IPS रतन लाल डांगी मामले में नई जांच की तैयारी, हाईकोर्ट ने गृह सचिव और पुलिस मुख्यालय से मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि महिला की शिकायत पर हुई प्रारंभिक जांच में लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया प्रमाणित पाए गए हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आरोप अंतिम रूप से साबित हो गए हैं। अभी मामले में आगे विभागीय जांच और संबंधित प्रक्रिया बाकी है।
मामला इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि याचिकाकर्ता ने पहले जांच करने वाले अधिकारियों को लेकर आपत्ति जताई थी। महिला का कहना है कि आरोपी अधिकारी और जांच अधिकारियों के विभागीय पदक्रम को देखते हुए निष्पक्ष जांच को लेकर उसके मन में आशंका बनी हुई थी।
महिला ने क्यों उठाए पुरानी जांच पर सवाल
याचिकाकर्ता की तरफ से हाई कोर्ट को बताया गया कि मामले की शुरुआती जांच तत्कालीन आईजी आनंद छाबड़ा और तत्कालीन डीआईजी मिलना कुर्रे को दी गई थी। महिला ने इन अधिकारियों की जांच पर भरोसा नहीं जताया।
उसकी ओर से तर्क दिया गया कि पुलिस विभाग में वरिष्ठता और पदक्रम का सीधा असर जांच की स्वतंत्रता पर पड़ सकता है। इसी आधार पर महिला ने हाई कोर्ट से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शिकायत किसी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी से जुड़ी हो तो जांच व्यवस्था कैसी होनी चाहिए। क्या विभाग के भीतर की जांच पर शिकायतकर्ता पूरी तरह भरोसा कर सकता है। इसी मुद्दे को लेकर मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा।
प्रारंभिक जांच में क्या सामने आया
सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग की तरफ से अहम जानकारी दी गई। कोर्ट को बताया गया कि महिला की शिकायत पर हुई प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथमदृष्टया सही पाए गए हैं। इसके बाद पुलिस मुख्यालय ने आगे की विभागीय जांच के लिए नई व्यवस्था बनाने का फैसला किया। इस संबंध में गृह विभाग को प्रस्ताव भेजा गया है।
अब इसी प्रस्ताव पर गृह विभाग की कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हाई कोर्ट ने भी गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से जवाब मांगा है। इससे साफ है कि अदालत अब यह जानना चाहती है कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए हैं।
दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम प्रस्तावित
पुलिस मुख्यालय की ओर से नई जांच के लिए दो वरिष्ठ अधिकारियों के नाम प्रस्तावित किए गए हैं। प्रस्ताव के अनुसार आईपीएस दीपांशु काबरा को जांच अधिकारी बनाया जा सकता है।
वहीं आईपीएस प्रशांत कुमार अग्रवाल को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी बनाए जाने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मामले की आगे की जांच को पुराने अधिकारियों से अलग रखना है।
बताया गया है कि सितंबर में ही इससे संबंधित प्रस्ताव गृह विभाग को भेज दिया गया था। अब गृह विभाग की मंजूरी और आगे की कार्रवाई का इंतजार है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
हाई कोर्ट ने फिलहाल मामले में गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय को अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने दोनों से जवाब मांगा है ताकि यह साफ हो सके कि नई जांच को लेकर अब तक क्या निर्णय लिया गया है।
यह पहली बार नहीं है जब हाई कोर्ट ने इस मामले में जवाब मांगा हो। इससे पहले अगस्त में भी गृह सचिव और पुलिस मुख्यालय को नोटिस जारी किया गया था।
अब अगली सुनवाई में सरकार और पुलिस विभाग की ओर से दाखिल जवाब महत्वपूर्ण होगा। उसी से यह पता चलेगा कि नई जांच कब और किस व्यवस्था के तहत शुरू होगी।
पूरे मामले की बहस क्या है
यह मामला सिर्फ एक महिला की शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। अब बहस पुलिस विभाग के भीतर होने वाली जांच की विश्वसनीयता पर भी आ गई है।
जब आरोप किसी वरिष्ठ अधिकारी पर हों तो जांच कौन करे। जांच अधिकारी की वरिष्ठता क्या हो। शिकायतकर्ता को जांच प्रक्रिया पर कितना भरोसा होना चाहिए। ये सभी सवाल इस मामले के साथ सामने आए हैं।
दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि किसी अधिकारी के खिलाफ लगे आरोपों को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले पूरी प्रक्रिया पूरी हो। प्रारंभिक जांच और अंतिम विभागीय निष्कर्ष में अंतर होता है।
फिलहाल पुलिस विभाग ने कोर्ट को बताया है कि प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथमदृष्टया प्रमाणित पाए गए हैं। आगे की जांच के लिए नए अधिकारियों के नाम प्रस्तावित किए गए हैं। अब गेंद गृह विभाग के पाले में है।
हाई कोर्ट में अगली सुनवाई के दौरान सरकार और पुलिस मुख्यालयका जवाब इस मामले की आगे की दिशा तय कर सकता है। नई जांच शुरू होती है या प्रक्रिया में कोई और बदलाव होता है, इसका फैसला आने वाले चरण में साफ होगा।