृषि विभाग में कार्यरत थे, जबकि माता गृहिणी हैं। परिवार में एक बहन वसुंधरा यादव शिक्षिका हैं और भाई व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उनकी स्कूली शिक्षा पूरी तरह सरकारी विद्यालयों में हुई। पहली और दूसरी कक्षा दोरनापाल में पढ़ने के बाद तीसरी से आठवीं तक की पढ़ाई बस्तर क्षेत्र में हुई। नौवीं और बारहवीं की शिक्षा उन्होंने बीजापुर से पूरी की। दसवीं में 81 प्रतिशत अंक हासिल किए, जबकि गणित विषय के साथ बारहवीं उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जगदलपुर से गणित विषय में बीएससी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान (एमएससी फिजिक्स) में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। विज्ञान विषय की पढ़ाई ने उनमें विश्लेषणात्मक सोच विकसित की, जिसका लाभ उन्हें आगे प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में भी मिला।



आईडीएएस से आईपीएस तक का संघर्ष

एमएससी पूरी करने के बाद अजय यादव बिलासपुर पहुंचे और संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी शुरू की। उन्होंने राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी दी। वर्ष 2000 में अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग राज्य बनने के बाद आयोजित पहली छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग परीक्षा में वे साक्षात्कार तक पहुंचे, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो पाया। यूपीएससी के पहले प्रयास में उन्होंने एंथ्रोपोलॉजी वैकल्पिक विषय के साथ परीक्षा दी और लगभग 300वीं रैंक प्राप्त कर इंडियन डिफेंस अकाउंट्स सर्विस (आईडीएएस) के लिए चयनित हुए। उन्होंने यह सेवा जॉइन भी की, लेकिन उनका लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ था। उन्होंने दोबारा तैयारी जारी रखी। तीसरे प्रयास में लोक प्रशासन और समाजशास्त्र को वैकल्पिक विषय बनाकर परीक्षा दी। इस बार उन्होंने 207वीं रैंक हासिल की और वर्ष 2004 में भारतीय पुलिस सेवा के लिए चयनित हुए। उन्हें अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ का कैडर मिला। संयोग यह भी रहा कि जिस वर्ष वे आईपीएस बने, उसी वर्ष राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी वे इंटरव्यू तक पहुंचे।



आईपीएस अजय यादव


प्रशिक्षु आईपीएस से जमीनी पुलिसिंग

6 सितंबर 2004 को अजय यादव ने भारतीय पुलिस सेवा जॉइन की। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वर्ष 2006 में प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी के रूप में बिलासपुर जिले के बिल्हा थाने का प्रभार संभाला। तीन महीने तक थाना प्रभारी के रूप में काम करने का अनुभव उनके पूरे करियर की मजबूत नींव बना। इसके बाद वे रायगढ़ जिले में एसडीओपी धर्मजयगढ़ बने और फिर दंतेवाड़ा में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (नक्सल ऑपरेशन) की जिम्मेदारी संभाली। यहीं से उनकी पहचान एक ऐसे अधिकारी के रूप में बनने लगी, जो जंगल आधारित ऑपरेशन और नक्सल रणनीति को गहराई से समझते हैं।



नक्सल मोर्चे पर बनाई पहचान

अजय यादव का पहला जिला पुलिस अधीक्षक के रूप में नारायणपुर रहा। उस समय यह इलाका नक्सली गतिविधियों का बड़ा केंद्र माना जाता था। उनके नेतृत्व में कई सफल अभियान चलाए गए, जिनमें सुरक्षा बलों ने आठ नक्सलियों को मार गिराया। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई एक महत्वपूर्ण मुठभेड़ में तीन नक्सली मारे गए और हथियार बरामद हुए। इस ऑपरेशन में उनकी भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रपति वीरता पदक से सम्मानित किया गया। उसी वर्ष नारायणपुर में विधानसभा चुनाव बिना किसी बड़े हिंसक घटनाक्रम के संपन्न कराना भी उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है। इसके बाद वे कांकेर के पुलिस अधीक्षक बने। उनके कार्यकाल में 15 नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव भी कांकेर में शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुए और पहली बार पुनर्मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसी दौरान बीएसएफ के 27 नए कैंप और पांच बटालियन मुख्यालय स्थापित करने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



सात जिलों की कमान

नक्सल क्षेत्र में सफलता के बाद अजय यादव को लगातार महत्वपूर्ण जिलों की जिम्मेदारी मिलती गई। वे बिलासपुर, जगदलपुर, जांजगीर, दुर्ग और रायपुर जैसे बड़े जिलों के पुलिस अधीक्षक तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे। जगदलपुर में उनके कार्यकाल के दौरान झीरम घाटी क्षेत्र में दो नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। इसी दौरान पुलिस और आम जनता के बीच संवाद बढ़ाने के उद्देश्य से आमचो बस्तर, आमचो पुलिस अभियान भी शुरू किया गया, जिसे बाद में व्यापक सराहना मिली। अपने पूरे करियर में वे नारायणपुर, कांकेर, बस्तर, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, दुर्ग और रायपुर सहित सात जिलों के पुलिस प्रमुख रह चुके हैं।



आईजी से लेकर इंटेलिजेंस तक

जिलों में लंबे अनुभव के बाद अजय यादव को पुलिस मुख्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं। वे सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) रहे। इसके बाद रायपुर रेंज और बिलासपुर रेंज के आईजी भी बने। रायपुर रेंज के आईजी रहते हुए उन्होंने इंटेलिजेंस विंग की भी कमान संभाली। सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और खुफिया तंत्र। तीनों क्षेत्रों में उनकी कार्यशैली की अलग पहचान बनी। हाल ही में हुए प्रशासनिक फेरबदल में सरकार ने उन्हें राज्य पुलिस अकादमी चंद्रखुरी के निदेशक से ट्रांसफर करके राजनांदगांव रेंज का आईजी बनाया है। अजय यादव की सबसे बड़ी पहचान यह मानी जाती है कि वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं। कई ऐसे अवसर आए जब किसी थानेदार या अधिकारी पर तत्काल कार्रवाई का दबाव था, लेकिन उन्होंने तथ्यों की जांच और निष्पक्ष निर्णय को प्राथमिकता दी। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पदस्थ रहने के दौरान तो उन्होंने पर्याप्त संसाधनों और मूलभूत सुविधाओं के बिना जवानों को जंगल में भेजने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि किसी भी ऑपरेशन की सफलता से पहले जवानों की सुरक्षा सर्वोपरि है।



प्रचार से दूर

अजय यादव उन अधिकारियों में शामिल हैं जो प्रचार से दूर रहकर काम करना पसंद करते हैं। करीब दो दशक लंबे पुलिस करियर में अजय यादव ने नक्सल ऑपरेशन, कानून-व्यवस्था, इंटेलिजेंस और फील्ड पुलिसिंग जैसे लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में काम किया है। उन्हें राष्ट्रपति वीरता पदक और राष्ट्रपति सराहनीय सेवा पदक से सम्मानित किया जा चुका है। अजय यादव का करियर इस बात का उदाहरण है कि एक अधिकारी की पहचान केवल पदों से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में लिए गए फैसलों, टीम के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और सिद्धांतों पर अडिग रहने की क्षमता से बनती है। छत्तीसगढ़ पुलिस में उनका नाम आज भी ऐसे अधिकारी के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने लो-प्रोफाइल रहते हुए अपने काम से अलग पहचान बनाई।



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