पहलाजानी नर्सिंग होम केस : बच्चा बदलने के मामले में बढ़ा सस्पेंस

VINAY VERMA | Jun 26, 2026, 13:42 IST
पहलाजानी नर्सिंग होम बेबी स्वैप केस सस्पेंस
पहलाजानी नर्सिंग होम में बच्चा बदलने का मामला अब और उलझ गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश, FIR, जंगल में मिले बच्चे और अब DNA टेस्ट के बीच सबसे बड़ा सवाल है- आखिर सच सामने आने से किसे डर है?

समझें क्या है पूरा मामला

  • FIR के डर से जंगल में छोड़ा गया बच्चा
  • पिता का दावा, बेटा बदलकर बेटी थमा दी गई
  • बेटा कहां, दूसरी बच्ची किसकी, जवाब कौन देगा?
  • SC ने मेडिकल बोर्ड की भूमिका पर सवाल उठाए
  • महिला आयोग के आदेश पर अब होगा DNA टेस्ट

SC के आदेश के बाद नया मोड़

रायपुर के चर्चित पहलाजानी नर्सिंग होम का बच्चा बदलने का मामला अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के एफआईआर के आदेश के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला। दावा किया गया कि जिस बच्चे को अस्पताल से खरीदकर ले जाया गया था, उसे दंपती ने जंगल में छोड़ दिया। अब यही मामला महिला आयोग तक पहुंच चुका है। आयोग ने पूरे प्रकरण में डीएनए टेस्ट कराने के निर्देश दिए हैं।



2023 की डिलीवरी बनी विवाद की जड़

मामले की शुरुआत वर्ष 2023 में हुई। दंतेवाड़ा निवासी अशोक सिंह और उनकी पत्नी उषा सिंह की रायपुर के पहलाजानी नर्सिंग होम में जुड़वा संतान हुई। परिवार का कहना है कि उन्हें पहले एक बेटा और एक बेटी होने की जानकारी दी गई। लेकिन बाद में अस्पताल ने दोनों बच्चियां सौंप दीं। यहीं से विवाद शुरू हुआ।



DNA रिपोर्ट ने बढ़ाए सवाल

परिवार ने अपने स्तर पर DNA जांच कराई। रिपोर्ट में पिता का DNA केवल एक बच्ची से मेल खाया। दूसरी बच्ची से DNA मैच नहीं हुआ। इसके बाद अशोक सिंह ने आरोप लगाया कि उनका बेटा बदल दिया गया और उसकी जगह दूसरी बच्ची दे दी गई। मामला प्रशासन से लेकर अदालत तक पहुंच गया। टेस्ट को मेडिकल बोर्ड ने नकार दिया। कहा कि यह निजी व्यक्ति द्वारा निजी तरीके से करवाया गया है। इसलिए बोर्ड इसे मान्य नहीं करता। साथ में उस आवेदन को भी नकार दिया जिसमें अशोक सिंह ने सरकारी प्रक्रिया से डीएनए टेस्ट करवाने की मांग की थी।



SC ने मेडिकल बोर्ड पर भी उठाए सवाल

हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड ने अस्पताल को क्लीन चिट दे दी। रिपोर्ट में बच्चा बदलने के आरोप को गलत बताया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने अस्पताल के साथ रायपुर एसएसपी, सीएमएचओ और मेडिकल बोर्ड के सदस्यों के खिलाफ भी एफआईआर के निर्देश दिए। अदालत ने माना कि पूरे मामले में गंभीर लापरवाही हुई है।



FIR हुई, लेकिन आधी कार्रवाई

पुलिस ने केवल पहलाजानी नर्सिंग होम, उसके संचालक दंपती और कुछ स्टाफ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। न तो गिरफ्तारी हुई और न ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक सीएमएचओ, मेडिकल बोर्ड के सदस्य और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज की गई। यही वजह है कि पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।



खरीदे बच्चे को जंगल में छोड़ने का दावा

अशोक सिंह का आरोप है कि उनका बेटा धमतरी के एक साहू परिवार को बेच दिया गया था। दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के एफआईआर आदेश की जानकारी मिलते ही वह परिवार बच्चे को थाने के पास जंगल में छोड़कर भाग गया। बच्चे के हाथ में सफेद पट्टी बांधी गई थी, जिस पर दंतेवाड़ा लिखा था। उस समय बच्चे की उम्र करीब नौ महीने बताई गई।



पुलिस ने दूसरे परिवार को सौंप दिया बच्चा

उसी समय दंतेवाड़ा के एक आदिवासी परिवार ने अपने छह महीने के बेटे के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने जंगल में मिले बच्चे को उसी परिवार का मानकर उन्हें सौंप दिया। अब सवाल यह है कि बिना वैज्ञानिक जांच के बच्चे की पहचान कैसे तय कर दी गई?



महिला आयोग का आदेश, होगा DNA टेस्ट

अब मामला छत्तीसगढ़ महिला आयोग तक पहुंच गया है। आयोग ने स्थानीय कलेक्टर और एसपी को तलब किया है। साथ ही बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने के निर्देश भी दिए हैं। यदि डीएनए जांच होती है तो वर्षों से उलझे इस मामले की कई परतें खुल सकती हैं।



सबसे बड़े सवाल, जिनका जवाब अभी बाकी

इस पूरे मामले में कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सभी जिम्मेदार अधिकारियों पर एफआईआर क्यों नहीं हुई? अस्पताल संचालकों की गिरफ्तारी अब तक क्यों नहीं हुई? अशोक सिंह के बेटे की तलाश क्यों नहीं हुई? जिस बच्ची का डीएनए अशोक सिंह से मेल नहीं खाता, वह आखिर किसकी संतान है? उसे उसके असली माता-पिता तक पहुंचाने की कोशिश क्यों नहीं हुई?



सबसे बड़ा सवाल- क्या इस पूरे मामले में अस्पताल, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के कुछ जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है? इन सवालों के जवाब अब डीएनए रिपोर्ट, अदालत और जांच एजेंसियों के सामने हैं।



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