राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने माता हासी देवी के सम्मान में जारी किया 200 रूपए का स्मारक सिक्का
सिंधी विभूति के सम्मान में स्मारक सिक्का जारी होना समाज के लिए ऐतिहासिक मौका था। यह देश-विदेश में रहने वाले करोड़ों सिंधी लोगों के लिए गर्व का विषय है। स्मारक सिक्के का अनावरण होने के बाद श्रद्धालु और सिक्का संग्राहक इसे शदाणी दरबार की अलग-अलग इकाइयों के माध्यम से बुक कर सकेंगे।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार द्वारा जारी इस विशेष सिक्के पर पूज्य माता हासी देवी की छवि अंकित है। सिक्के के एक ओर अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष और 200 रूपए का मूल्यवर्ग दर्शाया गया है। इस स्मारक सिक्के के माध्यम से उनके जीवन, विचारों और आध्यात्मिक योगदान को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
कौन थीं माता साहिब हासी देवी?
माता साहिब हासी देवी सिंधी समाज की एक महान आध्यात्मिक संत, तपस्विनी और रायपुर स्थित प्रसिद्ध 'शदाणी दरबार' की पंचम पीठाधीश्वर थीं। उनका जन्म वर्ष 1826 में सिंध प्रांत के खानपुर महर में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन ही ईश्वर की भक्ति, परोपकार और मानव सेवा के प्रति समर्पित था।
सन् 1852 में मात्र 26 वर्ष की आयु में वे शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं और लगभग 57 वर्षों तक इस पद पर रहते हुए समाज को सही दिशा दिखाई। माता हासी देवी को त्याग, तपस्या और सेवा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भजन-कीर्तन, जरूरतमंदों की सहायता और समाज में नैतिक मूल्यों के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने शिक्षा और संस्कारों के महत्व को समझते हुए हिंदी, संस्कृत और संगीत शिक्षा के विकास में विशेष योगदान दिया।
सिंधी समाज और उनके अनुयायियों के बीच माता हासी देवी को लेकर गहरी आस्था है। इतिहास और लोकमान्यताओं के अनुसार, उनके जीवनकाल में कई ऐसे प्रसंग आए, जब उन्होंने अकाल और संकट के दौर में गरीबों और बेसहारा लोगों की भरपूर सहायता की। उनके आशीर्वाद से जुड़े कई संस्मरण आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रेरणा के स्रोत हैं। 30 अप्रैल 1909 को उन्होंने महाप्रयाण किया, लेकिन उनकी दी हुई शिक्षाएं आज भी मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं।
उनकी इस द्विशताब्दी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा 35 ग्राम वजनी 200 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी करना उनके महान कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सच्ची श्रद्धांजलि है। इस सिक्के में 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, 5 प्रतिशत निकल और 5 प्रतिशत जस्ता शामिल है।
बस्तर के मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा
रायपुर के कार्यक्रमों के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर जाएंगी, जहां वे विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण हिस्से माने जाने वाले 'मुरिया दरबार' में हिस्सा लेंगी।
बस्तर दशहरा देश का सबसे लंबा, यानी लगभग 75 दिनों तक चलने वाला अनूठा पर्व है, जो रावण वध की बजाय मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित होता है। इसी बस्तर दशहरे का एक अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली अंग मुरिया दरबार है।
मुरिया दरबार की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। यह एक ऐसा पारंपरिक और अनूठा मंच है, जो राजा और प्रजा के बीच सीधे संवाद तथा लोकतंत्र की प्राचीन भारतीय भावना का परिचायक है। ऐतिहासिक रूप से, इस दरबार में बस्तर रियासत के राजा विभिन्न परगनों के मांझी, चालकी, पा, मेनिया और आदिवासी समुदायों के प्रमुख प्रतिनिधियों व अन्य लोगों से सीधा संवाद करते थे। ग्रामीण अपने इलाके की समस्याओं, जनता की जरूरतों, खेती-किसानी और समुदाय से जुड़े मुद्दों को खुलकर राजा के सामने रखते थे। राजा और प्रशासक मिलकर उनका समाधान निकालते थे।
समय बदलने के साथ राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई, किंतु बस्तर की यह लोक-परंपरा आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है। आज के समय में इस दरबार में जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के अधिकारी और बस्तर के दूर-दराज के अंचलों से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधि तथा मांझी-चालकी एकत्र होते हैं। यहां बस्तर के पारंपरिक विकास, उसकी संस्कृति के संरक्षण और क्षेत्रीय समस्याओं पर गंभीर चर्चा होती है। जगदलपुर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन में आयोजित होने वाला यह मुरिया दरबार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बस्तर के मूल निवासी अपनी संस्कृति, परंपरा और लोकतांत्रिक भागीदारी के प्रति कितने सजग हैं।