मुंगेली हत्या कांड : आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, याचिका की खारिज
NEWS IN SHORT
- सुप्रीम कोर्ट ने मुंगेली के हत्या आरोपी की SLP खारिज की।
- बिलासपुर हाई कोर्ट का जमानत न देने का फैसला बरकरार रहेगा।
- खेत में जबरन फसल कटाई के विवाद में हुई थी हत्या।
- आरोपी विमल कुमार सप्रे 25 दिसंबर 2025 से जेल में है।
- शीर्ष अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए राहत नहीं दी।
NEWS IN DETAIL
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले से जुड़े एक हत्याकांडऔर मारपीट के मामले में आरोपी विमल कुमार सप्रे की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि वे छत्तीसगढ़ (बिलासपुर) हाई कोर्ट के फैसले में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। इसके साथ ही आरोपी की नियमित जमानत पाने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
क्या है पूरा मामला?
घटना 11 दिसंबर 2025 की है। मुंगेली के नेवासपुर स्थित एक खेत में जबरन फसल काटने को लेकर दो पक्षों में विवाद हुआ था। शिकायतकर्ता प्रफुल्ला सोनकर ने दर्ज मामले में बताया था कि जब वे अपने परिवार (भाइयों, माता-पिता और दादा जनक सोनकर) के साथ आरोपियों को रोकने पहुंचे, तो विमल कुमार सप्रे, झम्मन सप्रे, दूजराम और द्वारिका ने मिलकर उन पर लाठियों और कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में गंभीर रूप से घायल दादा जनकराम सोनकर की इलाज के दौरान अस्पताल में मौत हो गई, जिसके बाद पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया।
आरोपी और राज्य सरकार की दलीलें
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील और राज्य शासन के वकील के बीच तीखी बहस हुई:
याचिकाकर्ता (आरोपी) का पक्ष : वकील ने दलील दी कि विमल सप्रे पर केवल लाठी से वार करने का आरोप है, जबकि मृतक की चोटें किसी नुकीली वस्तु से आई थीं। इसके अलावा, मामले के अन्य सह-आरोपियों (रूप नारायण, प्रणय, हीरौंडी बाई और एक नाबालिग) को पहले ही जमानत मिल चुकी है। आरोपी 25 दिसंबर 2025 से जेल में है और उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।
राज्य शासन का विरोध : सरकारी वकील ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि एफआईआर और धारा 161 के बयानों में विमल सप्रे का नाम मुख्य रूप से शामिल है। वारदात में उसकी सक्रिय भूमिका थी और उससे लाठी भी बरामद की गई है। जिन अन्य आरोपियों को जमानत मिली है, उनका नाम एफआईआर में नहीं था, इसलिए विमल का मामला उनसे पूरी तरह अलग है।
हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट से भी झटका
इससे पहले, बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की सिंगल बेंच ने अपराध की गंभीरता और आरोपी की सक्रिय भूमिका को देखते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी मामले के तथ्यों और अपराध की प्रकृति को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट के फैसले को यथावत रखा और याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
निष्कर्ष
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख यह साफ करता है कि गंभीर अपराधों, विशेषकर हत्या जैसे मामलों में आरोपियों की सक्रिय भूमिका होने पर तकनीकी दलीलों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। निचली अदालतों के विवेकपूर्ण फैसलों और अपराध की क्रूरता को शीर्ष अदालत ने सर्वोपरि माना है।
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