छत्तीसगढ़ मंत्रालय में IAS अधिकारियों के फोन कटौती का फैसला, BSNL को झटका, रेलटेल को हरी झंडी
Raipur. छत्तीसगढ़ मंत्रालय में सालों से फैले लैंडलाइन कनेक्शनों के मकड़जाल पर आखिरकार सरकार ने सख्ती दिखा दी है। अफसरों की सुविधा के नाम पर बढ़ते फोन कनेक्शन और उनसे जुड़ा भारी-भरकम बिल अब सरकार को अखरने लगा था। यही वजह है कि अब विशेष सचिव और उप सचिव स्तर के कई आईएएस अधिकारियों से लैंडलाइन फोन वापस लिए जा रहे हैं। सरकार इसे खर्च में कटौती और सिस्टम को व्यवस्थित करने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।
सूत्रों के मुताबिक, मंत्रालय में एक ही अधिकारी के पास एक से अधिक लैंडलाइन कनेक्शन होना आम बात हो गई थी। इन कनेक्शनों का वास्तविक उपयोग कितना हो रहा है, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं था, लेकिन हर साल लाखों रूपए का बिल सरकारी खजाने पर बोझ जरूर डाल रहा था। इसी को देखते हुए सरकार ने बड़ा निर्णय लेते हुए BSNL के 143 फोन कनेक्शन सरेंडर कर दिए हैं।
पुराना विवाद, बढ़ता बिल और अब कार्रवाई
मंत्रालय में BSNL के कनेक्शन को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। कई बार ऐसा हुआ कि मासिक बिलों का भुगतान समय पर नहीं हो पाया, जिसके चलते कनेक्शन तक काट दिए गए। बाद में अधिकारियों और बीएसएनएल के बीच बातचीत हुई और यह तय हुआ कि भुगतान साल में एक बार किया जाएगा।
लेकिन यह व्यवस्था भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाई। सालाना भुगतान के चलते एकमुश्त करीब 25 लाख रूपए का बिल सामने आने लगा। इस भारी खर्च ने सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया। मामले की जांच कराई गई, जिसमें सामने आया कि कई कनेक्शन अनावश्यक रूप से चल रहे हैं। इसके बाद नई नीति बनाते हुए बड़े स्तर पर कटौती का फैसला लिया गया।
अफसरों पर सख्त गाइडलाइन
नई व्यवस्था के तहत अब विशेष सचिव स्तर के अधिकारियों को एक से अधिक लैंडलाइन कनेक्शन रखने की अनुमति नहीं होगी। जरूरत पड़ने पर उन्हें इंटरकॉम सुविधा दी जाएगी, ताकि आंतरिक संवाद प्रभावित न हो। उप सचिव स्तर पर भी इसी तरह की सख्ती लागू की जा रही है।सरकार का मानना है कि मोबाइल और डिजिटल कम्युनिकेशन के इस दौर में अनावश्यक लैंडलाइन रखना फिजूलखर्ची है, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
नीचे के स्तर को मिला कनेक्शन
जहां ऊपर के स्तर पर कटौती हो रही है, वहीं सरकार ने निचले स्तर के अधिकारियों को मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाया है। 102 नए अवर सचिव और अनुभाग अधिकारियों को टेलीफोन कनेक्शन अलॉट किए गए हैं। इसका मकसद साफ है नीतिगत फैसलों और जमीनी अमले के बीच सीधा संवाद स्थापित करना। अब तक संचार की कमी के कारण कई मामलों में कामकाज धीमा पड़ जाता था। नई व्यवस्था से उम्मीद है कि फाइलों की गति बढ़ेगी और निर्णय प्रक्रिया तेज होगी।
रेलटेल अंदर
सिर्फ लैंडलाइन ही नहीं, मंत्रालय की इंटरनेट व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव किया गया है। अब तक लीज लाइन और नेटवर्क कनेक्शन के लिए (CHiPS) के साथ अनुबंध था, लेकिन बार-बार नेटवर्क गड़बड़ी और धीमी सर्विस को लेकर अधिकारियों में नाराजगी थी। शिकायतें यह भी थीं कि खराबी आने के बाद सुधार में काफी समय लग जाता था, जिससे काम प्रभावित होता था।
इसी के चलते सरकार ने चिप्स के साथ अनुबंध समाप्त कर दिया है और रेलटेल के साथ 5 साल का नया करार किया है। इस नई व्यवस्था के तहत मंत्रालय में हाई-स्पीड इंटरनेट और बेहतर वाई-फाई सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही नेटवर्क की मेंटेनेंस और सर्विस की जिम्मेदारी भी रेलटेल के पास होगी।
अब हिसाब देना होगा
सरकार के इस फैसले को प्रशासनिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ खर्च पर लगाम लगाने की कोशिश है, तो दूसरी तरफ सिस्टम को अधिक जवाबदेह बनाने की पहल भी। मंत्रालय में अब स्पष्ट संकेत है कि सुविधा के नाम पर फिजूलखर्ची नहीं चलेगी। हर संसाधन की उपयोगिता और लागत का आकलन किया जाएगा।
आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह की समीक्षा और कार्रवाई देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर, लैंडलाइन से शुरू हुआ यह बदलाव अब पूरे प्रशासनिक ढांचे में कंट्रोल और कनेक्टिविटी का नया संतुलन बनाने की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है।
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