नकटी लैंड रिकॉर्ड में रमन सिंह के OSD के परिवार का नाम, खुलासे से मचा हड़कंप

The Sootr | Jul 14, 2026, 15:02 IST
नकटी जमीन विवाद 2026
रायपुर के नकटी गांव में प्रस्तावित विधायक आवासीय कॉलोनी को लेकर नया विवाद सामने आया है। राजस्व दस्तावेजों में रमन सिंह के ओएसडी वीके सिसोदिया के परिवार का नाम भी सामने आया है।

राजधानी रायपुर से लगे नकटी गांव में प्रस्तावित विधायक आवासीय कॉलोनी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राजस्व अभिलेखों में सामने आई जानकारी ने इस परियोजना से जुड़ी खरीद-बिक्री की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।



रिकॉर्ड में दर्ज एक भूमि का संबंध विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के ओएसडी वीके सिसोदिया के परिवार से जुड़ा है।



अब मुख्य सवाल यह उठ रहा है कि विधायक आवासीय कॉलोनी के लिए नकटी गांव का चयन कब हुआ, और क्या इस परियोजना की जानकारी सार्वजनिक होने से पहले कुछ लोगों तक इसकी आहट पहुंच गई थी?



25 करोड़ की अनुमानित कीमत

राजस्व विभाग के दस्तावेजों के अनुसार ग्राम नकटी, तहसील रायपुर के खाता क्रमांक 00077 में दर्ज 1.0520 हेक्टेयर यानी करीब 2.60 एकड़ भूमि के रिकॉर्ड में "अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत शौर्य सिंह सिसोदिया" का नाम दर्ज है। शौर्य सिंह सिसोदिया, वीके सिसोदिया के पुत्र बताए गए हैं।



यह भूमि खसरा नंबर 656/1, 656/2, 657/1, 657/2, 658, 659/1, 661 और 662 में दर्ज है। स्थानीय बाजार के मौजूदा अनुमान के मुताबिक इसकी कीमत करीब 25 करोड़ रूपए आंकी जा रही है।





जमीन के रिकॉर्ड ने बढ़ाए सवाल

सरकार ने नकटी गांव को नई विधायक आवासीय कॉलोनी के लिए चयनित किया है। दूसरी ओर उसी क्षेत्र में ओएसडी के परिवार से जुड़ी भूमि का रिकॉर्ड सामने आने के बाद टाइमिंग को लेकर सवाल उठने लगे हैं।



चर्चा का केंद्र यह है कि विधायक कॉलोनी की योजना और संबंधित भूमि से जुड़ी प्रक्रियाएं किस क्रम में आगे बढ़ीं। क्या जमीन की खरीद या उससे जुड़ी प्रविष्टियां परियोजना की सार्वजनिक घोषणा से पहले हुई थीं या बाद में?





2022 और 2025 की प्रविष्टियां चर्चा में

राजस्व रिकॉर्ड में वर्ष 2022 और 2025 की अलग-अलग प्रविष्टियां दर्ज होने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि भूमि से संबंधित प्रक्रियाएं चरणबद्ध तरीके से पूरी हुईं।



हालांकि अभी तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि



  • भूमि का मूल हस्तांतरण कब हुआ?
  • अधिकृत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था कब बनी?
  • नामांतरण की प्रक्रिया कब पूरी हुई?
  • विधायक कॉलोनी के लिए नकटी का चयन किस तारीख को हुआ?
  • इन्हीं सवालों के जवाब इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकते हैं।
  • अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत का क्या मतलब?

दस्तावेजों में "अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत" शब्द दर्ज हैं। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि यह व्यवस्था किस कानूनी आधार पर बनी है।



क्या यह डेवलपमेंट एग्रीमेंट है? पावर ऑफ अटॉर्नी है? अथवा कोई अन्य अधिकृत प्रतिनिधित्व व्यवस्था है?



इस संबंध में भी अभी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है।





रमन सिंह ने क्या कहा?

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि विधायक आवासीय कॉलोनी का प्रस्ताव 15 से 20 वर्ष पुराना है और विस्थापन के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था।



हालांकि उनके इस बयान के बाद एक और सवाल सामने आया है। यदि परियोजना वास्तव में 15-20 वर्ष पुरानी है, तो उस दौरान लंबे समय तक प्रदेश में उनकी ही सरकार थी। ऐसे में परियोजना की आधिकारिक फाइल, प्रारंभिक प्रस्ताव और नकटी के चयन की पूरी समय-रेखा सार्वजनिक करने की मांग तेज हो गई है।



सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र

मामले में नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया जा रहा है। उस निर्णय में अदालत ने कहा था कि सांसद, विधायक, न्यायाधीश, आईएएस, आईपीएस और पत्रकारों जैसे प्रभावशाली वर्गों को सरकारी भूमि आवंटन में विशेष श्रेणी बनाकर प्राथमिकता देना समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।



हालांकि यह फैसला सीधे नकटी परियोजना पर लागू नहीं होता, लेकिन सरकारी संसाधनों और भूमि आवंटन में पारदर्शिता के मानकों को लेकर बहस को बल जरूर देता है।



land debate


अब क्या मांग उठ रही है?

इस पूरे विवाद के बीच पारदर्शिता की मांग तेज हो गई है। विभिन्न पक्ष चाहते हैं कि सरकार विधायक आवासीय कॉलोनी परियोजना की पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक करे।



इन सवालों के जवाब मांगे जा रहे हैं:

  • विधायक कॉलोनी का पहला प्रस्ताव कब तैयार हुआ?
  • नकटी गांव का चयन पहली बार कब किया गया?
  • विभागीय और प्रशासनिक स्वीकृतियां कब मिलीं?
  • संबंधित भूमि की खरीद और नामांतरण की प्रक्रिया कब हुई?
  • क्या किसी स्तर पर हितों के टकराव (Conflict of Interest) की समीक्षा की गई?

फिलहाल मामला दस्तावेजों और टाइमलाइन को लेकर उठे सवालों के केंद्र में है। सरकार की ओर से यदि पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाती है तो इससे विवाद की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।



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