पुलिस के पास थी महेंद्र कर्मा की हत्या की जानकारी, महीने भर पहले मिल गया था झीरम प्लान
झीरम कांड के सुलगते सवाल ठंडे नहीं पड़ रहे हैं। हम आपको झीरम का वो सच बता रहे हैं जो आपको झकझोर देगा। द सूत्र के पास वे गोपनीय दस्तावेज़ हैं जो हैरान करने वाले हैं। पुलिस को झीरम कांड के सवा महीने पहले पता चल गया था कि नक्सलियों ने कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा की हत्या की तैयारी की है।
इसके लिए नक्सलियों ने एक अलग से फोर्स बनाई जो आधुनिक हथियारों से लैस थी और नक्सली बहुत बड़ी वारदात करने वाले हैं। पुलिस की जानकारी के बाद भी झीरम कांड कैसे हो गया यह बड़ा सवाल है। पुलिस की लापरवाही और अनदेखी ने कांग्रेस नेताओं की पूरी पीढ़ी को नक्सलियों के हवाले कर खत्म करवा दिया।
क्या लिखा है पुलिस के गोपनीय दस्तावेज में :
इंटेलीजेंस की जिम्मेदारी संभाल रहे आईपीएस दिपांशु काबरा ने 17 अप्रैल 2013 को पुलिस मुख्यालय को सूत्र प्रतिवेदन भेजा था। इसमें सर्वथा गोपनीय भी लिखा हुआ था। इस प्रतिवेदन में लिखा गया था कि छत्तीसगढ़ पुलिस के सूत्रों से आसूचना प्राप्त हुई है कि वीवीआईपी 2013 के दौरान माओवादियों द्वारा कांग्रेस के पूर्व विधायक एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा दंतेवाड़ा एवं कांग्रेस नेता राजकुमार नामदेव (दंतेवाड़ा) को मारने के लिए एक एक्शन टीम गठित की गई है।
जिसमें माओवादी मिलिशिया कम्पनी नम्बर 02 का प्लाटून कमेटी सदस्य राकेश को बनाया गया है। साथ में भैरमगढ़ प्लाटून, गंगालूर प्लाटून तथा मंगाली एलओएस से एक-एक सदस्य को इस एक्शन टीम में शामिल किया गया है। एक्शन टीम प्रभारी के पास 9 एमएम पिस्टल एवं सदस्यों को रिवाल्वर उपलब्ध कराई गई है।
अतः उनके सुरक्षा में तैनात अधिकारी एवं कर्मचारियों को विशेष सतर्कता बरतने हेतु निर्देशित किया जाकर उनके सुरक्षा मापदंड के अनुरूप आवश्यक सुरक्षा अमला बनाये रखना सुनिश्चित करें। इस पत्र की प्रतिलिपि एडीजी इंटेलीजेंस,एडीजी नक्सल अभियान, आईजी बस्तर, एसपी दंतेवाड़ा, एआईजी गुप्त वार्ता को भेजी गई थी।
नक्सलियों की गतिविधि की पूरी जानकारी :
पुलिस के पास वे सारे इनपुट थे जो यह इशारा कर रहे थे कि आने वाले दिनों में कुछ बड़ा होने वाला है। 25 मई को झीरम कांड हुआ लेकिन उससे कुछ दिन पहले भी उस जगह पर नक्सलियों की आवाजाही जारी थी। पुलिस के मुखबिरों ने बताया था कि कौन कौन कहां आ जा रहा है।
इतनी पुख्ता जानकारी होने के बाद भी झीरम कांड का हो जाना पुलिस की लापरवाही और अनदेखी का नतीजा है। यदि ये जानकारी थी कि महेंद्र कर्मा की हत्या का पूरा प्लान नक्सलियों ने तैयार कर रखा है तो फिर उस वारदात को रोका क्यों नहीं जा सका। पुलिस ने उस रास्ते से क्यों परिवर्तन यात्रा को निकलने दिया।
झीरम पर सुलगते सवाल :
झीरम कांड की जानकारी होने के बाद भी कांग्रेस नेताओं के काफिले को ROP क्यों नहीं दी गई।
महेंद्र कर्मा को निशाना बनाए जाने की खुफिया सूचना के बावजूद उन्हें उसी इलाके में जाने से क्यों नहीं रोका गया।
इतने बड़े हमले के बाद सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी तय करते हुए किसी पुलिसकर्मी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
जिन 10 लोगों को सजा हुई, उनके पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क और प्रमुख षड्यंत्रकारियों तक जांच क्यों नहीं पहुँची। अदालत के फैसले में 28 अन्य आरोपियों को भी वांछित बताया गया है।
मौत के 13 साल बाद भी जिंदा झीरम कांड :
झीरम सिर्फ एक नक्सली हमला नहीं था। यह छत्तीसगढ़ के राजनीतिक नेतृत्व पर हुआ ऐसा हमला था, जिसने राज्य की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी एक हमले में खत्म हो गई। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में 25 मई 2013 की तारीख शायद ही कभी भुलाई जा सकेगी।
