बजट में डेढ़ करोड़ रुपए का प्रावधान, अब वर्दी भत्ता नहीं दे रहा वित्त विभाग
समझें क्या है पूरा मामला
- बजट में 1.50 करोड़ रुपए का प्रावधान
- 8 हजार रुपए वर्दी भत्ता देने का प्रस्ताव
- असहमति का कारण नहीं बता रहा वित्त विभाग
- पुलिस और जेल कर्मियों के लिए अलग मापदंड
लंबे इंतजार के बाद फिर निराशा
लंबे समय से पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तरह वर्दी भत्ता मांग रहे जेल प्रहरियों के हाथ फिर निराशा लगी है। हालांकि सरकार ने इसे गुजरे बजट सत्र में शामिल किया था। डेढ़ करोड़ रुपए के प्रावधान के बाद अधिकारियों ने कर्मचारियों की बधाइयां भी स्वीकार कीं। लेकिन जब फाइल वित्त विभाग पहुंची तो प्रस्ताव पर रोक लगा दी गई। वित्त विभाग जेल प्रशासन को इसका कारण भी नहीं बता रहा है। जेल प्रहरियों में नाराजगी है, जबकि प्रशासन वर्दी व्यवस्था संबंधी आदेश जारी कर चुका है। सवाल उठ रहा है कि जब मंजूरी नहीं देनी थी तो बजट में प्रावधान क्यों किया गया?
अभी क्या है वर्दी व्यवस्था
वर्तमान व्यवस्था के तहत विभाग कर्मचारियों को कपड़ा, जूते, मोजे, बेल्ट और कैप उपलब्ध कराता है। वर्दी की सिलाई का खर्च प्रहरियों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है। हालांकि पिछले दो वर्षों से यह व्यवस्था भी पूरी तरह प्रभावित है। कई कर्मचारियों को नई वर्दी नहीं मिली है। वे पुरानी वर्दी में ही ड्यूटी कर रहे हैं। जिनकी वर्दी खराब हो गई है, उन्हें खुद पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
फिर भी नहीं मिली स्वीकृति
इस अव्यवस्था से नाराज जेल प्रहरियों ने अपनी मांग को लगातार उठाया। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में 1.50 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। इसका उद्देश्य प्रहरियों, मुख्य प्रहरियों और प्रमुख मुख्य प्रहरियों को वर्दी किट भत्ता देना था। पुलिस विभाग की तर्ज पर प्रत्येक पात्र कर्मचारी को प्रतिवर्ष 8 हजार रुपए नगद वर्दी भत्ता देने का प्रस्ताव तैयार किया गया। लेकिन बजट पारित होने के बाद भी योजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली।
उम्मीदें जगाईं, फिर झटका दे दिया
लंबे समय से जेल प्रहरी पुलिस और अर्धसैनिक बलों जैसी सुविधा की मांग कर रहे थे। बजट में राशि का प्रावधान होने के बाद उन्हें लगा कि वर्षों पुरानी मांग पूरी हो जाएगी। विभागीय स्तर पर भी सकारात्मक संकेत दिए गए। कई जगह कर्मचारियों ने अधिकारियों को बधाई तक दी। लेकिन अब पूरा मामला उल्टा पड़ गया है।
जेल मुख्यालय ने भेजा था प्रस्ताव
जेल मुख्यालय ने शासन को प्रस्ताव भेजकर वर्दी किट भत्ता स्वीकृत करने का अनुरोध किया था। तर्क दिया गया था कि पुलिस विभाग में आरक्षक और प्रधान आरक्षक को यह सुविधा पहले से मिल रही है। ऐसे में जेल प्रहरियों को इससे वंचित रखना उचित नहीं होगा। लेकिन वित्त विभाग इस तर्क से सहमत नहीं हुआ।
वित्त विभाग ने कहा- नहीं देंगे
जारी आदेश में स्पष्ट कर दिया गया है कि वित्त विभाग ने प्रस्ताव पर असहमति व्यक्त की है। यह निर्णय विभागीय फाइल के आधार पर लिया गया। हैरानी की बात यह है कि असहमति का कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है। इससे कर्मचारियों में असंतोष और बढ़ गया है।
बड़ा सवाल, आखिर आपत्ति क्या है?
यदि योजना अनुपयुक्त थी तो बजट में राशि क्यों रखी गई? यदि बजट में राशि रखी गई थी तो अंतिम स्वीकृति क्यों नहीं दी गई? यदि पुलिस कर्मियों को यह सुविधा मिल सकती है, तो जेल प्रहरियों को क्यों नहीं? इन सवालों का जवाब न जेल विभाग दे रहा है और न ही वित्त विभाग।
कर्मचारियों में बढ़ रहा असंतोष
प्रस्ताव खारिज होने के बाद जेल विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों में नाराजगी है। उनका कहना है कि सरकार ने पहले सकारात्मक संकेत दिए। बजट में राशि भी रखी। फिर अंतिम समय में कदम पीछे खींच लिए। इससे कर्मचारियों का भरोसा प्रभावित हुआ है।
आदेश जारी, लेकिन वादा अधूरा
जेल प्रशासन वर्दी व्यवस्था से जुड़े आदेश जारी कर चुका है। यानी शासन भी वर्दी की जरूरत को स्वीकार कर रहा है। इसके बावजूद नगद वर्दी भत्ते पर ब्रेक लगा दिया गया है। इससे साफ है कि मामला सिर्फ सुविधा का नहीं, बल्कि वित्तीय और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का भी है।
ये खबरें भी पढ़ें...
90 दिन में चार्जशीट नहीं तो सस्पेंशन समाप्त! छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
सब्सिडी के बाद भी महंगा खरीदा जेल प्रशासन ने राशन, सरकार को करोड़ों का नुकसान
भारतमाला जांच की आंच धमतरी तक! ठेकेदार दीपेश गांधी के घर पहुंची ED-EOW