रामगढ़ के बाद नंदराज पर संकट की कहानी,दोनों में सूत्रधार अडानी,आदिवासियों के चेहरे पर गुस्सा आंखों में पानी
क्योंकि लोहा और कोयला खदानों की एमडीओ अडानी कंपनी ही है। 8 साल पहले लोहा निकलाने के लिए जिस खदान का आवंटन किया था उसके खिलाफ आदिवासियों ने हल्ला बोल दिया था। विरोध इतना ज्यादा था कि तत्काल उस खनन पर रोक लगा दी गई थी। अब एक बार फिर वही हालात बन रहे हैं। आदिवासियों का कहना है कि आवंटित खदान पर फिर खनन की गतिविधि शुरु हो गई है। दर्जनों गांवों के आदिवासी अब इकट्ठा होने लगे हैं। नंदराज पर्वत आदिवासियों की आस्था का केंद्र है और उसी के वजूद पर संकट है।
नंदराज पर्वत पर खनन के खिलाफ फिर आंदोलन की तैयारी
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित बैलाडीला के नंदराज पर्वत पर खनन को लेकर विवाद एक बार फिर गहराने लगा है। दंतेवाड़ा जिले में डिपॉजिट-13 खदान और आसपास के क्षेत्र में प्रस्तावित गतिविधियों को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदाय ने विरोध तेज करने की तैयारी शुरू कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि नंदराज पर्वत उनके लिए केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है।
ऐसे में पहाड़ पर खनन और पेड़ों की कटाई से उनकी आस्था तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका है। क्षेत्र के 50 से अधिक गांवों के ग्रामीण आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। वहीं संयुक्त पंचायत जन संघर्ष समिति की बैठक में 18 गांवों के प्रतिनिधियों ने आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ने का निर्णय लिया है।
खनन और पेड़ों की कटाई पर विरोध
ग्रामीणों के बीच नाराजगी की एक प्रमुख वजह डिपॉजिट-13 क्षेत्र में लौह अयस्क से जुड़ी गतिविधियों और पेड़ों की प्रस्तावित कटाई की जानकारी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन परियोजना को आगे बढ़ाने की तैयारियों से नंदराज पर्वत और आसपास के जंगलों पर दबाव बढ़ सकता है। कुछ रिपोर्टों में खदान तक पहुंच मार्ग बनाने के लिए करीब 7,200 पेड़ों की कटाई की अनुमति दिए जाने का दावा भी सामने आया है। ग्रामीण चाहते हैं कि वन भूमि, पेड़ों की कटाई और खनन से संबंधित सभी आदेश सार्वजनिक किए जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परियोजना के लिए किस स्तर पर और किन शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है।
नंदराज पर्वत को देवस्थल मानते हैं आदिवासी
बैलाडीला की पहाड़ियों से स्थानीय आदिवासी समुदाय की गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हैं। ग्रामीण नंदराज पर्वत को अपने आराध्य देवता का निवास स्थान मानते हैं। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में खनन से पारंपरिक पूजा स्थलों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इसी कारण स्थानीय समुदाय लंबे समय से मांग कर रहा है कि धार्मिक महत्व वाले पर्वत को खनन गतिविधियों से सुरक्षित रखा जाए। ग्रामीणों का तर्क है कि विकास परियोजनाओं से जुड़े फैसले लेते समय उनकी आस्था, परंपराओं और आजीविका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
ग्रामसभा की सहमति पर पहले भी उठे सवाल
डिपॉजिट-13 परियोजना का विवाद नया नहीं है। वर्ष 2019 में भी स्थानीय आदिवासियों ने खदान के विकास और संचालन के लिए दिए गए ठेके का विरोध किया था। उस समय ग्रामसभा की सहमति को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। ग्रामीणों का आरोप था कि वर्ष 2014 में वन अधिकार कानून के तहत अनापत्ति प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए जिस ग्रामसभा की कार्यवाही का हवाला दिया गया वह वास्तविक नहीं थी।
विरोध बढ़ने के बाद तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने मामले की जांच कराने और खनन गतिविधियों पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे। बाद में जांच में संबंधित ग्रामसभा की कार्यवाही को शून्य घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई। इस घटनाक्रम ने परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया और आदिवासी समुदाय की सहमति के सवाल को महत्वपूर्ण बना दिया।
NMDC, NCL और अडानी की क्या भूमिका है
डिपॉजिट-13 परियोजना में नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NMDC) और छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (CMDC) की संयुक्त कंपनी एनसीएल (NCL) की भूमिका रही है। वर्ष 2018 में खदान के विकास और संचालन का ठेका अडानी एंटरप्राइजेज को दिया गया था। परियोजना को लेकर विरोध के दौरान ग्रामीणों ने ठेका देने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए थे।
संयुक्त पंचायत जन संघर्ष समिति की बैठक में ग्रामीणों ने आंदोलन को अधिक व्यापक बनाने पर चर्चा की है। समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि नंदराज पर्वत और डिपॉजिट-13 क्षेत्र की रक्षा के लिए अलग-अलग गांवों के लोगों को एकजुट किया जाएगा। ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में खनन गतिविधियों की स्थिति स्पष्ट करना, पेड़ों की कटाई से संबंधित आदेश सार्वजनिक करना और ग्रामसभा की वैध सहमति सुनिश्चित करना शामिल है। फिलहाल इस विरोध का अगला कदम क्या होगा और प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाएगा, यह स्पष्ट होना बाकी है। लेकिन नंदराज पर्वत का मुद्दा एक बार फिर बस्तर में खनिज विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच टकराव को सामने ला रहा है।
नंदराज पर्वत विवाद के मुख्य पक्ष कौन हैं
स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण - धार्मिक आस्था, जंगल, पर्यावरण और ग्रामसभा के अधिकारों की रक्षा
NMDC और NCL - लौह अयस्क के खनन तथा परियोजना के विकास से जुड़ी भूमिका
अडानी एंटरप्राइजेज- 2018 में डिपॉजिट-13 के विकास और संचालन का ठेका मिला था
राज्य और वन विभाग- खनन, वन अनुमति, ग्रामसभा प्रक्रिया और संबंधित नियमों का पालन
आखिर इस विवाद का समाधान और सवाल :
क्या स्थानीय आदिवासी समुदाय की सहमति कानून के मुताबिक ली गई है।
क्या ग्रामसभा और वन संबंधी सभी अनुमतियां वैध हैं।
खनन से जंगल, जैव विविधता और स्थानीय पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा।
क्या आदिवासी समुदाय की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करते हुए कोई समाधान निकाला जा सकता है।
निष्कर्ष
नंदराज पर्वत विवाद की जड़ यह है कि एक तरफ बैलाडीला में मूल्यवान लौह अयस्क का भंडार है, तो दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी इसे अपने देवस्थल और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं। 2019 में ग्रामसभा की कार्यवाही पर सवाल उठने के बाद खनन रुका था। अक्टूबर 2026 में पेड़ों की कटाई और खनन की तैयारियों को लेकर विरोध दोबारा सामने आया है। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कौन-कौन सी वैध अनुमतियां मौजूद हैं और स्थानीय ग्रामसभाओं की सहमति की वर्तमान स्थिति क्या है।