बस्तर की झीरम घाटी में उस दिन सिर्फ गोलियां नहीं चली थीं, बल्कि प्रदेश की एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी को खत्म कर दिया गया था। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया। देखते ही देखते सड़क पर लाशें बिछ गईं और छत्तीसगढ़ ने अपने कई बड़े नेताओं को खो दिया।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता मारे गए। विद्याचरण शुक्ल गंभीर रूप से घायल हुए थे और इलाज के दौरान 11 जून 2013 को उनका निधन हुआ।
इसके अलावा कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा समेत कई कार्यकर्ता और नेताओं के सुरक्षा में तैनात जवान भी इस हमले में मारे गए। 13 साल बाद झीरम का फैसला आया। एनआईए की विशेष अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी माना और उनको मौत की सजा सुनाई। इस फैसले के बाद भी कई सवाल ऐसे हैं जो सुलग रहे हैं।
भूपेश ने उठाए गंभीर सवाल :
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि झीरम घटना की जांच NIA ने सही से नहीं की। दरभा थाने में जो FIR लिखी गई, जो धाराएं लगी और जिन लोगों के नाम का उल्लेख था उनसे पूछताछ नहीं हुई। भूपेश ने कहा कि NIA ने झीरम घाटी में जो लोग घटनास्थल पर थे, उन सब से भी पूछताछ नहीं की।
ये षड्यंत्र किसने किया, उसमें उन्होंने एक कदम भी नहीं रखा। हमने जांच को राज्य सरकार को सौंपने की बात कही और सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के पक्ष में फैसला आया लेकिन विष्णुदेव की सरकार में ना एसआईटी गठन हुई, ना जांच के आदेश दिए गए। बीजेपी लगातार इसे दबाने का काम कर रही है।
बघेल की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि झीरम को केवल नक्सली हमला मानकर जांच पूरी कर देना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक यह पता लगना चाहिए कि हमले के पीछे कोई साजिश थी या नहीं और अगर थी तो उसके सूत्रधार कौन थे। बघेल ने केंद्र सरकार पर भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार को जांच की जिम्मेदारी देने से इनकार किया गया। यही बात अब कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का आधार बन रही है।
कांग्रेस का कहना है कि झीरम में उसके नेताओं की हत्या हुई थी, इसलिए परिवारों को सिर्फ यह जानना नहीं है कि हमला किसने किया, बल्कि यह भी जानना है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी। भूपेश ने इसे अधूरा न्याय बताते हुए कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री, तत्कालीन डीजीपी और तत्कालीन मुख्य सचिव से पूछताछ क्यों नहीं की गई।
सीएम का जवाब :
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल पर पलटवार किया है। सीएम ने कहा कि जब बघेल खुद पांच साल तक प्रदेश की सत्ता में थे, तब उन्होंने इस मामले में क्या कदम उठाए। साय का यह हमला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। बीजेपी अब झीरम की जांच पर कांग्रेस के सवाल का जवाब देने के बजाय कांग्रेस से उसके शासनकाल का हिसाब मांग रही है।
यानी बहस अब सिर्फ NIA की जांच तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी जुड़ गया है कि जिसके पास सत्ता थी, उसने क्या किया। सीएम ने कहा कि वह हिड़मा, जिसने सैकड़ों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारा, ऐसे कुख्यात नक्सली को अपना आदर्श मानने वाले और नक्सलवाद के समर्थन में बात करने वाले लोग ही दिमागी नक्सली हैं। माओवादियों को आदर्श मानने वाली ऐसी सोच की छत्तीसगढ़ में कोई जगह नहीं है।
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