मंत्रियों पर भारी पड़ी अफसरी, छत्तीसगढ़ विधानसभा में हो रही माननीयों की किरकिरी
RAIPUR : छत्तीसगढ़ विधानसभा में मंत्रियों की भारी किरकिरी हो रही है। यह किरकिरी तब बढ़ जाती है जब विधानसभा का सत्र होता है। यानी मंत्रियों पर अफसरी भारी पड़ रही है। अब फिर मानसून सत्र आने वाला है जिससे मंत्रियों की पल्स तेज चलने लगी है। मंत्री नए हैं और विपक्ष पुराना जिससे उसके सवालों की धार काट पाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे में मंत्रियों के गलत जवाब उनको कटघरे में खड़ा कर देते हैं। इसका तोड़ निकालने के लिए मंत्रियों ने नई जुगत लगाई है। वे जिलों के संगठन मंत्री और कार्यकर्ताओं से अपने विभाग की योजनाओं की फील्ड रिपोर्ट ले रहे हैं। इतना ही नहीं मंत्री खुद भी जिलों में जाकर योजनाओं की स्थिति देख रहे हैं ताकि अफसरों के कागजी जवाब के कारण उनको बगलें न झांकना पड़े।
अफसरों की फाइलों से बाहर निकले मंत्री :
छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार में ढाई साल बाद एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। अब तक विभागीय फाइलों और अफसरों की ब्रीफिंग पर निर्भर रहने वाले मंत्री अचानक मैदान में सक्रिय नजर आने लगे हैं। मंत्री अपने-अपने प्रभार वाले जिलों में पहुंच रहे हैं, बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं, सरकार की योजनाओं का जमीनी फीडबैक ले रहे हैं और विभागों की वास्तविक स्थिति समझने की कोशिश कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में इस बदलाव को केवल प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा मानसून सत्र से पहले की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
विपक्ष के सवालों पर घिर रहे मंत्री :
पिछले ढाई सालों में विधानसभा के कई सत्रों के दौरान सरकार के मंत्रियों को विपक्ष के तीखे सवालों के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा। विपक्ष ने कई बार आरोप लगाया कि मंत्री सदन में अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए जवाब पढ़ते हैं, जबकि जमीनी हालात उनसे बिल्कुल अलग होते हैं। कई मामलों में सूचना के अधिकार से सामने आई जानकारियों और विधानसभा में दिए गए सरकारी जवाबों के बीच अंतर भी उजागर हुआ। इससे सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठे और विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका मिला। कई बार स्पीकर को बीच में बोलना पड़ा है।
विभाग से परिचित नहीं मंत्री :
राजनीतिक हलकों में चर्चा रही कि कई मंत्री अपने विभागों की वास्तविक स्थिति से पूरी तरह परिचित नहीं। उनकी जानकारी का मुख्य स्रोत विभागीय अधिकारी ही रहे। ऐसे में जब विपक्ष ने योजनाओं की प्रगति, बजट खर्च, अधूरे कामों या स्थानीय समस्याओं पर तथ्यात्मक सवाल पूछे तो कई मंत्री असहज दिखाई दिए। कुछ मामलों में जवाब अधूरे रहे तो कुछ में बाद में तथ्य अलग निकलने से सरकार को सफाई देनी पड़ी।
इसी बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का हालिया रायपुर दौरा सत्ता और संगठन दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था। मानसून सत्र से ठीक पहले संगठन महामंत्री अजय जामवाल, पवन साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह समेत बीजेपी और सरकार के वरिष्ठ नेताओं के साथ लंबी बैठकों के बाद मुख्यमंत्री निवास में मंत्रियों की विशेष बैठक हुई। इसमें संसदीय कार्यशैली,सदन में जवाब देने की तैयारी और विभागीय जानकारी पर मजबूत पकड़ रखने के गुर सिखाए गए।
मंत्री पर भारी अफसरी :
सूत्रों का कहना है कि मंत्रियों को साफ संदेश दिया गया कि केवल अधिकारियों की नोटशीट या फाइलों के भरोसे विधानसभा नहीं चल सकती। उन्हें अपने विभागों की योजनाओं, उपलब्धियों और कमियों की जानकारी रखनी होगी। इसके लिए जमीनी दौरे बढ़ाने, लाभार्थियों से मिलने और संगठन के माध्यम से वास्तविक फीडबैक लेने की सलाह दी गई। यह भी कहा गया कि अपनी खाल बचाने के लिए अफसर स्थिति के उलट अच्छे जवाब ही तैयार करते हैं जिससे मंत्री घिर जाते हैं।
यही वजह है कि अब कई मंत्री बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। इन बैठकों में केवल राजनीतिक चर्चा नहीं हो रही बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन, अधिकारियों की कार्यशैली, अधूरे विकास कार्यों और जनता की नाराजगी जैसे मुद्दों पर भी खुलकर बातचीत हो रही है। संगठन के कार्यकर्ता मंत्रियों को उन क्षेत्रों की जानकारी दे रहे हैं जहां सरकारी दावे और जमीनी हकीकत में अंतर है।
रिपोर्ट कार्ड गड़बड़ तो आउट :
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव दोहरे उद्देश्य को साधने की कोशिश है। एक ओर सरकार विधानसभा के मानसून सत्र में विपक्ष के हमलों का प्रभावी जवाब देना चाहती है, वहीं दूसरी ओर संगठन और सरकार के बीच समन्वय को भी मजबूत किया जा रहा है।बीजेपी की कार्यशैली में संगठन को हमेशा सबसे मजबूत कड़ी माना जाता रहा है और अब मंत्री उसी नेटवर्क के जरिए अपने विभागों का "ग्राउंड ऑडिट" कर रहे हैं।
मंत्रियों को यह भी कह दिया गया है कि यदि उनकी परफॉर्मेंस ठीक नहीं रही तो वे मंत्रिमंडल से भी जा सकते हैं और टिकट से भी। कांग्रेस नेता कहते हैं कि यदि मंत्री सरकार बनने के शुरुआती दिनों से ही मैदान में रहते और केवल अफसरों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहते तो आज ऐसी स्थिति नहीं बनती।
FAQ
- छत्तीसगढ़ के मंत्री अब फील्ड रिपोर्ट क्यों ले रहे हैं?
उत्तर: विधानसभा सत्र में विपक्ष के सवालों में मंत्री बार-बार घिर जाते थे। इसी वजह से अब वे जमीनी हकीकत जानने जिलों में जा रहे हैं। - छत्तीसगढ़ के मंत्रियों को क्या चेतावनी दी गई है?
उत्तर: सूत्रों के मुताबिक अगर मंत्रियों की परफॉर्मेंस ठीक नहीं रही तो वे मंत्रिमंडल से हटाए जा सकते हैं। उनका टिकट भी कट सकता है। - मुख्यमंत्री निवास में हुई बैठक में क्या हुआ?
उत्तर: इस बैठक में मंत्रियों को संसदीय कार्यशैली और सदन में जवाब देने की तैयारी सिखाई गई। विभागीय जानकारी पर मजबूत पकड़ बनाने की सलाह दी गई।
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